नागार्जुन की रचनाओं में लहलहाती हैं फसलें और चहकता किसान, पढ़ें मशहूर कविताएं

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बाबा नागार्जुन की ‘रतिनाथ की चाची’ में किसी स्त्री की यातना और आजाद होने की छटपटाहट सुनाई देती है. ‘तालाब की मछलियां’ मे् स्त्री की पराधीनता का दुख महसूस किया जा सकता है. ‘हरिजन गाथा’ में दलित पर अत्याचार की गूंज सुनी जा सकती है. नागार्जुन हिंदी और मैथिली के अप्रतिम लेखक तथा कवि थे. बाबा नागार्जुन ने हिंदी, मैथिली, संस्कृत और बांग्ला भाषाओं में रचनाएं कीं और अनुवाद कार्य किया.

बाबा नागार्जुन गांव की पगड़ंडियों पर घूमते हुए खेतों में पकी फसल का निहार रहे हैं. प्रस्तुत हैं उनकी कविताएं-

बहुत दिनों के बाद
अबकी मैंने जी भर देखी
पकी-सुनहली फ़सलों की मुस्कान
—बहुत दिनों के बाद

बहुत दिनों के बाद
अबकी मैं जी भर सुन पाया
धान कूटती किशोरियों की कोकिलकंठी तान
—बहुत दिनों के बाद

बहुत दिनों के बाद
अबकी मैंने जी भर सूंघे
मौलसिरी के ढेर-ढेर-से ताज़े-टटके फूल
—बहुत दिनों के बाद

बहुत दिनों के बाद
अबकी मैं जी भर छू पाया
अपनी गंवई पगडंडी की चंदनवर्णी धूल
—बहुत दिनों के बाद

बहुत दिनों के बाद
अबकी मैंने जी भर तालमखाना खाया
गन्ने चूसे जी भर
—बहुत दिनों के बाद

बहुत दिनों के बाद
अबकी मैंने जी भर भोगे
गंध-रूप-रस-शब्द-स्पर्श सब साथ-साथ इस भू पर
—बहुत दिनों के बाद
—

अपने खेत में….

जनवरी का प्रथम सप्ताह
खुशग़वार दुपहरी धूप में
इत्मीनान से बैठा हूं।

अपने खेत में हल चला रहा हूं
इन दिनों बुआई चल रही है
इर्द-गिर्द की घटनाएं ही
मेरे लिए बीज जुटाती हैं
हां, बीज में घुन लगा हो तो
अंकुर कैसे निकलेंगे!

जाहिर है
बाजारू बीजों की
निर्मम छटाई करूंगा
खाद और उर्वरक और
सिंचाई के साधनों में भी
पहले से जियादा ही
चौकसी बरतनी है
मकबूल फ़िदा हुसैन की
चौंकाऊ या बाजारू टेकनीक
हमारी खेती को चौपट
कर देगी!

जी, आप
अपने रूमाल में
गांठ बांध लो! बिलकुल!!
सामने, मकान मालिक की
बीवी और उसकी छोरियां
इशारे से इजाजत मांग रही हैं
हमारे इस छत पर आना चाहती हैं
ना, बाबा ना!

अभी हम हल चला रहे हैं
आज ढाई बजे तक हमें
बुआई करनी है….
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Tags: Hindi Literature, Hindi poetry, Hindi Writer, Literature

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Up Head Line
Author: Up Head Line

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