भाषा, उनकी ध्वनियां और समाज

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स्टास अलेक्सांद्रसन दक्षिणी रूस के क्रास्नोदार शहर के निवासी हैं. कम उम्र में बीसेक बरस पहले अमरीका चले गए. कई बरस बाद बर्लिन आ गए. इन दिनों अपने रुसी दोस्त अलेक्स फ्रोलोव के साथ प्राग में हैं. हम बहुभाषीय राष्ट्रों पर चर्चा कर रहे थे कि भाषा के आधार पर बांग्लादेश के विभाजन से बहुत पहले आधुनिक यूरोप ने एक राष्ट्र-एक भाषा के सिद्धांत को चुन लिया था. वह यह जानकर हैरान थे कि भारतीय संविधान बाईस भाषाओं को मान्यता देता है और साहित्य अकादमी चौबीस भाषाओं को सम्मानित करता है. जब मैंने कहा कि रूस भी तो बहुभाषीय है, वे बोले, ‘भले ही रूस में कई भाषाएं हैं, रूसी भाषा प्रमुख है. सबसे बड़ी बात कि इसका लहजा एक समान है. प्रशांत महासागर से लेकर साइबेरिया, मास्को और सेंट पीटर्सबर्ग तक सभी लोग सिर्फ एक लहजे में बोलते हैं. सोवियत संघ के गणराज्य, यूक्रेन और लातविया, भी उसी स्वर को बरतते थे.’

‘रूस में रहते वक्त मैंने गौर नहीं किया था लेकिन अमरीका पहुंच हैरान रह गया. मैं जब किसी हमवतन रूसी से मिलता, पता नहीं चल पता कौन साइबेरिया का है, कौन सेंट पीटर्सबर्ग का.’

अलेक्स ने टोका, ‘ऐसा भी नहीं है. थोड़ा-सा अंतर तो है उच्चारण में.’

‘कहां है? होगा भी, तो एकदम मामूली. जिस होटल में हम यहां रुके हैं, वहां काम करती लड़कियां हमसे रूसी में बात करती हैं. मुझे बाद में पता चला, एक यूक्रेन से है, दूसरी आर्मेनिया. ये दोनों सोवियत दौर के दौरान संघ का हिस्सा हुआ करते थे, अब स्वतंत्र देश हैं, लेकिन एकदम हमारी तरह रूसी बोल रही थीं.’

भारत की भाषाई विविधता सर्वज्ञात है. अमरीका के तमाम राज्यों में आपको अंग्रेजी के भिन्न लहजे मिल जाएंगे. बित्ते भर का इंग्लैंड कई स्वरों में अंग्रेजी को बोलता है- स्कॉटिश और आयरिश तो भूल ही जाएं. जर्मनी की जुबान ढ़ेर सारे स्थानीय उच्चारणों से समृद्ध हुई है. रूस में ऐसा क्या हुआ? इसकी एक बड़ी वजह है भाषा का एक मानकीकृत लहजा निर्मित करने के लिए सोवियत दौर में चलाया गया अभियान जिसने इतने विशाल राष्ट्र की बेशुमार ध्वनियों को चपटा कर दिया. सोवियत संघ का पूर्व-पश्चिम विस्तार करीब ग्यारह हजार किलोमीटर था और वर्तमान रूस का नौ हजार किलोमीटर है. दुनिया का कोई अन्य देश इतने विराट भूगोल में नहीं पसरा है. भारत का उत्तर-दक्षिण विस्तार सिर्फ सवा तीन हजार किलोमीटर है और पश्चिम-पूर्व तो तीन हजार से भी कम.

हम देर तक चर्चा करते रहे कि इस राष्ट्रवादी मुहिम ने रूसी भाषा और उसके समाज को किस तरह छुआ होगा.

रूसी मित्र स्टास अलेक्सांद्रसन और अलेक्स फ्रोलोव

एलिश्का प्राग की म्युनिसिपल लाइब्रेरी में काम करती हैं, तमाम किताबें पढ़ती हैं. एक दिन उन्होंने सुख के साथ मुझे बताया कि मो यान के जिस उपन्यास ‘लाइफ एंड डेथ आर वेयरिंग मी आउट’ को मैंने लाइब्रेरी से लिया है, उन्होंने उसे हाल ही पढ़कर लौटाया था. कुछ दिन पहले मैं और एलिश्का व्लतावा नदी के सहारे लौट रहे थे. उनके ब्राउन बूट्स की हील अधिक नहीं थी लेकिन जमीन पर ठक-ठक की जुगलबंदी हमारे साथ चलती थी.

शहर से कुछ दूर व्लतावा को थोड़ा काट कर छोटी-सी नहर और कृत्रिम भंवर बना दिए गए थे जहां लोग डोंगी-दौड़ का अभ्यास रहे थे. सात-आठ साल की बच्चियों से लेकर बड़ी उम्र के लोग अपनी डोंगी को खेते तेज भंवर में गोते लगा रहे थे, नहर के बीच झूलते खंभों और बाधाओं को पार कर रहे थे. कोई इन संकरे खम्भों को पार कर जाता, कोई उनसे टकरा कर उलट जाता, डोंगी हवा में उछलती, लेकिन वह गोता लगाकर फिर से नौका-दौड़ शुरू कर देता. पूरी देह पानी में तरबतर हो चुकी होती.

नहर के किनारे इन प्रतिभागियों के दोस्त और रिश्तेदार बैठे थे. माता-पिता अपने बच्चों को तेज चप्पू चलाने के लिए, भंवर को काटने के लिए कहते थे. किसी प्रतियोगिता की तैयारी चल रही थी.

मैं देर तक उन्हें देखता रहा. इतने दिनों में पहली बार प्रागवासियों को सार्वजनिक रूप से कोई खेल खेलते देख रहा था- वह भी इतने उन्माद के साथ.

‘बड़ी भीड़ जुटी है.’ मैंने एलिश्का से पूछा. ‘राष्ट्रीय खेल है क्या?’

एलिश्का ने लगभग कंधे उचकाते हुए कहा, ‘हमारा कोई राष्ट्रीय खेल नहीं है. हमारे यहां अगर कोई किसी खेल में मेडल ले आता है, बाकी सब उसे खेलने निकल पड़ते हैं जब तक कि किसी दूसरे खेल में कोई और मेडल नहीं आ जाता.’

मैं मुस्कुराने लगा. यह पहली मर्तबा नहीं था. आप कोई भी विषय उठाएं, एलिश्का के पास मजेदार व्याख्या तैयार मिलती हैं. हम आगे बढ़ गए. लीपा के पेड़ के पास कबूतर फुदक रहे थे. मुझे लगा यहां के कुत्ते और बिल्लियां भले बिदेसी लगते हैं, कबूतरों की रंगत और सूरत एकदम भारतीय कबूतर जैसी है. एक परिंदा दूर पानी की सतह पर डुबडुबा रहा था.

‘सीगल है क्या?’- मैंने पूछा.

‘हमारे यहां कहा जाता है कि कबूतर पंख वाले चूहे हैं और सीगल वे कबूतर जो पानी के किनारे रहती हैं.’
इस कहावत का अर्थ समझना कठिन नहीं था, लेकिन मैं इस बिम्ब को कायांतरित कर चुपचाप मुस्कुराने लगा.

इन दिनों बहुत चमकीली और बहुत अधिक रोशनी मेरी आंखों पर आकर फूट रही है. सुबह चार बजे उजाला हो जाता है, शाम नौ के बाद सूरज डूबता है, उसके बाद भी देर तक चमक बनी रहती है. मेरी पुतलियों को इतना सारा दिन देखने की आदत नहीं है. मुझे वैसे भी अंधेरा अधिक सुहाता है. ये दिन लंबे होने की शुरूआत है. जून विकट हो जाएगा. इतनी रोशनी कैसे सहूंगा?

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Up Head Line
Author: Up Head Line

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