सदियों से कवियों लेखकों के प्रति पाठकों में जो अपार आकर्षण पनपता रहा है, वह उन कवियों लेखकों की शब्दों के प्रति अटूट आस्था का ही प्रतिफल है. कितने बरस बीत गए, लेकिन आज भी कुछ ऐसे लेखक हैं, जो अपने विशाल पाठक वर्ग के बीच सबसे ज्यादा पढ़े और सराहे जाते हैं. अमृता ऐसी ही एक शख्सियत हैं, जिन्हें पढ़ने वालों का एक बड़ा वर्ग है. पद्म विभूषण, भारतीय ज्ञानपीठ, पद्मश्री से प्रतिष्ठित पंजाबी लेखिका-कवयित्री अमृता प्रीतम का नाम किसी भी साहित्य प्रेमी के लिए नया नहीं है. इन पर कई कहानियां कई लेख लिखे जा चुके हैं, साथ ही लोगों ने फिल्मों के माध्यम से भी अमृता के जीवन को करीब से समझने और समझाने की कोशिश की है. वैसे तो अमृता ने सभी तरह के विषयों पर बेबाकी से लिखा, लेकिन बात जब प्रेम की होती है, तो अमृता की कहानियां और कविताओं के साथ-साथ उनके निजी जीवन को भी समझना ज़रूरी हो जाता है. उनके लिखे में संवेदना का एक ऐसा स्पर्श है, जिसे छू कर लगता है, ये तो हमारे भीतर की आवाज़ है, हमरा अपना जिया हुआ कोई सच.
अमृता का जन्म पंजाब के गुजरांवाला जिले में 31 अगस्त 1919 को हुआ था और वर्ष 2005 में उनका निधन हो गया था. उनके पास मानवीय भावनाओं का बारीकी से चित्रण करने का बेमिसाल हुनर था. उन्होंने कई ऐतिहासिक घटनाओं पर कहानियां और उपन्यास लिखे. उनका ज्यादातर समय लाहौर में बीता. वहीं उनकी पढ़ाई भी हुई. अमृता ने अपनी लोकप्रिय आत्मकथात्मक कृति ‘रसीदी टिकट’ में अपने उथल-पुथल भरे जीवन के सारे पन्ने पाठकों के सम्मुख बिखेर दिए हैं. पुरातनपंथी समाज के गलत उसूलों के विरुद्ध आजीवन अपनी राह चलने वाली अमृता किसी जमाने में खुले दिमाग की लड़कियों, चाहे वह कहीं की भी, कोई भी भाषाभासी हों, सभी के लिए रोल मॉडल रही हैं. उन्हें जीवन को सुख से भर देने वाले शब्दों के प्रति कितना गहरा लगाव रहा या उनकी जिंदगी और तजुर्बे में ‘प्यार’ के क्या मायने रहे, इस पर वह लिखती हैं, ‘मेरी सारी रचनाएं, क्या कविता, क्या कहानी, क्या उपन्यास, सब एक नाजायज बच्चे की तरह हैं. मेरी दुनिया की हकीकत ने मेरे मन के सपने से इश्क किया और उसके वर्जित मेल से ये रचनाएं पैदा हुईं.’ वैवाहिक जीवन से बहुत पहले मुक्ति पाकर उन्होंने प्रेम के लिए लिव इन रिलेशन में रहना सही समझा और उसका जीवन भर निर्वाह भी किया. माना जाता है कि जिस समय वह शादीशुदा होने के बावजूद पूरी निर्भीकता से प्रेम संबंधों में जी रही थीं, भारतीय परिवेश में लिव इन रिलेशन का वह पहला वाकया रहा होगा शायद.
अमृता का जीवन
अमृता प्रीतम जब ग्यारह साल की थीं, उनकी मां गुज़र गईं. बंटवारे में लाखों लोगों को अपनी जन्मभूमि छोड़ पलायन करना पड़ा था, उनमें से एक अमृता भी थीं. उनका परिवार भी हिन्दुस्तान आ गया था मगर उनका दिल अक़्सर लाहौर की गलियों में भटकता रहता था. तन्हाई के मौसमों में कागज़ और कलम ने अमृता को सहारा दिया और वह अपने मन की बातें कविताओं के ज़रिए बयां करने लगीं. अमृता को बहुत कम उम्र से ही कहानी, कविता और निबंध लिखने का शौक था. उनका पहला कविता संग्रह ‘अमृत लहरें’ (1936) उस वक़्त प्रकाशित प्रकाशित हुआ, जब वह मात्र 16 साल की थीं. सोलह साल की उम्र में ही उनका विवाह ‘प्रीतम सिंह’ से हो गया और ‘अमृता कौर’ अमृता प्रीतम बन गईं, मगर इस रिश्ते में लगातार दरारें आती रहीं और अंततः 1960 में उनका तलाक हो गया.
एक सौ से ज्यादा पुस्तकों की रचनाकार अमृता प्रीतम को पंजाबी भाषा की पहली कवयित्री माना जाता है. वो जब विभाजन के वक़्त ट्रेन में बैठ कर दिल्ली आ रही थीं, तब उन्होंने ‘आज अख्खां वारिस शाह नूं’ लिखी. भारत-पाकिस्तान बंटवारे पर यह उनकी पहली कविता थी, जो काफी चर्चित रही. इस कविता में उन्होंने 1947 में हुए भारत-पाक बंटवारे का मार्मिक रेखांकन किया है. अमृता ने अपने जीवन में कुल 28 उपन्यास लिखे. ‘पिंजर’ उनका काफी लोकप्रिय उपन्यास है, जिसमें देश बंटवारे की पृष्ठभूमि पर आधारित एक मार्मिक कहानी का चित्रण है. इस उपन्यास पर 2002 में इसी नाम से एक फिल्म बनाई गई थी. अमृता ने ऑल इंडिया रेडियो के लिए भी काम किया. अपने अंतिम दिनों में अमृता प्रीतम को भारत का दूसरा सबसे बड़ा सम्मान पद्मविभूषण प्राप्त हुआ, साहित्य अकादमी पुरस्कार से उन्हें पहले ही अलंकृत किया जा चुका था. उनको 1982 में ‘कागज ते कैनवस’ के लिए भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार और 1969 में पद्मश्री, 2004 में पद्मभूषण से प्रतिष्ठित किया गया. आपको बता दें, कि वर्ष 1986 में अमृता प्रीतम को राज्यसभा के लिए भी नामित किया गया था.
अमृता का लेखन
एक औरत की जिंदगी में आने वाली कठिनाइयों और संघर्ष पर अमृता प्रीतम ने खुलकर लिखा है. अमृता उन साहित्यकारों में थीं जिनकी कृतियों का अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ. अमृता की प्रेम में डूबी हुई कविताएं कच्ची उम्र में भी अच्छी लगती हैं और एक लंबी उम्र जी लेने के बाद भी, वो अलग बात है कि कम उम्र में जिन शब्दों के अर्थ नहीं जुड़ते, उम्र बढ़ने के साथ साथ उन सभी शब्दों को आकार मिलने लगते हैं. जाने कैसा जादू होता है उनकी कविताओं में, जिन्हें उम्र के जिस मोड़ पर पढ़ा जाए, उनकी ताज़गी कम नहीं होती. मानो वह उम्र भर खुद से ही उलझती रहीं. साहसी, रूढ़ि-विद्रोही अमृता ने अपनी रचनाओं से समाज को वह आईना दिखाया, जिसमें झांकने की हर किसी की हिम्मत नहीं होती, खासकर पुरुष प्रधान समाज उसमें अपना रुख देखते ही डर जाता है. अपनी लेखनी को उन्होंने कुछ इस तरह साधा, जैसे एक संगीतज्ञ वीणा के तारों को साधता है. उनके शब्द उनकी मन-वीणा से निकले हुए प्रतीत होते हैं, जिन्होंने लाखों लोगों को जीवन जीने का सलीका सिखाया और प्रेम के लिए मरना मिटना भी.
अगर अमृता की आत्मा के शब्द पढ़ने हों, उनकी विद्रोही जिंदगी के एक-एक मासूम पल से गुजरना हो, ‘रसीदी टिकट’ की अतल गहराइयों में उतर जाइए, उनकी भावनाओं, उनके शब्दों के सारे पते-ठिकाने पन्ना-पन्ना खुलते चले जाते हैं. वह लिखती हैं – ‘सबसे पहला विद्रोह मैंने नानी के राज में किया था. देखा करती थी कि रसोई की एक परछत्ती पर तीन गिलास, अन्य बर्तनों से हटाए हुए, सदा एक कोने में पड़े रहते थे. ये गिलास सिर्फ तब परछत्ती से उतारे जाते थे, जब पिताजी के मुस्लिम दोस्त आते थे और उन्हें चाय या लस्सी पिलानी होती थी और उसके बाद मांज-धोकर फिर वहीं रख दिए जाते थे.’ ‘रसीदी टिकट’ के पन्ने पलटते हुए किसी को भी बखूबी अहसास हो जाता है कि प्रेम में सिर से पांव तक डूबी रहने वाली अमृता आजाद खयाल, खुद्दारी से लबरेज लेखक थीं, जो सारे बंधन तोड़ खुली हवा में सांस लेने में यकीन करती थीं. एक स्त्री, एक मां, एक प्रेमिका और एक लेखिका-कवयित्री रूप में उनके शब्द-शब्द बेतकल्लुफ उनके पूरे होशो-हवाश को नुमाया करते जाते हैं. अमृता सिर्फ लेखिका ही नहीं थीं, बल्कि उन्होंने मंचों पर भी खुलकर एक धर्म मुक्त समाज बनाने की वकालत की. अमृता ने एक दिन लिखा, ‘सोच रही हूं, हवा कोई भी फ़ासला तय कर सकती है, वह आगे भी शहरों का फ़ासला तय किया करती थी. अब इस दुनिया और उस दुनिया का फ़ासला भी जरूर तय कर लेगी…’
उपन्यासकार के रूप में अमृता की पहचान ‘पिंजर’ से हुई. उन्होंने विश्व के कई देशों और सभ्यताओं के साहित्यकारों के बीच, अपनी विद्रोही रचनाएं पढ़ीं. उन्होंने दूसरे विद्रोही कवियों-लेखकों को भी भरपूर सुना और समझा. वे पहली महिला साहित्यकार थीं जिन्हें ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ से नवाज़ा गया.
अमृता की सबसे यादगार कविता
“आज वारिस शाह से कहती हूं –
अपनी क़ब्र में से बोलो!
और इश्क़ की किताब का
कोई नया वर्क़ खोलो!
पंजाब की एक बेटी रोयी थी,
तूने एक लम्बी दास्तान लिखी,
आज लाखों बेटियां रो रही हैं
वारिस शाह! तुम से कह रही हैं:
ऐ दर्दमन्दों के दोस्त,
पंजाब की हालत देखो
चौपाल लाशों से अटा पड़ा है,
चनाब लहू से भर गया है…”
अमृता की इस कविता के साथ एक यादगार इतिहास जुड़ा हुआ है. इस कविता में 1947 के भारत विभाजन के समय हुए पंजाब के भयंकर हत्याकांडों का अत्यंत दुखद वर्णन है. यह कविता ऐतिहासिक मध्यकालीन पंजाबी कवि वारिस शाह को संबोधित करते हुए लिखी गई है, जिन्होंने मशहूर पंजाबी प्रेमकथा हीर-रांझा का सबसे विख्यात प्रारूप लिखा था. यह कविता भारतीय पंजाब और पाकिस्तानी पंजाब दोनों में ही सराही जाती रही है. 1959 में बनी पाकिस्तानी पंजाबी फ़िल्म ‘करतार सिंह’ में इनायत हुसैन भट्टी ने इसे गीत के रूप में प्रस्तुत किया है.
कहा जाता है, प्रेम में डूबी हर स्त्री अमृता प्रीतम होती है या फिर होना चाहती है मगर सबके हिस्से कोई इमरोज, कोई साहिर नहीं होता.
साहिर और अमृता
बेतहाशा सी प्रेम-पथिका अमृता प्रीतम अपने आसपास के और अपने जमाने के दोरंगे साहित्यिक समाज के प्रति विक्षोभ और दुख से पूरी उम्र भरी रहीं. मशहूर शायर साहिर लुधियानवी का याराना उन्हें आखिरी दम तक रिझाता-खिझाता रहा. प्रेम-स्मृतियों के शब्द उनके अंदर के शोलों को हर वक्त हवा देते रहे. उन्हें साहिर से बेपनाह मोहब्बत थी. साहिर भी उन्हें उतना ही टूटकर चाहते थे मगर प्रेमालाप से आगे दोनों में और कोई रिश्ता नहीं बना. लाहौर में साहिर उनके घर आया करते थे, कुछ नहीं कहते, बस एक के बाद एक सिगरेट पिया करते थे. उनके जाने के बाद अमृता उनकी सिगरेट की बटों को उनके होंठों के निशान के हिसाब से दोबारा पिया करती थीं. इसी तरह उन्हें सिगरेट पीने की लत लग गई.
वह लिखती हैं, ‘वह चुपचाप सिर्फ सिगरेट पीता रहता था, कोई आधी सिगरेट पीकर राखदानी में बुझा देता था, फिर नई सिगरेट सुलगा लेता था और उसके जाने के बाद केवल सिगरेटों के बड़े-बड़े टुकड़े कमरे में रह जाते थे. कभी… एक बार उसके हाथ को छूना चाहती थी, पर मेरे सामने मेरे ही संस्कारों की एक वह दूरी थी, जो तय नहीं होती थी. उसके जाने के बाद, मैं उसके छोड़े हुए सिगरेटों के टुकड़ों को संभाल कर अलमारी में रख लेती थी, और फिर एक-एक टुकड़े को अकेले बैठकर जलाती थी. और जब अंगुलियों के बीच पकड़ती थी, तो लगता था, जैसे उसका हाथ छू रही हूं… सोच रही हूं, हवा कोई भी फासला तय कर सकती है, वह आगे भी शहरों का फासला तय किया करती थी। अब इस दुनिया और उस दुनिया का फासला भी जरूर तय कर लेगी…’
दोनों एक दूसरे को प्यार भरे खत लिखते मगर साहिर के लाहौर से मुंबई चले जाने और अमृता के दिल्ली में बस जाने के बाद उनके बीच मुलाकातों का सिलसिला टूट सा गया. कहते हैं कि साहिर के कदम गायिका सुधा मल्होत्रा की ओर बहक चुके थे, इससे अमृता के दिल को गहरा आघात लगा और फिर अमृता से ‘इमरोज़’ को इश्क़ हो गया. दोनों एक साथ रहने लगे, लेकिन अलग-अलग कमरों में. इमरोज़ को साहिर और अमृता की दोस्ती पता थी मगर वह इससे कभी विचलित नहीं हुए.
प्रेम में डूबी स्त्री और अमृता
एक जमाने में पढ़ी-लिखी लड़कियों के सिरहाने अमृता की किताब ‘रसीदी टिकट’ हर वक्त रखी हुआ करती थी. जैसेकि इतनी बड़ी दुनिया में वही एक अदद उन लड़कियों की रोल मॉडल हों. अपने विद्रोही शब्दों में अमृता रोती गिड़गिड़ाती भी नहीं, आम स्त्री की तरह शिकवे-शिकायत भी नहीं करतीं. वह अपनी जिंदगी के सुनसान और उदास दिनों के अकेलेपन से चुपचाप गुजरती जाती हैं. जब उनको नर्वस ब्रेक डाउन हुआ, उससे भी बामुश्किल उबर गईं. जिन्दगी की सबसे उदास प्रेम कविताएं उन्होंने उसी दौर में लिखीं,
“उम्र के काग़ज़ पर
तेरे इश्क़ ने अँगूठा लगाया,
हिसाब कौन चुकायेगा !”
कहा जाता है कि प्रेम में डूबी हर स्त्री अमृता प्रीतम होती है या फिर होना चाहती है, मगर सबके हिस्से कोई इमरोज, कोई साहिर नहीं होता, शायद इसलिए भी कि इमरोज होना आसान नहीं है. अपनी कविता ‘जब मैं तेरा गीत लिखने लगी’ में अमृता लिखती हैं-
“मेरे शहर ने जब तेरे कदम छुए
सितारों की मुठियाँ भरकर
आसमान ने निछावर कर दीं
दिल के घाट पर मेला जुड़ा ,
ज्यूँ रातें रेशम की परियां
पाँत बाँध कर आई…
जब मैं तेरा गीत लिखने लगी
काग़ज़ के ऊपर उभर आईं
केसर की लकीरें
सूरज ने आज मेहंदी घोली
हथेलियों पर रंग गई,
हमारी दोनों की तकदीरें”
कुछ ऐसा था अमृता-इमरोज़ का रिश्ता
अमृता प्रीतम और इमरोज़ की कहानी बहुत रुहानी है. उसे समझना हर किसी के बस की बात नहीं और इश्क में अमृता-इमरोज़ हो जाना शायद बहुत कम प्रेम कहानियों के हिस्से आया हो. प्रेम क्या होता है और किस हद तक इंसान की ज़िंदगी में शामिल होता है, ये सिर्फ वही जान सकता है, जिसने उस एहसास को जिया हो. अमृता के शब्द ना होते, कविताएं ना होतीं, कहानियां ना होतीं, तो शायद अमृता और इमरोज़ भी ना होते. अमृता रात के समय लिखना पसंद करती थीं. जब न कोई आवाज़ होती हो, न टेलीफ़ोन की घंटी बजती हो और न कोई आता-जाता हो. इमरोज़ कई सालों तक रात के एक बजे चाय बनाकर चुपचाप उनके आगे रख देते और फिर सो जाया करते थे. अमृता को इस बात की ख़बर तक नहीं होती थी. इमरोज़ उनके ड्रायवर भी थे. वो हर जगह अमृता को अपने स्कूटर पर छोड़ने जाया करते थे. इसी तरह दोनों का ‘खामोश-इश्क़’ उम्र भर चलता रहा. अमृता का आखिरी समय बहुत तकलीफों और दर्द में बीता।. बाथरूम में गिर जाने की वजह से उनकी हड्डी टूट गई थी, जो कभी ठीक नहीं हुई और इस दर्द ने उनका दामन कभी नहीं छोड़ा. इमरोज़ ने अंतिम दिनों में उनका बहुत ख़्याल रखा. उन्होंने अमृता की बीमारी को भी अपने प्यार से खूबसूरत बना दिया था. 31 अक्टूबर 2005 में उन्होंने आख़िरी सांसें लीं.
दुनिया छोड़ने से पहले अमृता प्रीतम अपने घर का पता कुछ इस तरह देती हैं-
“आज मैंने
अपने घर का नम्बर मिटाया है
और गली के माथे पर लगा
गली का नाम हटाया है
और हर सड़क की
दिशा का नाम पोंछ दिया है
पर अगर आपको मुझे ज़रूर पाना है
तो हर देश के, हर शहर की,
हर गली का द्वार खटखटाओ
यह एक शाप है, यह एक वर है
और जहाँ भी
आज़ाद रूह की झलक पड़े
-समझना वह मेरा घर है.”
ब्रेकिंग न्यूज़ हिंदी में सबसे पहले पढ़ें News18 हिंदी| आज की ताजा खबर, लाइव न्यूज अपडेट, पढ़ें सबसे विश्वसनीय हिंदी न्यूज़ वेबसाइट News18 हिंदी|
Tags: Books, Hindi Literature, Hindi poetry, Hindi Writer, Literature, Literature and Art
FIRST PUBLISHED : May 16, 2023, 13:40 IST








