
एक धमाका हुआ ट्रेनें टकराईं और पल भर में जीवित इंसान शवों में परिवर्तित हो गये, लाशों के ढेर, करुण क्रन्दन, रुदन, चित्कारें, चीखें ऐसा मंजर, जिससे ना केवल देखने वालों के बल्कि सुनने वालों के भी दिल दहल जाएं. असामयिक, अप्रत्याशित, अप्राकृतिक हादसों से धरती-आसमान को भी कंपाने वाली सच्चाई, बिलखती रुहों की तड़प, सिसकती जिन्दगियों की कसक और जीवित प्राणियों की छटपटाहट देखी नहीं जा रही थी, मौत का इतना खतरनाक मंजर मानो सारे जहां से खुशियां एकदम रूठ गई हों.
उफ्फ जिन्दगी की कितनी कटु और भयावह सच्चाई, कितना दर्द, कितना रुदन, असहनीय पीड़ा जिसका आदि है ना अन्त, अपने अजीज रिश्तों को सूनी आंखों और शून्य दिल से खोजना, बदहवास हो सम्बन्धों को गैरों के बीच ढूंढ़ना और हर गैर की मदद के लिए आगे आना, अपने पराये की परिभाषा से विरत हो बस जिन्दगी को बचाना और दर्द बांटना… ऐसा दर्दनाक समय किसी की जिन्दगी का हिस्सा ना बने.
टकरायी ट्रेनों के दर्दनाक हादसे ने जिन्दगी की विनाशलीला रच दी, पल भर में सृजन विनाश में बदल गया और जिन्दगियां मौत के ढेर में तब्दील हो गयीं, जिनके अपने चले गये हैं या जो क्षत विक्षत हो मौत से जूझ रहें हैं, उनके दर्द को शब्दों की जरूरत ही नहीं है, ऐसा भयावह मंजर और ऐसी पीड़ादायक मृत्यु देखकर हर किसी की अंतरात्मा घायल हुई है.
मौत का साक्षात्कार स्वयं के जीवन के पृष्ठों को खोलकर सामने रख रहा है कि इससे ज्यादा कष्टकारी और क्या होगा. अचानक हुई दुर्घटना जिन्दगियों पर भारी पड़ गयी. ट्रेन में अलग-अलग लोगों का हंसता संसार जो कुछ पलों के लिए ही बनता है. झटके में ही बिखर गया और संसार को रूला गया. दर्दनाक पीड़ा से गुजरता जीवन, जिन्दगी की परिभाषा को बयान करते नजर आये, मृतक मां की छाती से चिपका शिशु बिलख-बिलखकर चिरनिद्रा में विलीन हो गया, शायद नन्हा जीव मां से विलग हो रह नहीं सकता था, बदहवास पिता अपने बच्चे को ढूंढ़ता है, कहां है रे? मिल क्यों नहीं रहा. अपनी असमर्थता पर आंसू बहा रहा था, बेटे के शव को देखकर रोने के अलावा काई चारा ही नहीं था.
पति को पागलों के समान ढूंढ़ती पत्नी की पीड़ा तब और भी बढ़ गयी जब शिनाख्त में पति का शव पहचान में आ गया. कोरोमण्डल एक्सप्रेस, जो 128 किमी प्रति घण्टे की रफ्तार से दौड़ रही थी और बेंगलुरु सुपरफास्ट ट्रेन, जो 116 किमी की रफ्तार से दौड़ रही थी, अचानक ही एक दूसरे से टकरा गईं.
कितनी ही खुशियां चीत्कार में बदल गयीं, समय का खेल और लोगों का दुर्भाग्य की मौत ने जिन्दगी पर झपट्टा मार लिया, ओडिशा के बालासोर में हुए ट्रेन हादसे में मृतकों की संख्या अनुमान से ज्यादा ही दिखाई देती है. कोरोमण्डल एक्सप्रेस के यात्रियों की मौतें हुई हैं, पर मौत की भयावहता सबने देखी है. ऐसे हादसे समय असमय होते ही रहते हैं, कुछ तकनीकी खराबियों से, कुछ लापरवाही से या कुछ काल का संकेत ही हैं.
2016 के बाद का यह सबसे बड़ा ट्रेन हादसा है. इससे पहले 2016 में जब ट्रेन दुर्घटना हुई थी, तब भी जिन्दगियों की बहुत क्षति हुई थी. जीवन क्षणिक है, लेकिन इसका त्रासदी झेलकर अन्त होना काफी दुर्भाग्यपूर्ण है. कुछ ही पलों में अरमानों का, चाहतों का, जीने की लालसाओं का अन्त हो गया, कुछ सोच ही नहीं पाये, घर से चले तो वापसी हो ही नहीं पायी, आधे अधूरे जीवन की यादों को समेट भी नहीं पाये कि जीवन ही समाप्त हो गया. किसी अपने के लिए लिखी कविताएं उस तक पहुंच ही नहीं पायीं. पिता पुत्र का भविष्य संवार ही नहीं पाया, किलकारियां शान्त हो गयीं.
लड़ाई-झगड़े, आशा-निराशा, पाना-खोना, रूठना-मनाना, अपना-पराया, माया-मोह एक पल भी तो नहीं लगा, इन सबको छोड़कर दूर जाने में, पल भर में ही सब समाप्त हो गया. कहने को असंख्य अध्याय हैं जिन्दगी के, लेकिन हर पन्ने पल में पलट गये, और अपने पीछे भयावह सच और प्रश्नों को छोड़ गये.
ट्रेन हादसे के क्या कारण हैं? क्या गलती हुई जो ये हादसा हुआ, कौन दोषी है, कार्यवाही होनी चाहिए? सरकार की लापरवाही है, कवच प्रणाली यदि नहीं थी तो क्यों नहीं थी, होनी चाहिए थी, इतने लोग तड़पकर तो नहीं मरते, देखने वालों की भीड़, दिलासा देने वालों की सद्भावनाएं और क्षति की भरपाई के लिए पैसों का भुगतान.
दुखी मन की तकलीफ और लौटकर ना आने वालों का इन्तजार पर मरने वालों ने जो पीड़ा सही, उस सबका मूल्य इन सबसे कहीं ज्यादा है, ऐसे पल जो कल्पना से भी परे होते हैं, जिनके सोचने से भी मन डरता है, वो जब सच्चाई बनकर सहने पड़ते हैं तो कितना साहस जुटाना पड़ता होगा, कितना मनोबल चाहिए जब हिम्मत साथ छोड़ दे, अपनी सांसों की डोर जब टूटती दिखाई दे तो थामना कितना मुश्किल होता होगा, तड़पती आत्मा जब घायल होती होगी और शरीर पीड़ा सहता होगा तो व्यक्ति की तो सहन शक्ति ही जवाब दे जाती होगी.
हादसे में एक पीड़ित का कहना कि अचानक तेज धमाका हुआ और जैसे ही उसकी आंखें खुली उसने देखा कि उसके ऊपर दस पन्द्रह लोग पड़े हैं, वो कुछ भी सोचने में असमर्थ था. किसी के हाथ नहीं हैं, किसी के पैर, किसी का मुंह नहीं है, किसी का धड़, क्षत-विक्षत शरीरों का दर्शन हाहाकार, रुदन, क्षति और दर्द का सैलाब, अपने जीवित होने के अहसास को महसूस करके भी प्राणों का संकट देख आत्मा तक कांप उठी. जो चले गये वो तो शान्त हो गये, लेकिन जो जीवित हैं, उनकी व्यथा तो अनुमान से भी परे है, जीवित हैं लेकिन मौत को निकट से छूकर आये हैं, जीवन जो बहुमूल्य था, खो गया है लेकिन हर दिल की भावनाएं, प्रतिक्रियाएं काफी संवेदनशील हैं. लोगों के मन आहत हैं, नियति के प्रहार के आगे सब नत हैं, मृत्यु जो एक सच्चाई है, उस सच को स्वीकार करना हर किसी की मजबूरी है. मौत के अनेकों रूप समय-समय पर जीवन को छलते ही रहते हैं.






