Indo-Pak Shimla Agreement: इंदिरा गांधी और भुट्टो के पास नहीं था पेन, पत्रकार की कलम से हुए थे शिमला समझौते पर दस्तख़त

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शिमला. हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला हमारे देश के इतिहास को समेटे हुए है. अग्रेंजी शासन काल के दौरान यह भारत की समर कैपिटल थी. गर्मियों में यहीं से देश का शासन चलता था. यहां का मौसम लंदन के मौसम की तरह है, इसलिए गर्मियों में अंग्रेज यहीं से देश का शासन चलाते थे. देश की आजादी के बाद भी यहां कई इतिहासिक मुद्दों पर मीटिंग और फैसले हुए. इन्हीं में से एक है शिमला समझौता.

दरअसल, भारत-पाकिस्तान के बीच 3 जुलाई 1972 को आधी रात के बाद यह एग्रीमेंट हुआ. इंदिरा गांधी और जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच यह ऐतिहासिक समझौता हुआ था. आज उस समझौते को पूरे 51 साल हो गए हैं. बता दें कि शिमला में ऐसी बहुत सी ऐसी ऐतिहासिक यादें जुड़ी हैं, जिनका भारतीय इतिहास में काफी महत्व है.

शिमला के राजभवन, जिसे उस समय हिमाचल भवन या बार्नेस कोर्ट भी कहा जाता था. साल 1971 के युद्ध के बाद जुल्फिकार अली भुट्टो ने इंदिरा गांधी के पास बातचीत का संदेश भिजवाया था. इंदिरा ने भी बात आगे बढ़ाने का फैसला लिया और 28 जून से 2 जुलाई के बीच शिमला में शिखर वार्ता तय हुई. तय कार्यक्रम के अनुसार पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल के साथ भुट्टो भारत पहुंचे और भारतीय दल यहां पहले से मौजूद था.

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खटाई में पड़ गया था समझौता
भारत ने पाकिस्तान के सामने दो तीन प्रमुख बातें रखीं, लेकिन पाकिस्तान ने इसे मानने से इंकार कर दिया. बात बिगड़ गई और पहली जुलाई को तय हो गया कि समझौता नहीं होगा. दो जुलाई को पाकिस्तानी दल के लिए विदाई भोज रखा गया था. उम्मीद थी कि भोजन के दौरान शायद कोई बात बन जाएगी, लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ तो वहां मौजूद मीडिया समेत अधिकांश अधिकारियों ने भी सामान समेट लिया था.

इस घटना को कवर कर रहे पत्रकार भी जब अपना सामान बांध वापस जाने की तैयारी करने लगे. तारघर यानी के आज, जिसे सीटीओ के नाम से जाना जाता है, वहां जाकर टेलीग्राफी के जरिए खबर भिजवा दी गई कि समझौता रद्ध हो चुका है. खबर जा चुकी थी. लेकिन, अचानक राजभवन से संदेश आया. रात के साढ़े नौ बज रहे थे. इंदिरा गांधी और जुल्फिकार भुट्टो एक बैठे हुए थे.

रात को पौने एक बजे समझौते पर दस्तखत
दोनों में करीब एक घंटे तक बातचीत हुई. तय हुआ कि समझौता होगा. आनन-फानन में समझौते के दस्तावेज बनाए गए. 12 बजकर 40 मिनट पर शिमला समझौता पर साइन हुए. इसलिए समझौता के हस्ताक्षर की तारीख 3 जुलाई, 1972 दर्ज हुई. समझौते की ठीक तीन मिनट बाद ही इंदिरा गांधी वहां से खुद दस्तावेज लेकर चली गईं.

मुहर नहीं लग पाई, पाकिस्तान भेज चुका था सामान
दोनों नेताओं ने जिस टेबल पर समझौता किया, उस पर टेबल क्लॉथ तक नहीं था, उसपर कमरे का पर्दा उतारकर बिछाया गया था. यहां तक की दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने के लिए जब पेन की बात आई तो एक पत्रकार ने अपना पेन दिया. यहां तक कि दस्तावेजों पर दोनों देशों की मुहर तक नहीं लग पाई, क्योंकि पाकिस्तानी दल अपना सामान सड़क मार्ग से दोपहर को भी भेज चुका था. ऐसे में इंदिरा गांधी ने भी मुहर के बिना दस्तखत किए. हालांकि बाद में मुहर लगाने की औपचारिकताएं पूरी हुईं.

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भुट्टो पर 93 हजार सैनिकों को रिहा करवाने का दवाब था
दरअसल, भारत ने इस समझौते के जरिए अहम जीत हासिल की थी. भुट्टो पर 93 हजार पाक सैनिकों को भारतीय कैद से रिहा करवाने का दबाव था, इसलिए उन्होंने इस मौके पर कश्मीर का जिक्र तक नहीं किया. समझौते में भुट्टो के हाथ से लिखवा लिया गया कि दोनों देश 17 दिसंबर 1971 की स्थितियों के अनुसार अपनी-अपनी जगह पर रहेंगे. उसी को एलओसी माना जाएगा. समझौते में यह भी तय हुआ कि भविष्य में दोनों देश अपने झगड़े आपस में बिना किसी मध्यस्थता के मिल-बैठ कर सुलझाएंगे. यह मास्टर स्ट्रोक था, जिसके दम पर आज तक भारत तीसरे पक्ष को दूर रखने में कामयाब है.

Tags: Himachal pradesh, India Pakistan war 1965, Indo Pak Partition, Shimla News Today

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Author: Up Head Line

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