रोम है पोप का, मधेपुरा गोप का… कब और कैसे से हुई थी इस कहावत की शुरुआत, पढ़ें राजनीति की दिलचस्प कहानी

Share Now:

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें


हाइलाइट्स

बिहार की सियासत में एक खास कहावत पिछले कई सालों से खूब बोली जाती रही है.
यादव बाहुल्य वाले लोकसभा सीट मधेपुरा में यह कहावत खूब चर्चा में रहती है.
किताबों में दर्ज है कि पहली बार 1962 लोकसभा चुनाव के दौरान इसका इस्तेमाल हुआ था.

पटना. रोम पोप का, मधेपुरा गोप का… यह कहावत पिछले कई सालों से बिहार की सियासत में खूब बोली जाती रही है. दरअसल बिहार एक ऐसा राज्य है, जहां वर्षों से जाति की राजनीति का खूब बोल बाला रहा है. जब-जब चुनाव का समय आता है तब-तब कुछ खास सीट पर जाति की खूब चर्चा होती है. ऐसा ही एक यादव बाहुल्य वाला लोकसभा सीट है मधेपुरा (Madhepura). ऐसे में मधेपुरा में यह कहावत (Famous Proverb In Madhepura) खूब चर्चा में रहती है. लेकिन क्या आपको पता है इस कहावत की शुरुआत कब हुई थी?

इस बारे में अधिक जानकारी देते हुए मंडल मसीहा माने जाने वाले बीपी मंडल के पोते व जदयू के प्रदेश महासचिव निखिल मंडल (Nikhil Mandal) बताते हैं कि आज भी कोसी सहित पूरे बिहार में रोम पोप का, मधेपुरा गोप का… वाली कहावत खूब चर्चा में रहती है. निखिल मंडल कहते हैं कि यह कहावत सबसे पहले किसने कही यह तो पूरी तरह से नहीं पता है. लेकिन, किताबों में यही है दर्ज है कि पहली बार 1962 लोकसभा चुनाव के दौरान इस कहावत का इस्तेमाल हुआ था.

आपके शहर से (पटना)

दरअसल 1962 में तीसरा आम चुनाव था, जब प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का प्रतिनिधित्व करने वाले बीएन मंडल ने सहरसा लोकसभा से प्रसिद्ध कांग्रेस नेता ललित नारायण मिश्रा को हराया था. लेकिन, फैसले को इस आरोप के आधार पर अदालत में चुनौती दी गई थी कि बीएन मंडल जी ने अपने एक पैम्फलेट में जातिवादी नारा “रोम है पोप का, मधेपुरा है गोप का” का इस्तेमाल किया था, जिसने सांप्रदायिक भावनाओं को हवा दी थी.

फिल्मी अंदाज में हुआ मिलन! अनाथ आश्रम में था बेटा, जेल में थे पिता, लंगर के दौरान हुई बिछड़े रिश्तों की मुलाकात

निखिल मंडल आगे बताते हैं कि इस मामले ने तब खूब तूल पकड़ा था. तब इस बात की चर्चा हुई थी कि राम मनोहर लोहिया के एक निजी सचिव और बीएन मंडल जी के चुनाव अभियान के प्रभारी उर्मिलेश झा ने व्यक्तिगत राजनीतिक लाभ के लिए एलएन मिश्रा के साथ गठबंधन किया और ठंडे खून वाले अंदाज में एक पैम्फलेट तैयार किया जिसमें उनके हस्ताक्षर थे जो झूठे थे. बीएन मंडल जी दो साल तक यानी 1964 तक लोकसभा में रहे, जब अदालत ने 1962 के चुनाव परिणाम को अमान्य करार दिया और बीएन को अगले छह साल तक कोई भी चुनाव लड़ने से रोक दिया.

हालांकि, बाद में उन्होंने केस जीत लिया और उन्हें 1964 में हुए उपचुनाव में लड़ने की अनुमति दी गई. उन्होंने लहटन चौधरी को हराया, जबकि रेडियो समाचार और समाचार पत्रों दोनों ने बताया कि बीएन मंडल जीते थे. निखिल बताते हैं कि कांग्रेस और एक निंदनीय नौकरशाही वोटों की गिनती में हेरफेर किया गया और कांग्रेस प्रत्याशी की जीत का ऐलान कर दिया गया. बता दें, मधेपुरा में विधानसभा चुनाव हो या लोकसभा चुनाव यादव उम्मीदवार की जीत ही होती आई है जिससे यह कहावत और अधिक चरितार्थ प्रतीत होती है.

Tags: Bihar News, Bihar politics, Madhepura news

Source link

Up Head Line
Author: Up Head Line

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

और पढ़ें