कबीर के राम में खोजिए अपने राम

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राम हम सबके हैं. कोई राम को जपता है, कोई राम को घट-घट में पाता है. किसी के राम तुलसी बाबा के राम है तो किसी के लिए कबीर के राम. एक सगुण के गीत गाता है तो दूजा निर्गुण का उपासक है. कबीर के यहां भक्ति में प्रभु से एकात्म हो जाने की आकांक्षा है. कबीर के लिए ईश्वर घट-घट के वासी हैं. उन्‍हें बाहर खोजने की जगह भीतर खोजने की आवश्‍यकता है.

इस वर्ष 4 जून को कबीर दास की 568 वीं जयंती है. कबीर दास के जन्म और जन्‍म तिथि को लेकर तमाम भ्रांतियां हैं. मान्यताओं के अनुसार उनका जन्म संवत 1456 विक्रमी ज्येष्ठ मास शुक्लपक्ष की पूर्णिमा के दिन लहरतारा तालाब, काशी (वाराणसी) में हुआ था. इनके मूल माता-पिता का नाम प्रमाणिक नहीं है. मान्यता अनुसार उनका जन्म किसी विधवा ब्राह्मणी की कोख से हुआ था, जिसने लोकलाज के भय से उन्हें टोकरी में सुला कर नदी की धारा में छोड़ दिया था. नदी तट पर नीरू और नीमा नामक निसंतान मुस्लिम दंपत्ति ने शिशु को देखा. उसे घर लाए और उसकी पुत्रवत परवरिश की. नीरू पेशे से जुलाहा था और कबीर पूरी उम्र खुद को हिंदू या मुस्लिम की जगह जुलाहा कहते रहे. इस तरह जन्‍म और माता-पिता के रूप में हिंदुओं और मुसलमानों ने कबीर को बांटना चाहा. विभाजन का यह झगड़ा कबीर के अंत समय तक चला.

किंवदंती हैं कि कबीर ने स्वामी रामानंद से दीक्षा प्राप्त करने के लिए एक सुबह अंधेरे पंचगंगा घाट की सीढ़ियों पर लेट गए. अंधेरे में स्वामी रामानंद कबीर को देख नहीं सके और उनका पैर कबीर को लग गया. कबीर को पैर लगा तो उनके मुंह से राम-राम निकल गया. कबीर ने इसे ही गुरुमंत्र माना.

कबीर दास वाराणसी में पैदा हुए और लगभग पूरा जीवन उन्होंने वाराणसी यानी काशी में ही बिताया लेकिन जीवन के अंत समय में वे मगहर चले गए थे वर्ष 1518 में यहीं उनकी मृत्यु हुई. कबीर स्वेच्छा से मगहर गए थे. वे इस अंधविश्वास को तोड़ना चाहते थे कि काशी में मृत्‍यु से मोक्ष मिलता है और मगहर में मृत्‍यु से नरक. ऐतिहासिक तथ्‍य यह भी संकेत करते हैं कि धर्म के ठेकेदारों ने जब बादशाह सिकंदर लोदी से शिकायत कर दी कि कबीर खुद को भगवान से बड़ा मानता है. सिकंदर लोदी की नाराजगी और कबीर को सजा देने तथा राम की कृपा से कबीर के इन सभी सजाओं से मुक्‍त हो जाने के अनगिनत किस्‍से हैं. यह भी माना जाता है कि सिकंदर लोदी और समाज के ठेकेदारों के दबाव में अंत समय में कबीर को काशी छोड़नी पड़ी थी. जीते जी भी कबीर को हिंदू-मुस्लिम में विभाजन को देखना पड़ा था और मृत्‍यु के बाद भी उनकी देह की अंति क्रिया अपने रिवाजों के अनुसार करने को लेकर हिंदू-मुसलमान भिड़ गए थे. मगहर में अब कबीर की समाधि भी है और उनकी मजार भी.

कबीर दास को पढ़ते हैं तो राम के होने के कई अर्थ खुलते हैं. जैसे वे कहते हैं कि हे मानव! तू केवल प्रभु का स्मरण कर, केवल उसी को अपना ध्‍येय बना. वही तुझको सब दु:खों से मुक्त कर सकता है, अन्यथा जैसे निहाई पर रखा हुआ लोहा हथौड़े की चोट से पीटा जाता है, वैसे ही तुझे सिर पर सांसारिक दु:खों की चोट सहनी पड़ेगी.

कबीर केवल राम की, तूं जिनि छाड़ै ओट
घन अहरन बिच लोह ज्यौं, घनो सहै सिरि चोट.

तुलसी और सूर जैसे सगुण भक्तों के विपरीत कबीर ने निर्गुणराम नाम के स्मरण को ही निर्गुण भक्ति का आधार माना है –

निरगुण राम निरगुण राम जपहु रे भाई
अवगति की गति लखी न जाई.
चारि वेद जाके सुमृत पुरांना,
नौ व्याकरणां मरण ना जाना.

वरिष्‍ठ आलोचक व लेखक डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी कबीर के राम को समझने में हमारी मदद करते हैं. वे बताते हैं कि कबीर और तुलसी दोनों मानवीय भावना के आश्रय हैं, आलंबन तो हैं ही. अंतर यह है कि कबीर के राम के पास केवल मानव हृदय है, तुलसी के राम के हृदय और शरीर दोनों हैं. कबीर के राम जननी हैं, भरतार हैं, पिता हैं और तो और उन्हें कुत्ते पालने का भी शौक है, लेकिन सब भाव रूप में लीला रूप में नहीं. कबीर और तुलसी के रामों का यह अंतर कबीर और तुलसी की संगति में है. कबीर के राम लोकनायक नहीं. कबीर के राम लोक में समाए जरूर हैं लेकिन निराकार हैं.  डॉ. त्रिपाठी लिखते हैं, कबीर के राम उस अर्थ में सामाजिक–ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं जिस अर्थ में तुलसी के राम. कबीर के रामराज्य के संस्थापक नहीं जहां बौद्धिक, दैहिक, भौतिक ताप न हो. कबीर के राम राजा न हों लोकनायक न हों लेकिन वे निर्गुण होते हुए भी सामाजिक-मानवीय गुणों के प्रतीक, स्रोत एवं समुच्चय हैं.

साहित्‍य आलोचकों ने कबीर के लेखन को साहित्‍य की दृष्टि से अनेक रूपों में देखा और विश्‍लेषित किया है. उन्‍हें आधुनिक हिंदी साहित्‍य का सबसे बड़ा सेक्‍यूलर और क्रांतिकारी कवि करार दिया है मगर हम यहां साहित्‍य का विश्‍लेषण और आकलन नहीं कर रहे हैं. हमारा लक्ष्‍य तो लोक में व्‍याप्‍त कबीर हैं. कबीर को कई लोग दशकों से अपनी-अपनी तरह से गा रहे हैं. कुछ लोग आडंबरों, कुप्रथाओं, जड़ता और अंधविश्वासों के खंडन के लिए कबीर का साथ ले रहे हैं तो कुछ के लिए आस्‍था को व्‍यक्‍त करने का माध्‍यम बन रहे हैं कबीर. इस तरह मुहावरों और अनुभवों की अभिव्‍यक्ति में कबीर सारी सीमाओं को तोड़ते हुए प्रतीत होते हैं.

मेरे संगी दोइ जणा, एक वैष्णौ एक राम
वो है दाता मुकति का, वो सुमिरावै नाम.

मेरे तो ये दो ही संगी साथी हैं, एक वैष्णव और दूसरे राम. राम जहां मुक्ति के दाता हैं, वहीं वैष्णव नाम-स्मरण करवाता है. तब और किसी साथी से मुझे क्या लेना-देना?

कबीर’ बन-बन में फिरा, कारणि अपणैं राम
राम सरीखे जन मिले, तिन सारे सबरे काम.

कबीर कहते हैं, अपने राम को ढूंढ़ते-ढूंढ़ते मैं एक वन से दूसरे वन में गया. जब मुझे वहां राम सरीखे भक्त मिल गए और उन्‍होंने मेरे सारे काम बना दिए. मेरा वन-वन भटकना तभी सफल हुआ.

जानि बूझि सांचहि तजै, करैं झूठ सूं नेहु
ताकी संगति रामजी, सुपिनें ही जिनि देहु.

जो मनुष्य जान-बूझकर सत्य को छोड़ देता है और असत्य से नाता जोड़ लेता है, हे राम! सपने में भी कभी मुझे उसका साथ न देना.

आगि कह्यां दाझै नहीं, जे नहीं चंपै पाइ
जब लग भेद न जाँणिये, राम कह्या तौ काइ.

आग कह देने से कोई इससे दग्ध नहीं होता है, अग्नि से जलने के लिए जरुरी है की कोई आग पर पांव रखे तभी वह अग्नि से जल सकता है. ऐसे ही जब तक भेद को जाना नहीं जाता है केवल राम-राम कह देने से कुछ प्राप्त होने वाला नहीं है। यानी केवल दिखावे की भक्ति से कुछ लाभ नहीं होने वाला है जब तक रहस्य को समझ नहीं लिया जाए और सच्चे हृदय से भक्ति नहीं की जाए.

कस्तूरी कुंडल बसे मृग ढ़ूंढ़े वन माहि।
ऐसे घट-घट राम हैं दुनिया खोजत नाहिं.

जिस प्रकार कस्तूरी हिरण की नाभि में होती है और उसकी सुगंध से आकर्षित हिरण उसे जंगल में इधर-उधर खोजता रहता है उसी प्रकार मनुष्य भी भगवान को जगह-जगह ढूंढता रहता है जबकि ईश्वर संसार के कण-कण में व्याप्त है. कबीर ने राह दिखाई है, हम अपने राम को कबीर के राम में खोज सकते हैं. कबीर के वे राम जो घट-घट के वासी हैं.

Tags: Hindi Literature, Kabir, Kabir Jayanti

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Up Head Line
Author: Up Head Line

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