हाइलाइट्स
जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी के चुनाव को अमान्य करने वाला फैसला सुनाया तो सुप्रीम कोर्ट में ग्रीष्मावकाश चल रहा था
तब इस मामले को जिस अवकाशकालीन न्यायाधीश ने देखा वो दो बार विधायक रह चुके थे और मंत्री भी
न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने 12 जून 1975 को फैसला सुनाते हुए इंदिरा गांधी के लोकसभा चुनाव को रद्द कर दिया और 06 साल के लिए किसी भी संवैधानिक पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया. हाईकोर्ट ने उन्हें इस फैसले के खिलाफ उच्च अदालत में अपील करने के लिए 15 दिनों का समय दिया. हालांकि इस फैसले पर ज्यादातर लोगों को हैरानी ही हुई. कुलदीप नैयर ने अपनी किताब में लिखा ये फैसला एक चींटी को मारने के लिए हथौड़े के इस्तेमाल जैसा था. अब जब इंदिरा गांधी ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की तो सुप्रीम कोर्ट तब ग्रीष्मावकाश पर था.
सुप्रीम कोर्ट में अब भी गर्मी के दिनों में ग्रीष्मावकाश होता है. इन दिनों जरूरी मामलों की सुनवाई एक अवकाशकालीन न्यायाधीश के द्वारा की जाती है. तब सुप्रीम कोर्ट में अवकाशकालीन जज जस्टिस वी आर कृष्णा अय्यर थे.
23 जून को सुप्रीम कोर्ट में श्रीमती इंदिरा गांधी की याचिका पर सुनवाई शुरू हुई. अगले दिन जस्टिस अय्यर ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर सशर्त रोक लगा दी. अदालत ने कहा, श्रीमती इंदिरा गांधी संसद में उपस्थित हो सकती हैं लेकिन जब तक कि उनकी याचिका पर फैसला नहीं हो जाता, वह संसद में होने वाले मतदान में हिस्सा नहीं ले सकतीं. हां अदालत ने ये भी कहा कि अपील का फैसला होने तक वह प्रधानमंत्री बनी रह सकती थीं.
अब जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस कृष्णा अय्यर कौन थे. बाद में जस्टिस नैय्यर ने पत्रकार कुलदीप नैयर से वर्ष 2009 में एक मुलाकात में कहा कि लोग इमर्जेंसी के लिए उन्हें भी जिम्मेदार मानते रहे हैं. क्योंकि उनके फैसले के अगले ही दिन इंदिरा गांधी ने आपात काल संबंधी आर्डिनेंस पर तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से हस्ताक्षर करके इसे देशभऱ में लागू कर दिया था.
जस्टिस कृष्णा अय्यर विद्वान जज थे. हालांकि उन पर ये आऱोप लगे कि उन्होंने इंदिरा गांधी को राहत दे दी. हालांकि अय्यर ने इन आरोपों को नकारते हुए यही कहा कि उन्होंने जो किया वह कानून सम्मत था. (फाइल फोटो)
कुलदीप नैय्यर ने अपनी किताब” बियांड द लाइंस – एन ऑटोबॉयोग्राफी” में लिखा, फैसले के कुछ दिन बाद वह जस्टिस कृष्णा अय्यर से मिले और पूछा कि क्या इंदिरा गांधी संबंधी फैसले से पहले कोई उनसे मिलने आय़ा था. उन्होंने महाराष्ट्र के कम्युनिस्ट नेता एस ए डांगे और सुप्रीम कोर्ट के एक तत्कालीन जज पीएन भगवती का नाम लिया.
पेशे से वकील थे लेकिन विधायक और मंत्री भी बने
जस्टिस वैद्यनाथनपुरम रामा कृष्णा अय्यर को वैसे भारतीय न्याय क्षेत्र कई बेहतरीन मामलों के लिए याद रखता था. उनका करियर सियासत में एक विधायक के तौर पर शुरू हुआ और सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति के तौर पर खत्म हुआ. उसके बाद उन्होंने अपने जीवन का ज्यादातर समय किताबें लिखने में लगाया.
जस्टिस अय्यर को देश जूडिशियल एक्टिविज्म का अग्रणी माना जाता है. उन्होंने मद्रास राज्य के मंत्री रहते हुए गरीबों और दबे कुचलों को न्याय दिलाने में बहुत मदद किया था. वह मानवाधिकार एक्टिविस्ट भी थे. सामाजिक न्याय और पर्यावरण के लिए अभियान चलाए. खेलों को लेकर बहुत उत्साही थे.
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस के तौर पर रिटायर होने के बाद कृष्णा अय्यर वर्ष 1987 में इंदिरा गांधी की कांग्रेस के खिलाफ विपक्ष के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार भी बने. हालांकि वह जीत नहीं सके. (फाइल फोटो)
पद्म विभूषण से सम्मानित हुए जेल भी गए
अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के दौरान उन्हें 1999 में पदम विभूषण से सम्मानित किया गया. कृष्णा अय्यर का जन्म 15 नवंबर 1915 में एक तमिल ब्राह्मण परिवार में पलक्कड़ में हुआ था. उनके पिता जाने माने वकील थे लिहाजा उन्होंने यही पेशा अपनाया. मालाबार में जब वहां के राजा के खिलाफ प्रदर्शनकारियों को कुचलने का कुचक्र चला, तो उन्होंने इसका विरोध किया और कम्युनिस्टों को पुलिस टार्चर के खिलाफ जब मुकदमा लड़ने गए तो उन्हें खुद एक महीने के लिए जेल में डाल दिया गया.
कई महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री थे
अय्यर ने 1938 में वकालत शुरू की. 1952 में वह मद्रास विधानसभा के लिए निर्दलीय प्रत्याशी की हैसियत से चुने गए. 05 साल के बाद वह फिर थालासे विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर खड़े हुए, हालांकि इस बार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने उनका समर्थन किया. जीतने के बाद उन्हें ईएमएस नंबूदरीपाद सरकार में महत्वपूर्ण विभागों का मंत्री बनाया गया, जिसमें गृह, जेल, कानून, सिंचाई, सामाजिक कल्याण जैसे विभाग शामिल थे. इसी दौरान उन्होंने कानून और जेल के मामलों में रिफॉर्म के कई काम किए.
बाद में जब नेहरू की केंद्र सरकार ने पहली बार ईएमएस नंबूदरीपाद की राज्य सरकार को बर्खास्त किया तो वह वापस वकालत करने लगे. कहा जाता है कि नेहरू ने ये फैसला तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष इंदिरा गांधी के कहने पर किया था. 1965 में अय्यर फिर विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए खड़े हुए लेकिन अबकी बार वह हार गए.
केरल हाईकोर्ट के जज बने और फिर सुप्रीम कोर्ट में पहुंचे
वह 12 जुलाई 1968 में केरल हाईकोर्ट के जज बने. फिर उन्हें 1973 में पदोन्नति देकर सुप्रीम कोर्ट में भेज दिया गया. फिर उन्होंने कानून क्षेत्र में कई उल्लेखनीय काम किए. कहा जाता है कि पीआईएल की अवधारणा का काम उन्होंने और बाद में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने पीएन भगवती के साथ मिलकर किया था. उन्होंने हमेशा फांसी की सजा का विरोध किया. बकौल उनके केवल दुर्लभतम से दुर्लभतम मामलों में ही फांसी होनी चाहिए.
हालांकि बहुत से लोगों ने बाद में ये कहा कि इंदिरा गांधी को राहत देकर उन्होंने गलत काम किया. तब वह इस तरह के आरोपों को खारिज कर देते थे. उनका कहना था कि उन्होने इंदिरा गांधी को सशर्त राहत दी कि वह संसद में मतदान में हिस्सा नहीं ले सकतीं, जो सही फैसला था.
वेंकटरमन के खिलाफ राष्ट्रपति का चुनाव भी लड़ा
वह 14 नवंबर 1980 तक सुप्रीम कोर्ट में जज रहे. वर्ष 2014 में 99 साल की उम्र में उनका निधन हुआ. वैसे कृष्णा अय्यर वर्ष 1987 में कांग्रेस उम्मीदवार आर वेंकटरमन के खिलाफ विपक्ष के उम्मीदवार के तौर पर राष्ट्रपति चुनाव में खड़े हुए. हालांकि इसमें वह जीत नहीं पाए. कृष्णा अय्यर ने अपने जीवन में 70-100 किताबें लिखीं, जिसमें 04 किताबें ट्रैवलॉग थीं.
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Tags: Emergency 1975, Indira Gandhi, Supreme Court, Supreme court of india
FIRST PUBLISHED : June 15, 2023, 13:09 IST






