भवानी प्रसाद मिश्र की मशहूर कविता- ‘चार कौए उर्फ चार हौए’

Share Now:

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

भवानी प्रसाद मिश्र को उनके कविता संग्रह ‘बुनी हुई रस्सी’ के लिए उन्हें 1972 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया. मध्य प्रदेश सरकार ने उन्हें साहित्य में विशिष्ठ योगदान के लिए ‘शिखर सम्मान’ और उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान ने ‘साहित्यकार सम्मान’ से अलंकृत किया. आपातकाल के विरोध में भवानी प्रसाद मिश्र ने नियमपूर्वक सुबह-दोपहर-शाम कविताएं लिखीं जो ‘त्रिकाल सन्ध्या’ नामक पुस्तक में प्रकाशित भी हुईं. इस संग्रह की पहली कविता ‘चार कौए’ आपातकाल के कर्ता-धर्ताओं पर एक तीखा व्यंग्य है-

बहुत नहीं थे सिर्फ चार कौए थे काले
उन्होंने यह तय किया कि सारे उड़ने वाले
उनके ढंग से उड़ें, रुकें, खायें और गायें
वे जिसको त्योहार कहें सब उसे मनायें।

कभी-कभी जादू हो जाता है दुनिया में
दुनिया भर के गुण दिखते हैं औगुनिया में
ये औगुनिए चार बड़े सरताज हो गये
इनके नौकर चील, गरूड़ और बाज हो गये।

हंस मोर चातक गौरैयें किस गिनती में
हाथ बांधकर खडे़ हो गए सब विनती में
हुक्म हुआ, चातक पंछी रट नहीं लगायें
पिऊ-पिऊ को छोड़ें कौए-कौए गायें।

बीस तरह के काम दे दिए गौरैयों को
खाना-पीना मौज उड़ाना छुटभैयों को

कौओं की ऐसी बन आयी पांचों घी में
बड़े-बड़े मनसूबे आये उनके जी में
उड़ने तक के नियम बदल कर ऐसे ढाले
उड़ने वाले सिर्फ रह गये बैठे ठाले।

आगे क्या कुछ हुआ सुनाना बहुत कठिन है
यह दिन कवि का नहीं चार कौओं का दिन है
उत्सुकता जग जाये तो मेरे घर आ जाना
लंबा किस्सा थोड़े में किस तरह सुनाना।
—

Tags: Hindi Literature, Hindi poetry, Hindi Writer, Literature

Source link

Up Head Line
Author: Up Head Line

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

और पढ़ें