सूर्य की रोशनी से बदलता है इस तालाब के पानी का रंग, भाप इंजन ट्रेन से सामाग्री ढोकर हुआ था तैयार


अर्पित बड़कुल/दमोह. जब बात पुराने जल स्त्रोतों की आती है तब बुंदेलखंड के दमोह जिले का नाम सबसे पहले लोगों की जुबान पर आता है. यहां प्राचीन किले हो या फिर तालाब, बावड़ियां जो आज भी शहर की शोभा बढ़ा रही हैं. भले ही इन्हें सहेजने में जिला प्रशासन नाकाम हो, लेकिन यह जलस्त्रोत प्राचीन धरोहर के रूप में आज भी दूर दराज के ग्रामीण इलाकों में मौजूद है. उन्हीं तालाबों में से एक तेंदूखेड़ा ब्लॉक के दरौली गांव का तालाब है, जिसका निर्माण करने के लिए जिला प्रशासन को ब्रिटिश कालीन भांप इंजन रेलगाड़ी चलानी पड़ी थी. तब कही जाकर सन 1962 में दरौली तालाब का निर्माण कार्य पूर्ण हुआ था.

बातचीत के दौरान बहेरिया गांव में रहने वाले बड़े बुजुर्गों ने बताया कि इस इलाके में पानी की बहुत ज्यादा दिक्कत थी. आदमी हो या फिर मवेशी बिना पानी के नहीं रह सकता. जिसको लेकर आला अधिकारियों ने तालाब बनाने का निर्णय लिया, लेकिन तेंदूखेड़ा से तालाब निर्माण कार्य में लगने वाली सामग्री को निर्माण कार्य स्थान तक पहुंचाने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था.
इसको लेकर तालाब तक मुरम और पत्थरों को ले जाने के लिए भाप इंजन रेलगाड़ी चलाई गई थी. यह जिले और सागर संभाग का पहला ऐसा तालाब है जिसके निर्माण कार्य मे रेलगाड़ी से मुरम और पत्थर ढोए गए थे.

तालाब से सिंचित होती है करीब दो दर्जन गांव की जमीन

इसी तालाब से करीब दो दर्जन गांव की जमीन सिंचित होती है. इसे बनाने के लिए छुक छुक करती हुई भाप इंजन रेलगाड़ी दरौली से बहेरिया गांव तक दौड़ाई गई थी. पूर्व में इस भाप इंजन का खदानों और कुओं से पानी निकालने में 50 वर्षों तक उपयोग होता रहा.

सूर्य की रोशनी पड़ने पर पानी बदलता है रंग

इस तालाब के निर्माण कार्य के दौरान यहां काफी मात्रा में काले पत्थर की चट्टानों हुआ करती थी, जिन्हें तोड़ कर तालाब बनाया गया. लेकिन कुछ चट्टान आज भी तालाब के अंदर मौजूद हैं, जिस कारण सूरज की किरणें पड़ते ही यह पानी काला दिखाई पड़ता है. इस तालाब की गहराई करीब 100 फिट से अधिक बताई जाती है. जबकि इंजन को जिला मुख्यालय लाकर उस पर रंग रोगन करते हुए उसे दफ्तर की शोभा बना लिया गया. वहीं दूसरी ओर जिम्मेदारों की अनदेखी के चलते आज उसी रेलगाड़ी के कलपुर्जे तेंदूखेड़ा जल संसाधन विभाग के दफ्तर में भंगार में पड़े हुए है.

जल संसाधन विभाग के इंजीनियर शुभम अग्रवाल ने बताया कि सन 1962 में दरौली तालाब का निर्माण किया गया था, लेकिन निर्माण कार्य सामग्री को तालाब तक ले जाने के लिए काफी समस्या होती थी. इस वजह से भाप इंजन रेलगाड़ी दौड़ाई गई थी.

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