अल्हड़ बीकानेरी जयंतीः लेता है धरा पे अवतार जाके सदियों में ‘अल्हड़’ सरीखा कोई सन्त मेरे राम जी

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आज विश्व प्रसिद्ध हास्य कवि और गज़लकार अल्हड़ बीकानेरी की जंयती है. हिंदी साहित्य और हास्य व्यंग्य की दुनिया में अल्हड़ बीकानेरी का नाम बड़ी ही श्रद्धा के साथ लिया जाता है. उन्होंने न केवल हास्य विधा को बल्कि रेवाड़ी के छोटे से गांव बीकानेरी को भी देश-दुनिया के पटल पर स्थापित करने का काम अपनी रचनाओं के माध्यम से किया. अपनी विशेष गायन शैली में कविताएं प्रस्तुत करने वाले बीकानेरी जी को सुनने के लिए कवि सम्मेलनों में दूर-दूर से लोग पहुंचा करते थे.

पहले गज़लकार और फिर हास्य कवि के रूप में प्रसिद्ध अल्हड़ बीकानेरी के सानिध्य में न जाने कितने रचनाकारों और कवियों ने गीत-गज़ल बारहखड़ी सीखी और खुद को साहित्य की दुनिया में स्थापित किया.

अल्हड़ बीकानेरी जी के जन्मदिन पर देश-दुनिया के काव्य मंचों पर छाए रहने वाले प्रसिद्ध हास्य कवि डॉ. प्रवीण शुक्ल ने उनके साथ जुड़े अपने कुछ अनुभवों को हमारे साथ साझा किया. प्रवीण शुक्ल कहते हैं कि अल्हड़ बीकानेरी इस सदी के सबसे बड़े रचनाकारों में से एक हैं. अल्‍हड़ बीकानेरी को छंद कविता का विशेषज्ञ माना जाता था. हिंदी हास्य कविता के लिए उन्हें तमाम पुरस्कारों से सम्मानित किया गया. उनकी लोकप्रियता न केवल भारत में सीमित थी बल्कि भारत के बाहर भी उनकी हास्य कविताएं मंचों पर गूंजती थीं.

प्रवीण शुक्ल बताते हैं कि उन्होंने लगभग तीन दशकों तक अल्हड़ बीकानेरी जी के सानिध्य में देश-दुनिया के तमाम मंचों पर काव्य पाठ किया. पहली बार 1990 में उनके साथ मंच पर कविता पढ़ने का जो सफर शुरू हुआ था वह ताउम्र तक जारी रहा.

भीष्म की प्रतिज्ञा जैसी चर्चित रचना गढ़ने वाले कवि प्रवीण शुक्ल बताते हैं कि अल्हड़ बीकानेरी शुरू से ही संगीत से जुड़े हुए थे. उन्हें गाना गाने का शौक था. वे कव्वाली बहुत अच्छे तरीके से गाते थे. अल्हड़ बीकानेरी छंद के मास्टर थे. बड़े-बड़े शायर और कवि उनसे अपनी गज़ल और कविताएं ठीक कराने के लिए उनसे सलाह लेते थे.

फक्कड़ फकीर अल्हड़ बीकानेरी
प्रवीण शुक्ल पुराने दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि अल्हड़ बीकानेरी के अंदर एक फक्कड़ फकीर बैठा था. मायावी जगत उन्हें प्रभावित नहीं कर पाया. प्रवीण बताते हैं कि एक समय ऐसा था जब अल्हड़ जी एक महीने में 20 से 25 दिन कवि सम्मेलनों में व्यस्त रहा करते थे. अपनी व्यस्तता को उन्होंने एक कविता के माध्यम से कुछ इस तरह बयां किया-

मत पूछिए फुरसत की घड़ियां
हम कैसे गुजारा करते हैं
होंठों से छुआकर मूंगफली
माशूक को मारा करते हैं।

लेकिन समय के साथ उन्होंने अपनी व्यस्तता को किनारा किया और महीने में केवल दो कवि सम्मेलन में ही जाने का फैसला किया. प्रवीण बताते हैं कि दो कवि सम्मेलन के बाद अगर उन्हें कोई कितना भी लालच दे वे तीसरे कवि सम्मेलन में नहीं जाते थे.

मनोहर मनोज ‘अल्हड़ बीकानेरी हास्य रत्न’ और योगेंद्र शर्मा ‘साहित्य भारती’ से सम्मानित

चर्चित कवि डॉ. प्रवीण शुक्ल बताते हैं कि अल्हड़ बीकानेरी जी को मंचों पर होने वाली गुटबाजी से हमेशा परहेज था. उन्हें खेमेबाजी पसंद नहीं थी. खेमेबाजी के चलते मंचों पर अयोग्य लोगों की रचनाओं को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करने के चलन पर उन्होंने कुछ तरह तंज किया-

लफ़्ज तोड़े मरोड़े गज़ल हो गई
सर रदीफ़ों के फोड़े गज़ल हो गई

लीद करके अदीबों की महफिल में कल
हिनहिनाए जो घोड़े गज़ल हो गई

ले के माइक गधा इक लगा रेंकने
हाथ पब्लिक ने जोड़े गज़ल हो गई

पंख चींटी के निकले बनी शाइरा
आन लिपटे मकोड़े गज़ल हो गई।

अल्हड़ बीकानेरी जी के परिवार के बारे में प्रवीण शुक्ल बताते हैं कि उनके तीन बेटे और दो बेटियां हैं. अल्हड़ जी पहले तो दिल्ली के मोतीबाग इलाके में रहते थे. बाद में मयूर विहार फेज-दो में आकर रहने लगे. मयूर विहार में उनके घर पर लगभग रोजाना ही कवियों और शायरों की महफिल जुटा करती थी.

अल्हड़ बीकानेरी के ‘मेरे राम जी’
प्रवीण शुक्ल उनकी अंतिम पुस्तक से जुड़ी घटना को याद करते हुए बताते हैं कि अल्हड़ बीकानेरी जी ने अपने अंतिम दिनों में एक किताब लिखी थी और उसकी पांडुलिपी प्रवीण को दी थी. उन्होंने इस पुस्तक में 160 हास्य रस के छंद लिखे. उन सब छंदों में रदीफ था – ‘मेरे राम जी’. अल्हड़ जी ने एक ही रदीफ में 160 छंद लिखे, यह अपने-आप में दुलर्भ काम है. शायद ही किसने ने एक रदीफ पर इतने छंद रचे हों, जितना कि अल्हड़ जी ने. यह पुस्तक उनके निधन के बाद प्रकाशित हुई और इसे डायमंड बुक्स ने प्रकाशित किया. इसके कुछ छंद इस प्रकार हैं-

आदि से अनूप हूं मैं, तेरा ही स्वरूप हूं मैं
मेरी भी कथाएं हैं अनन्त मेरे राम जी

लागी वो लगन तुझसे कि मन मस्त हुआ
दृग में समा गया दिगन्त मेरे राम जी

सपनों में आ के कल बोले मेरी बुढ़िया से
बाल-ब्रह्मचारी हनुमन्त मेरे राम जी

लेता है धरा पे अवतार जाके सदियों में
‘अल्हड़’ सरीखा कोई सन्त मेरे राम जी।

अल्‍हड़ बीकानेरी ने 1962 में कविता, गीत और गज़ल कविताएं लिखना शुरू किया. शुरूआत में उन्होंने उर्दू में गज़ल लिखनी शुरू कीं और लंबे समय तक उर्दू में ही लिखते रहे. प्रवीण शुक्ल बताते हैं कि हास्य कविताएं लिखने की प्रेरणा उन्हें काका हाथरसी से मिली. उन्हें इस ओर उनके मित्र शायर रज़ा अमरोहवी ने प्रेरित किया.

गज़लकार से हास्य कवि बनने का सफर
हरियाणा के बीकानेर गांव के श्यामलाल शर्मा ने 1962 में लेखन करियर की शुरुआत गज़ल लेखक के रूप में की. वे ‘माहिर बीकानेरी’ के नाम से गज़ल लिखा करते थे. उन दिनों वे दिल्ली के कश्मीरी गेट स्थित डाकघर में क्लर्क के रूप में काम करते थे. ऐसा कहा जाता है कि एक दिन काम करते हुए माहिर बीकानेरी के दिमाग में विचार आया और उन्होंने कार्यालय में चारों ओर देखते हुए अपनी पहली हास्य कविता ‘अफसर जी की अमर कहानी’ लिखी. ऑफिस में जब उन्होंने वो कविता सुनाई तो जादू-सा हो गया था. कविता को सभी ने इसे बहुत पसंद किया और सराहा. यह घटना 1967 की थी.

उन दिनों काका हाथरसी की हास्य कविताओं का जादू चारों ओर था. बीकानेरी जी भी काका हाथरसी से बहुत प्रभावित थे. काका हाथरसी को अपनी प्रेरणा मानते हुए उन्होंने हास्य कविताएं लिखना शुरू किया. उन दिनों वे उर्दू में ही लिखा करते थे.

अल्हड़ बीकानेरी की हास्य कविता- ‘बस एक बार मुझको सरकार बनाने दो’

एक दिन बीकानेरी जी के मित्र शायर रज़ा अमरोहवी  ने उनकी कविताएं सुनकर उन्हें हिंदी में हास्य कविता लिखने का सुझाव दिया. वे इस सलाह से बहुत खुश हुए. एक दिन बीकानेरी जी काका हाथरसी की पुस्तक ‘काका की फुलझड़ियां’ पढ़ रहे थे. इस पुस्तक को पढ़ने के बाद, उन्होंने गंभीर गीत और गज़ल लिखना बंद करने का फैसला किया और हास्य कविताओं की दुनिया में प्रवेश किया. उन्होंने अपना कलम नाम बदलकर “अल्हड़ बीकानेरी” कर लिया और हिंदी में हास्य कविता लिखना शुरू कर दिया.

अल्हड़ बीकानेरी ने गज़ल, कविता और हास्य व्यंग्य लिखने के अलावा हिंदी सिनेमा के लिए भी काम किया. 1986 में उन्होंने ‘छोटी साली’ नाम की एक हरियाणवी फिल्म के लिए कहानी, पटकथा और गीत लिखे थे. आकाशवाणी और दूरदर्शन पर उनकी कविताओं का नियमित प्रसारण होता था. विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में अल्हड़ जी की कविताएं नियमित रूप से प्रकाशित होती रहती थीं. उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं. उनमें से सबसे लोकप्रिय हैं ‘भज प्यारे तू सीता राम’, ‘घाट-घाट घूमे’, ‘अभी हँसता हूं’, ‘अब तो आंसू पौंछ’, ‘भैसा पिवे सोमरस’, ‘जय मैडम की बोल रे’, ‘खोल देना द्वार’, ‘मन मस्त हुआ’ और ‘मेरे राम जी’ शामिल हैं.

‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ ने बनाया कवि
अल्हड़ बीकानेरी की रचनाओं विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित होती थीं. उस समय की सबसे चर्चित पत्रिका ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में उनकी पहली रचना ‘हर हाल में खुश हूं’ प्रकाशित हुई थी. इसके बाद उनकी कई रचनाएं इस पत्रिका में प्रकाशित हुईं.

अल्हड़ जी ने स्वीकार किया था कि उनकी और उनकी कविताओं की लोकप्रियता का कारण उस समय के ‘सप्ताहिक हिंदुस्तान’ के प्रकाशक मनोहर श्याम जोशी थे, जिन्होंने अपनी पत्रिका के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर एक आम आदमी तक कविताओं को पहुंचाने के लिए एक मंच दिया था. ‘सप्ताहिक हिंदुस्तान’ में कविताएं प्रकाशित होने के दो साल के दौरान वे कवि सम्मेलनों के मंचों पर छाने लगे और एक प्रसिद्ध कवि बन गए.

17 जून, 2009 बीमारी के चलते हास्य की दुनिया की यह सितारा अपने चाहने वालों का रुलाकर चला गया. प्रवीण शुक्ल की संस्था ‘साहित्य प्रेमी मंडल’ हर वर्ष अल्हड़ जी की स्मृति में ‘अल्हड़ बीकानेरी हास्य रत्न’ प्रदान करती है. इस बार यह सम्मान प्रसिद्ध हास्य कवि मनोहर मनोज को प्रदान किया गया.

Tags: Hindi Literature, Hindi poetry, Hindi Writer, Literature

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Author: Up Head Line

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