
निशा राठौड़/ उदयपुर. बांस से बने हुए हुए बर्तन का प्रयोग का चलन न सिर्फ प्रदेश में बल्कि पूरे देश में किसी न किसी रूप में आज भी किया जाता है. उदयपुर की बात करें तो यहां भी चाहे श्री नाथ जी का भोग प्रसाद हो या किसी शादी का कार्यक्रम, या फिर इंसान के जन्म से मृत्यु का सफर इन सभी में बांस से बनी वस्तुओ का प्रयोग किया जाता है. लेकिन इन दिनो बढ़ते प्लास्टिक के चलन और साज सज्जा के बीच बांस की यह टोकरियां बनाने वाले अपना हुनर खोते जा रहे है. बांस के उत्पाद बनाने वाले व्यापारियों का कहना है शायद यह उनकी आख़िरी पीढ़ी है जो यह कार्य कर रही है.
बाजारों में बांस से बने उत्पादों की बिक्री हो रही कम
खुशबू गांचा ने बताया कि इस व्यापार का प्रमुख सीज़न वैशाख और ज्येष्ठ माह होता हैं, इसके अलावा शादी के सीज़न में भी इनकी बिक्री होती है. लेकिन इस बार ऐसा भी हुआ है जब कोई एक भी उत्पाद नहीं बिकता और हमे खाली हाथ ही घर लौटना पड़ता है. बिक्री होती भी है तो दिन भर में 400 से 500 रुपए की होती है. ऐसे में इनकी मांग दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही है. दरअसल इन बांस की लकड़ियों को असम राज्य से मंगवाया जाता हैं. 25 फीट के एक बांस की लकड़ी की कीमत 200 रु होती है.
सरकार से मदद की आस
बांस की लकड़ी से उत्पाद बनाने वाले रमेश गाँचा ने बताया कि बांस की चीजों को बनाते समय कई सारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता हैं. क्योंकि बांस की एक टोकरी बनाने में 2 घंटे का समय लग जाता है साथ ही उनके हाथों में कई बार बांस की फांस घुस जाती हैं. व्यापारियों ने सरकार से मांग की है कि उन्हें भी इस काम को करने के लिए मशीनें उपलब्ध करवा दे ताकि उनका काम आसान हो जाए.
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FIRST PUBLISHED : May 16, 2023, 22:43 IST








