
हिंदी भाषा के प्रख्यात लेखक, कवि और साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता मंगलेश डबराल की आज जयंती है. उनका जन्म 16 मई, 1948 को उत्तराखंड में टिहरी गढ़वाल के काफलपानी गांव में हुआ था. उनकी शिक्षा-दीक्षा देहरादून में ही हुई थी. मंगलेश डबराल की कविताएं पहाड़-सी विशालता लिए हुए हैं. उनकी रचनाओं में पहाड़ का गांव-घर है तो रोजी-रोटी के लिए संघर्ष करते पहाड़ी नौजवान.
‘पहाड़ पर लालटेन’, ‘घर का रास्ता’, ‘हम जो देखते हैं’, ‘आवाज़ भी एक जगह है’, ‘नए युग में शत्रु’, ‘घर का रास्ता’ और ‘स्मृति एक दूसरा समय है’ उनके चर्चित कविता संग्रह हैं. उनकी कविताएं हमेशा चर्चा के केंद्र में रहती थीं. ‘हम जो देखते हैं’ कविता संग्रह के लिए वर्ष 2000 में मंगलेश जी को साहित्य अकादमी से पुरस्कार से सम्मानित किया गया. उन्हें हिंदी अकादमी, दिल्ली के साहित्यकार सम्मान तथा कुमार विकल स्मृति पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया.
मंगलेश डबराल की कविताओं का की भारतीय भाषाओं सहित कई विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ. उन्होंने भी कई चर्चित अंग्रेजी कवियों की कविताओं का हिंदी में अनुवाद किया.
मंगलेश डबराल ने कविता के अतिरिक्त साहित्य, सिनेमा, संचार माध्यम और संस्कृति के विषयों पर नियमित लेखन किया. उनके दो गद्य संग्रह ‘लेखक की रोटी’ और’ कवि का अकेलापन’ तथा एक यात्रावृत्त ‘एक बार आयोवा’ भी प्रकाशित हो चुके हैं. ‘पहाड़ पर लालटेन’ पर लालटेन उनकी बेहद चर्चित कविता है-
जंगल में औरतें हैं
लकड़ियों के गट्ठर के नीचे बेहोश
जंगल में बच्चे हैं
असमय दफ़नाए जाते हुए
जंगल में नंगे पैर चलते बूढ़े हैं
डरते-खांसते अंत में गायब हो जाते हुए
जंगल में लगातार कुल्हाड़ियां चल रही हैं
जंगल में सोया है रक्त
धूप में तपती हुई चट्टानों के पीछे
वर्षों के आर्तनाद हैं
और थोड़ी-सी घास है बहुत प्राचीन
पानी में हिलती हुई
अगले मौसम के जबड़े तक पहुंचते पेड़
रातोंरात नंगे होते हैं
सूई की नोक जैसे सन्नाटे में
जली हुई धरती करवट लेती है
और एक विशाल चक्के की तरह घूमता है आसमान
जिसे तुम्हारे पूर्वज लाए थे यहां तक
वह पहाड़ दुख की तरह टूटता आता है हर साल
सारे वर्ष सारी सदियां
बर्फ की तरह जमती जाती हैं निःस्वप्न आंखों में
तुम्हारी आत्मा में
चूल्हों के पास पारिवारिक अंधकार में
बिखरे हैं तुम्हारे लाचार शब्द
अकाल में बटोरे गए दानों जैसे शब्द
दूर एक लालटेन जलती है पहाड़ पर
एक तेज आंख की तरह
टिमटिमाती धीरे-धीरे आग बनती हुई
देखो अपने गिरवी रखे हुए खेत
बिलखती स्त्रियों के उतारे गए गहने
देखो भूख से बाढ़ से महामारी से मरे हुए
सारे लोग उभर आए हैं चट्टानों से
दोनों हाथों से बेशुमार बर्फ झाड़कर
अपनी भूख को देखो
जो एक मुस्तैद पंजे में बदल रही है
जंगल से लगातार एक दहाड़ आ रही है
और इच्छाएं दांत पैने कर रही हैं
पत्थरों पर।
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Tags: Hindi Literature, Hindi poetry, Hindi Writer, Literature
FIRST PUBLISHED : May 16, 2023, 14:51 IST








