
‘बाल श्रम विरोधी दिवस’ की शुरुआत 2002 में हुई थी, फिर भी तब से अब तक बाल मजदूरी की वजह से करोड़ों बच्चों का बचपन समाप्त हो गया, लेकिन ये समस्या आज भी हमारे बीच मौजूद है. बाल श्रम धीरे-धीरे देश की नींव को खोखला कर रहा है. गरीबी, लाचारी और माता-पिता की प्रताड़ना के चलते आज भी देश के कई ऐसे बच्चे हैं जो बाल मजदूरी की दलदल में फंसे हुए हैं. इन बच्चों का समय स्कूल में कॉपी-किताबों, खेल-खिलौनों और दोस्तों के बीच नहीं बल्कि होटलों, घरों, कंपनियों में बर्तन धोने और झाडू-पोछा करने में बीतता है. न जाने कितने ऐसे बच्चे हैं, जिनका बचपन बाल मजदूरी की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है.
बाल श्रम केवल भारत तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह एक वैश्विक घटना है. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुमान के मुताबिक पूरे विश्व में तकरीबन 22 करोड़ बाल श्रमिक हैं. हर साल 12 जून को बाल मजदूरी के प्रति विरोध और जगरुकता फैलाने के मकसद से ‘विश्व बाल श्रम विरोधी दिवस’ मनाया जाता है. अगर बाल मजदूरी जैसी समस्या यूं ही बनी रही, तो आने वाले कुछ सालों में युवा शक्ति किसी काम की नहीं रहेगी. देश की 80 फीसदी ग्रामीण आबादी गरीबी का दंश झेल रही है. बाल मजदूरी के हालात में सुधार लाने के लिए सरकार ने साल 1986 में चाइल्ड लेबर ऐक्ट बनाया था, जिसके तहत बाल मजदूरी को अपराध माना गया. इसके बावजूद देश के हर गली-मोहल्ले और चौराहे पर कई बाल मजदूर काम करते हुए नजर आ जाते हैं. आपको बता दें, कि पूरे विश्व की तुलना में सबसे ज्यादा बाल मजदूर भारत में ही हैं. इन बाल श्रमिकों में 19 प्रतिशत के आसपास घरेलू नौकर हैं और बाकी के ग्रामीण, असंगठित क्षेत्रों में कृषि जैसी चीज़ों से जुड़े हुए हैं. देश में कई एनजीओ बाल मजदूरी के खिलाफ अपनी मुहिम चला रहे हैं… कई संगठनों ने बाल मजदूरी की समस्या को दूर करने के सकारात्मक प्रयास भी किए हैं, लेकिन संख्या कम होने की बजाय बढ़ ही रही है और गरीब घरों से आने वाले बच्चे ये सबकुछ करने को मजबूर हैं. अनेक प्रयासों के बाद भी बाल श्रम को पूरी तरह से समाप्त नहीं किया जा सका है, जिनमें कई बच्चे ऐसे भी हैं जो हफ्ते में सातों दिन काम करते हैं.
“फ़रिश्ते आ कर उनके जिस्म पर ख़ुश्बू लगाते हैं, वो बच्चे रेल के डिब्बों में जो झाड़ू लगाते हैं” मुन्नवर राना की ये शायरी मन मस्तिष्क पर ‘ठक्क’ से लगती है और नजाने कितने ऐसे सवालों का हिसाब मांगती है, जिनके जवाब देना मुश्किल हो जाता है. मनुष्य होने की बुनियादी शर्त है कविता. आज जब पूरा देश ‘विश्व बाल श्रम विरोधी दिवस’ के बारे में बात कर रहा है, तो हमारे कवि, शायर और गज़लकार भला उससे कैसे अछूते रह सकते हैं. यही तो वो वर्ग जिसने मनुष्य की हर पीड़ा को सबसे करीब से छूआ है और शब्दों में ढालकर दुनिया के सामने बहादुरी से पेश किया है. कविताएं मन के भाव को आकार देती हैं और कम शब्दों में बहुत कुछ कह जाने की ताकत रखती हैं.
सोच कर देखें तो दुनिया कविताओं के बिना कितनी अधूरी लगती है, जैसे इनका होना तो हमेशा से ही ज़रूरी था. कवि और उसकी कविता की कल्पना बहुत शक्तिशाली होती है. अपनी कल्पना के सहारे कवि दुनिया के तमाम दुखों को जुबान देने का काम करता है और महसूस होने वाले हर दर्द को अपनी रचना में बयान करता है. जिस तरह बचपन के खूबसूरत, कोमल और मासूम एहसास को सहजता और सरलता के साथ कविताओं में चित्रित करना मुश्किल होता है, उससे भी ज्यादा मुश्किल है इन मासूमों के दर्द और तकलीफ को लिखना, लेकिन शायरी जैसी विधा में कविओं-शायरों ने बच्चों के दर्द को भी शिद्दत से महसूस किया है और लिखा है. शायरी हो या गज़ल, नज़्म हो या कविता, इन सभी रचनात्मक शैलियों की अपनी एक सीमा है, ऐसे में भाषा की सतह पर बचपन के एहसाह को बयान करने में शायरी की भी अपनी सीमाएं हैं, फिर भी जितना कुछ लिखा गया है वो दर्द की सारी पर्तों को चंद शब्दों में खोल देने की कूवत रखता है.
आइए पढ़ते हैं, अब्बास ताबिश, मुन्नवर राना, बशीर बद्र, निदा फाज़ली, अतीक़ इलाहाबादी, मुज़्तर ख़ैराबादी, महशर बदायुनी, राशिद राही, सिराज फ़ैसल ख़ान, अंजुम तराज़ी और अशअर नजमी के वे चुनिंद शेर जो बच्चों पर लिखे गए, लेकिन उससे पहले पढ़ें ‘बेदिल हैदरी’ की मशहूर गज़ल ‘भूख चेहरों पे लिए चांद से प्यारे बच्चे’-
भूख चेहरों पे लिए चांद से प्यारे बच्चे
भूख चेहरों पे लिए चांद से प्यारे बच्चे
बेचते फिरते हैं गलियों में ग़ुबारे बच्चे
इन हवाओं से तो बारूद की बू आती है
इन फ़ज़ाओं में तो मर जाएंगे सारे बच्चे
क्या भरोसा है समुंदर का ख़ुदा ख़ैर करे
सीपियां चुनने गए हैं मिरे सारे बच्चे
हो गया चर्ख़-ए-सितमगर का कलेजा ठंडा
मर गए प्यास से दरिया के किनारे बच्चे
ये ज़रूरी है नए कल की ज़मानत दी जाए
वर्ना सड़कों पे निकल आएंगे सारे बच्चे
-बेदिल हैदरी
“फ़क़त माल-ओ-ज़र-ए-दीवार-ओ-दर अच्छा नहीं लगता
जहां बच्चे नहीं होते वो घर अच्छा नहीं लगता.”
“ये ज़िंदगी कुछ भी हो मगर अपने लिए तो
कुछ भी नहीं बच्चों की शरारत के अलावा.”
-अब्बास ताबिश
“फ़रिश्ते आ कर उनके जिस्म पर ख़ुश्बू लगाते हैं
वो बच्चे रेल के डिब्बों में जो झाड़ू लगाते हैं.”
-मुन्नवर राना
“उड़ने दो परिंदों को अभी शोख़ हवा में
फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते”
-बशीर बद्र
“बच्चों के छोटे हाथों को चांद सितारे छूने दो
चार किताबें पढ़ कर ये भी हम जैसे हो जाएंगे”
-निदा फ़ाज़ली
देव परी के क़िस्से सुन कर
भूखे बच्चे सो लेते हैं
-अतीक़ इलाहाबादी
“असीर-ए-पंजा-ए-अहद-ए-शबाब कर के मुझे
कहां गया मिरा बचपन ख़राब कर के मुझे.”
-मुज़्तर ख़ैराबादी
“जिस के लिए बच्चा रोया था और पोंछे थे आंसू बाबा ने
वो बच्चा अब भी ज़िंदा है वो महंगा खिलौना टूट गया”
-महशर बदायुनी
“अपने बच्चों को मैं बातों में लगा लेता हूं
जब भी आवाज़ लगाता है खिलौने वाला”
-राशिद राही
“किताबों से निकल कर तितलियां ग़ज़लें सुनाती हैं
टिफ़िन रखती है मेरी मां तो बस्ता मुस्कुराता है”
-सिराज फ़ैसल ख़ान
“इक मंज़र में पेड़ थे जिन पर चंद कबूतर बैठे थे
इक बच्चे की लाश भी थी जिस के कंधे पर बस्ता था”
-अंजुम तराज़ी
“सौंपोगे अपने बा’द विरासत में क्या मुझे
बच्चे का ये सवाल है गूंगे समाज से”
-अशअर नजमी
गौरलतब है, कि बाल श्रम को खत्म करने के लिए सबसे पहले देश से गरीबी को खत्म करना जरूरी है. इसके लिए सरकार को कुछ और कड़े कदम उठाने होंगे. लेकिन सिर्फ सरकार के कड़े कदम उठाने से इस समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि देश के हर नागरिक को अपना सहयोग देना होगा.
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Tags: Child Labor, Hindi Literature, Hindi poetry, Literature, World Child Labor Prohibition Day
FIRST PUBLISHED : June 12, 2023, 20:54 IST






