गर्मियों में ठंडक के लिए आदिवासी पीते हैं ये ड्रिंक, कंट्रोल में रहती है डायबिटीज

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रामकुमार नायक/बस्तर. जून का महीना चल रहा है और गर्मी चरम पर है. लोगों का गर्मी से हाल बेहाल हो गया है. यूं तो बाजार में अब कोका कोला, पेप्सी, स्प्राइट जैसे शीतल पेय पदार्थ मिलने लगे हैं, लेकिन एक पेय पदार्थ ऐसा है जिसका कोई तोड़ नहीं है. हम बात कर रहे हैं ‘मड़िया पेज’ की, जो आदिवासियों की पहचान का एक हिस्सा भी है.

यह एक ऐसा पेय पदार्थ है जो लोगों को लू की चपेट में आने से बचाता है और बस्तर के लोग गर्मी में इसका भरपूर इस्तेमाल करते हैं. इसे बस्तर की कोल्डड्रिंक भी कह सकते हैं. इस पेय का कोई साइड इफेक्ट नहीं होता है. दरअसल मड़िया, आदिवासी इलाकों में ज्यादातर पैदा होने वाला एक मोटा अनाज होता है. जिसके आटे को मिट्टी के बर्तन में रात भर भिगो कर रखते हैं. सुबह पानी में चावल डालकर पकाते हैं. चावल पकने पर उबलते हुए पानी में मडिया के भिगोए आटे को घोलते हैं. स्थानीय हल्बी बोली में इसे पेज कहते हैं.

इससे होते हैं कई फायदे

पकने पर उतारकर ठंडा करके 24 घंटे तक इसका सेवन करते हैं. इससे शरीर को ठंडक मिलती है और भूख भी शांत होती है. ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरी करने वाली महिलाओं और पुरुषों के लिए मड़िया पेज किसी लस्सी और कोल्डड्रिंक से कम नहीं होती. शरीर में ठंडक पहुंचाने के साथ ही यह कैल्शियम और डायबिटीज मरीजों के लिए रामबाण है. यह शरीर के तापमान को नियंत्रित करने के साथ- साथ पाचन क्रिया को भी ठीक करता है. यह पौष्टिक व बलवर्धक होने के साथ ही ऊर्जा का मुख्य स्रोत भी है. इसमें मुख्य रूप से अमीनो अम्ल, कैलशियम, लौह तत्व, ग्लूकोज, प्रोटीन,फाइबर प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं.

आयुर्वेदिक डॉक्टर मिश्रा ने बताया कि यह कुपोषण और मधुमेह के लिए भी कारगर औषधीय गुणों से भरपूर है. सेहत के लिए काफी फायदेमंद होने की वजह से गर्मी के मौसम में अधिकतर ग्रामीण मड़िया पेज ही पीते हैं. मडिया पेज बस्तर की आदिवासी संस्कृति की विशिष्ट पहचान है. स्थानीय ग्रामीण गर्मी के दिनों में मड़िया पेज का सर्वाधिक इस्तेमाल करते है. मड़िया को हिन्दी में रागी कहा जाता है.

Tags: Bastar news, Chhattisagrh news, Local18, Summer

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Up Head Line
Author: Up Head Line

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