
रोहित भट्ट/अल्मोड़ा. उत्तराखंड की सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा की बाल मिठाई ही नहीं बल्कि तांबे के बर्तन भी काफी प्रसिद्ध हैं. इसी वजह से अल्मोड़ा को ताम्रनगरी भी कहा जाता है. यहां करीब 400 साल से तांबे का काम किया जा रहा है. यही के कारीगरों द्वारा बर्तन आदि बनाए जाते हैं. एक समय ऐसा भी आया, जब ताम्रनगरी अपनी पहचान खोती जा रही थी. इसके बाद अपने पुरखों की विरासत को बढ़ाने के लिए युवा वर्ग सामने आया. इन्हीं में से एक हैं अल्मोड़ा के रहने वाले संजय टम्टा.
‘न्यूज़ 18 लोकल’ से खास बातचीत में तांबे का काम कर रहे संजय टम्टा ने बताया कि वह 17 साल की उम्र से यह काम कर रहे हैं. उनकी कई पीढ़ी इस काम को करती आ रही हैं. अल्मोड़ा में चंद वंश राजाओं के समय से तांबे के बर्तन बनाए जा रहे हैं. साथ ही बताया कि कोरोना के समय लोगों की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, जिस कारण से ताम्र कारीगरों और उनके परिवारों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा, लेकिन जैसे-जैसे लॉकडाउन खुला तो लोगों को पता चला कि तांबे के बर्तन स्वास्थ्य के लिए कितने लाभदायक होते हैं और फिर तांबे की मांग उठने लगी.
संजय बताते हैं कि अपनी इस धरोहर को कैसे जीवित रखें, इसके लिए सभी ने मंथन किया और सभी युवाओं और बुजुर्गों को साथ लेकर इस काम को कैसे आगे बढ़ाए जाए, इस पर विचार किया गया. 80 से 100 युवाओं का एक क्लस्टर बनाया गया, जिसकी एक छोटी कंपनी भी बनाई गई है. वर्तमान में यहां पर तांबे से परात, गागर, कलश, फौले, गगरी और जलकुंडी के अलावा अन्य चीजें बनाई जाती हैं.
संजय टम्टा ने बताया कि युवा भी अब तांबे का काम करना चाहते हैं. उनका मानना है अगर राज्य सरकार अल्मोड़ा की इस पहचान को आगे बढ़ाने में युवाओं की मदद करती है, तो आने वाले समय में वे इस काम में और कलात्मक प्रयोग कर सकेंगे, क्योंकि अल्मोड़ा में बनने वाले तांबे के बर्तन शुद्ध धातु के बने, बेहद अनूठे और मजबूत होते हैं.भविष्य में वह कई अन्य चीजें यहां पर करने वाले हैं. इसके अलावा युवाओं को सिखाने के लिए वह ट्रेनिंग भी जल्द कराएंगे.
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FIRST PUBLISHED : May 18, 2023, 13:07 IST









