
सआदत हसन मंटो उर्दू के सर्वाधिक महत्वूर्ण, चर्चित और विवादास्पद लेखक हैं. उनके लिखे पर जितनी चर्चाएं उठी हैं, उतनी अन्य किसी लेखक को लेकर नहीं. उनकी खासियत थी, कि उन्होंने सिर्फ नये-नये विषयों पर ही नहीं लिखा बल्कि नये अंदाज़ेबयां और नज़रिये से भी लिखा और इसी एक बात ने उन्हें अपने समय का ही नहीं, बल्कि आज के समय का भी एक बड़ा कहानीकार बना दिया. मंटो के किस्सागो रूप की चर्चा अक्सर की जाती है. ये सही है कि किस्सागोई उन्हें खूब आती थी, लेकिन वे उसके गुलाम कभी नहीं बने. उर्दू की किस्सागोई की परंपरा से अलग उन्होंने किस्सागोई की नयी परंपरा का सूत्रपात किया. मंटों ने अपनी कहानियों में कथा-प्रसंगों को उतना ही खींचा, जितना की स्थिति के पीछे हरकतों को पकड़ने के लिए या चरित्र के भीतर की दुनिया को उजागर करने के लिए ज़रूरी है. इस बात में बिल्कुल संदेह नहीं कि मंटो ने अपने समय के अन्य लेखकों की तरह अपनी कहानियों के पात्रों और स्थितियों का विवेवचन-निरूपण करने के लिए मनोविज्ञान से लाभ उठाया. मंटो की कहानी-कला के दौर के बाद उनकी रचना-प्रक्रिया में ज़बरदस्त बदलाव आया, जिसका एक सिरा औरत-मर्द के संबंधों और वेश्याओं के चित्रण से जुड़ा हुआ है, तो दूसरा बंटवारे की त्रासदी से.
“ख़ुदाबख़्श आदमी मेहनती था. सारा दिन हाथ पर हाथ धर कर बैठना पसंद नहीं करता था, इसलिए उसने एक फ़ोटोग्राफ़र से दोस्ती की जो रेलवे स्टेशन के बाहर मिनट कैमरे से फ़ोटो खींचा करता था. उससे उसने फ़ोटो खींचना सीख लिया. फिर सुल्ताना से साठ रुपय लेकर कैमरा भी ख़रीद लिया. ख़ुदाबख़्श ने अपना काम शुरू कर दिया. काम चल निकला और दोनों अंबाला छावनी में ही रहने लगे. छावनी में खुदाबख्श के ज़रिए गोरे सुल्ताना के ग्राहक बन गए और उसकी आमदनी पहले से दोगुनी हो गई. अंबाला छावनी में वो बड़ी ख़ुशहाल थी. मगर एकाएक न जाने खुदाबख्श के दिल में क्या आया, कि उसने दिल्ली जाने की ठान ली. सुल्ताना खुदाबख्श को अपने लिए बहुत मुबारक समझती थी. उसने खुशी-खुशी दिल्ली आना स्वीकार कर लिया, बल्कि उसने ये भी सोचा कि बड़े शहर में जहां अमीर लोग रहते हैं, उस का धंधा और भी अच्छा चलेगा. जल्दी जल्दी घर का भारी सामान बेच-बाचकर वह खुदाबख्श के साथ दिल्ली आ गई…” लेकिन दिल्ली आकर सुल्ताना के साथ क्या हुआ, वो शंकर से मिली… उसकी काली सलवार का सपना पूरा हुआ कि नहीं? और हुआ भी तो कैसे…? एक काली सलवार के लिए उसे क्या-क्या करना पड़ गया, ये जानने के लिए पढ़ें मंटो की लोकप्रिय कहानी ‘काली सलवार…’
मंटो की कहानी : काली सलवार
देहली (दिल्ली) आने से पहले वह अंबाला छावनी में थी जहां कई गोरे इसके ग्राहक थे. इन गोरों से मिलने-जुलने के बाइस वो अंग्रेज़ी के दस पंद्रह वाक्य सीख गई थी. इनको वह आम बातचीत में इस्तेमाल नहीं करती थी, लेकिन जब वह देहली में आई और उसका कारोबार न चला तो एक रोज़ उसने अपनी पड़ोसन तमंचा जान से कहा. “दिस लैफ… वेरी बैड.” अर्थात् यह ज़िंदगी बहुत बुरी है जबकि खाने को ही नहीं मिलता.
अंबाला छावनी में उस का धंधा बहुत अच्छी तरह चलता था. छावनी के गोरे शराब पी कर उस के पास आ जाते थे और वो तीन चार घंटों ही में आठ दस गोरों को निपटा कर बीस-तीस रुपय पैदा कर लिया करती थी. ये गोरे उसके हम वतनों के मुक़ाबले में बहुत अच्छे थे. इस में कोई शक नहीं कि वे ऐसी भाषा बोलते थे, जिसका मतलब सुल्ताना की समझ में नहीं आता था मगर उन की भाषा से ये अनभिज्ञता उस के हक़ में बहुत अच्छी साबित होती थी. अगर वह उस से कुछ रियायत चाहते तो वो सर हिला कर कह दिया करती थी. “साहब, हमारी समझ में तुम्हारी बात नहीं आती.” और अगर वो उससे ज़रूरत से ज़्यादा छेड़छाड़ करते तो वो उन को अपनी ज़बान में गालियां देना शुरू कर देती थी. वे हैरत में उसके मुंह की तरफ़ देखते तो वह उन से कहती “साहब, तुम एक दम उल्लू का पट्ठा है, हरामज़ादा है- समझा?” यह कहते वक़्त वो अपने लहज़े में सख़्ती पैदा न करती बल्कि बड़े प्यार के साथ उनसे बातें करती. वे गोरे हंस देते और हंसते वक़्त वो सुल्ताना को बिल्कुल उल्लू के पट्ठे दिखाई देते.
मगर यहां देहली में वो जब से आई थी एक गोरा भी उसके घर नहीं आया था. तीन महीने उसको हिंदूस्तान के इस शहर में रहते हो गए थे जहां उसने सुना था कि बड़े लाट साहब रहते हैं, जो गर्मियों में शिमला चले जाते हैं, मगर सिर्फ़ छः आदमी उसके पास आए थे. सिर्फ़ छः, यानी महीने में दो और इन छः ग्राहकों से उसने ख़ुदा झूठ न बुलवाए तो साढ़े अठारह रुपय वसूल किए थे. तीन रुपय से ज़्यादा पर कोई मानता ही नहीं था. सुल्ताना ने इन में से पांच आदमियों को अपना रेट दस रुपय बताया था मगर ताज्जुब की बात है कि इन में से प्रत्येक ने यही कहा. “भई हम तीन रुपय से एक कोड़ी ज़्यादा न देंगे.” न जाने क्या बात थी कि इनमें से हर एक ने उसे सिर्फ़ तीन रुपय के काबिल समझा. चुनांचे जब छठा आया तो उसने ख़ुद इस से कहा. “देखो, मैं तीन रुपय एक टेम के लूंगी. इस से एक अधेला तुम कम कहो तो मैं न लूंगी. अब तुम्हारी मर्ज़ी हो तो रहो वर्ना जाओ.” छठे आदमी ने ये बात सुन कर तकरार न की और इस के यहां ठहर गया. जब दूसरे कमरे में दरवाज़े दरवाज़े बंद करके वो अपना कोट उतारने लगा तो सुल्ताना ने कहा. “लाइए एक रुपया दूध का.” उसने एक रुपया तो ना दिया लेकिन नए बादशाह की चमकती हुई अठन्नी जेब में से निकाल कर उसको दे दी और सुल्ताना ने भी चुपके से ले ली कि चलो जो आया है ग़नीमत है.
साढ़े अठारह रुपय तीन महीनों में…… बीस रुपय माहवार तो इस कोठे का किराया था जिस को मालिक-मकान अंग्रेज़ी भाषा में फ़्लैट कहता था. इस फ़्लैट में ऐसा पाख़ाना था जिसमें ज़ंजीर खींचने से सारी गंदगी पानी के ज़ोर से एक दम नीचे नल में नीचे ग़ायब हो जाती थी और बड़ा शोर होता था. शुरू शुरू में तो इस शोर ने उसे बहुत डराया था. पहले दिन जब वो शौच जाने के लिए इस पाख़ाना में गई तो उस के कमर में बहुत तेज़ दर्द हो रहा था. फ़ारिग़ हो कर जब उठने लगी तो उसने लटकी हुई ज़ंजीर का सहारा ले लिया. इस ज़ंजीर को देख कर उसने ख़याल किया चूंकि ये मकान ख़ास हम लोगों की रिहायश के लिए तैयार किए गए हैं ये ज़ंजीर इसलिए लगाई गई है कि उठते वक़्त तकलीफ़ न हो और सहारा मिल जाया करे, मगर ज्यूं ही उसने ज़ंजीर पकड़ कर उठना चाहा, ऊपर खट-खट सी हुई और फिर एक दम पानी इस शोर के साथ बाहर निकला कि डर के मारे इस के मुंह से चीख़ निकल गई.
ख़ुदाबख़्श दूसरे कमरे में अपना फोटोग्राफी का सामान दुरुस्त कररहा था और एक साफ़ बोतल में हाइड्रोकूनीन डाल रहा था, कि उसने सुल्ताना की चीख़ सुनी. दौड़ कर वह बाहर निकला और सुल्ताना से पूछा. “किया हुआ?…… ये चीख़ तुम्हारी थी?”
सुल्ताना का दिल धड़क रहा था. उसने कहा. “ये मुआ पाख़ाना है या क्या है. बीच में ये रेल गाड़ीयों की तरह ज़ंजीर किया लटका रखी है. मेरी कमर में दर्द था. मैंने कहा चलो इसका सहारा ले लूंगी, पर इस मुई ज़ंजीर को छेड़ना था कि वो धमाका हुआ कि मैं तुम से क्या कहूं.”
इस परखुदाबख्श बहुत हंसा था और उसने सुल्ताना को इस पैख़ाने की बाबत सब कुछ बता दिया था कि ये नए फैश का है जिस में ज़ंजीर हिलाने से सब गंदगी नीचे ज़मीन में धंस जाती है.
ख़ुदाबख़्श और सुल्ताना का आपस में कैसे संबंध हुआ ये एक लंबी कहानी है.खुदाबख्श रावलपिंडी का था. एंट्रेंस पास करने के बाद उसने लारी चलाना सीखा. चुनांचे चार बरस तक वो रावलपिंडी और कश्मीर के बीच लारी चलाने का काम करता था. इस के बाद कश्मीर में उस की दोस्ती एक औरत से हो गई. उसको भगा कर वो लाहौर ले आया. लाहौर में चूंकि उस को कोई काम न मिला. इसलिए उसने औरत को पेशे पर बिठा दिया. दो तीन बरस तक ये सिलसिला जारी रहा और फिर वह औरत किसी और के साथ भाग गई.खुदाबख्श को मालूम हुआ कि वो अंबाला में है. वो उस की तलाश में अंबाला आया जहां उस को सुल्ताना मिल गई. सुल्ताना ने उस को पसंद किया, चुनांचे दोनों का संबंध हो गया.
ख़ुदाबख़्श के आने से एकदम सुल्ताना का कारोबार चमक उठा. औरत चूंकि अंधविश्वासी थी, इसलिए उसने समझा किखुदाबख्श बड़ा भागवान है जिस के आने से इतनी तरक़्क़ी हो गई. चुनांचे इस विश्वास नेखुदाबख्श का महत्व उसकी दृष्टि में और भी बढ़ा दिया.
ख़ुदाबख़्श आदमी मेहनती था. सारा दिन हाथ पर हाथ धर कर बैठना पसंद नहीं करता था. चुनांचे उसने एक फ़ोटोग्राफ़र से दोस्ती पैदा की जो रेलवे स्टेशन के बाहर मिनट कैमरे से फ़ोटो खींचा करता था. उससे उसने फ़ोटो खींचना सीख लिया. फिर सुल्ताना से साठ रुपय लेकर कैमरा भी ख़रीद लिया. आहिस्ता आहिस्ता एक पर्दा बनवाया, दो कुर्सियां खरीदीं और फ़ोटो धोने का सब सामान लेकर उसने अलग अपना काम शुरू कर दिया.
काम चल निकला, चुनांचे उसने थोड़ी देर के बाद अपना अड्डा अंबाला छावनी में क़ायम कर दिया. यहां वो गोरों के फ़ोटो खींचता रहता. एक महीने के अंदर अंदर उस की छावनी के बहुत से गोरों से जान-पहचान हो गई. चुनांचे वह सुल्ताना को वहीं ले गया. यहां छावनी में खुदाबख्श के ज़रिया से कई गोरे सुल्ताना के मुस्तक़िल ग्राहक बन गए और उस की आमदनी पहले से दोगुनी हो गई.
सुल्ताना ने कानों के लिए बुंदे ख़रीदे. साढ़े पांच तोले की आठ कंगनीयां भी बनवा लीं. दस पंद्रह अच्छी अच्छी साड़ियां भी जमा कर लीं. घर में फ़र्नीचर वग़ैरा भी आग या. निष्कर्ष यह कि अंबाला छावनी में वो बड़ी ख़ुशहाल थी. मगर एकाएक न जाने खुदाबख्श के दिल में क्या समाई कि उसने देहली जाने की ठान ली. सुल्ताना इनकार कैसे करती जबकि खुदाबख्श को अपने लिए बहुत मुबारक ख़याल करती थी. उसने ख़ुशी ख़ुशी देहली जाना क़बूल कर लिया. बल्कि उसने ये भी सोचा कि इतने बड़े शहर में जहां लाट साहब रहते हैं, उस का धंधा और भी अच्छा चलेगा. अपनी सहेलियों से वो देहली की तारीफ़ सुन चुकी थी. फिर वहां हज़रत निज़ाम उद्दीन औलिया की दरगाह थी, जिसमें उसे बेहद श्रद्धा थी. चुनांचे जल्दी जल्दी घर का भारी सामान बेच-बाचकर वह खुदाबख्श के साथ देहली आ गई. यहां पहुंच कर खुदाबख्श ने बीस रुपय माहवार पर एक छोटा सा फ़्लैट ले लिया जिस में वो दोनों रहने लगे.
एक ही क़िस्म के नए मकानों की लंबी सी क़तार सड़क के साथ साथ चली गई थी. म्यूनसिंपल कमेटी ने शहर का एक भाग ख़ास वेश्याओं के लिए नियत कर दिया था कि वे शहर में जगह-जगह अड्डे न बनाएं. नीचे दुकानें थीं और ऊपर दो मंज़िला रिहायशी फ़्लैट. चूंकि सब इमारतें एक ही डिज़ाइन की थीं इसलिए शुरू शुरू में सुल्ताना को अपना फ़्लैट तलाश करने में बहुत दिक्कत महसूस हुई थी पर जब नीचे लांडरी वाले ने अपना बोर्ड घर की पेशानी पर लगा दिया तो उसको एक पक्की निशानी मिल गई- ‘यहां मैले कपड़ों की धुलाई की जाती है.’ यह बोर्ड पढ़ते ही वह अपना फ़्लैट तलाश कर लिया करती थी. इसी तरह उसने और बहुत सी निशानीयां क़ायम करली थीं. मसलन बड़े बड़े अक्षरों में जहां ‘कोयले की दुकान’ लिखा था वहां उस की सहेली हीराबाई रहती थी जो कभी कभी रेडीयोघर में गाने जाया करती थी. जहां ‘यात्रियों के खाने का आला इंतिज़ाम है’ लिखा था, वहां उस की दूसरी सहेली मुख़तार रहती थी. निवाड़ के कारख़ाने के ऊपर अनवरी रहती थी जो उस कारख़ाने के सेठ के यहां नौकरी करती थी. चूंकि सेठ साहब को रात के वक़्त अपने कारख़ाना की देख भाल करना होती थी इसलिए वह अनवरी के पास ही रहते थे.
दुकान खोलते ही ग्राहक थोड़े ही आते हैं. चुनांचे जब एक महीने तक सुल्ताना बेकार रही तो उसने यही सोच कर अपने दिल को तसल्ली दी, पर जब दो महीने गुज़र गए और कोई आदमी उस के कोठे पर न आया तो उसे बहुत चिंता हुई. उसने खुदाबख्श से कहा. “क्या बात है खुदाबख्श, दो महीने आज पूरे हो गए हैं हमें यहां आए हुए, किसी ने इधर का रुख़ भी नहीं किया. मानती हूं आजकल बाज़ार बहुत मंदा है, पर इतना मंदा भी तो नहीं कि महीने भर में कोई शक्ल देखने ही में न आए.” खुदाबख्श को भी ये बात बहुत अर्से से खटक रही थी मगर वो ख़ामोश था, पर जब सुल्ताना ने ख़ुद बात छेड़ी तो उसने कहा. “मैं कई दिनों से इस बारे में सोच रहा हूं. एक बात समझ में आती है, वो ये कि जंग की वजह से लोग बाग दूसरे धंधों में पड़ कर इधर का रस्ता भूल गए हैं- या फिर ये हो सकता है कि… ” वो इस के आगे कुछ कहने ही वाला था कि सीढ़ियों पर किसी के चढ़ने की आवाज़ आई. खुदाबख्श और सुल्ताना दोनों इस आवाज़ की तरफ़ ध्यान दिया. थोड़ी देर के बाद दस्तक हुई. खुदाबख्श ने लपक कर दरवाज़ा खोला. एक आदमी अंदर दाख़िल हुआ. ये पहला ग्राहक था जिससे तीन रुपय में सौदा तय हुआ. इसके बाद पांच और आए यानी तीन महीने में छः, जिनसे सुल्ताना ने सिर्फ़ साढ़े अठारह रुपय वसूल किए.
बीस रुपय माहवार तो फ़्लैट के किराया में चले जाते थे, पानी का टैक्स और बिजली का बिल अलग था. इस के इलावा घर के दूसरे ख़र्च थे- खाना पीना, कपड़े लत्ते, दवा दारू और आमदनीी कुछ भी नहीं थी. साढ़े अठारह रुपय तीन महीने में आए तो उसे आमदनीी तो नहीं कह सकते. सुल्ताना परेशान हो गई. साढ़े पांच तोले की आठ कंगनियां जो उसने अंबाले में बनवाई थीं आहिस्ता आहिस्ता बिक गईं. आख़िरी कंगनी की जब बारी आई तो उसने खुदाबख्श से कहा, “तुम मेरी सुनो और चलो वापस अंबाले में यहां क्या धरा है?… भई होगा यहां लाट साहब, पर हमें यह शहर रास नहीं आया. तुम्हारा काम भी वहां ख़ूब चलता था. चलो, वहां चलते हैं. जो नुक़्सान हुआ है उसको अपना सिर-सदक़ा समझो. इस कंगनी को बेच कर आओ, मैं असबाव वग़ैरा बांध कर तैयार रखती हूं. आज रात की गाड़ी से यहां से चल देंगे.”
ख़ुदाबख़्श ने कंगनी सुल्ताना के हाथ से ले ली और कहा. “नहीं जानेमन, अंबाला अब नहीं जाएंगे, यहीं दिल्ली में रह कर कमाएंगे. ये तुम्हारी चूड़ियां सब की सब यहीं वापस आयेंगी . अल्लाह पर भरोसा रखो. वो बड़ा कारसाज़ है. यहां भी वो कोई न कोई अस्बाब बना ही देगा.”
सुल्ताना चुप हो रही. चुनांचे आख़िरी कंगनी हाथ से उतर गई. बुच्चे हाथ लेकर कर उसको बहुत दुख होता था, पर क्या करती, पेट भी तो आख़िर किसी हीले से भरना था.
जब पांच महीने गुज़र गए और आमदनी ख़र्च के मुक़ाबले में चौथाई से भी कुछ कम रही तो सुल्ताना की परेशानी और ज़्यादा बढ़ गई. खुदाबख्श भी सारा दिन अब घर से ग़ायब रहने लगा था. सुल्ताना को इसका भी दुख था. इसमें कोई शक नहीं कि पड़ोस में उस की दो तीन मिलने वालियां मौजूद थीं जिन के साथ वो अपना वक़्त काट सकती थी. हर रोज़ उन के यहां जाना और घंटों बैठे रहना उस को बहुत बुरा लगता था. चुनांचे आहिस्ता आहिस्ता उसने इन सहेलीयों से मिलना-जुलना बिलकुल छोड़ दिया. सारा दिन वो अपने सुनसान मकान में बैठी रहती. कभी छालियां काटती रहती, कभी अपने पुराने और फटे हुए कपड़ों को सीती रहती और कभी बाहर बालकोनी में आकर जंगले के साथ खड़ी हो जाती और सामने रेलवे शेड में खड़े और चलते इंजनों की तरफ़ घंटों बेमतलब देखती रहती.
सड़क की दूसरी तरफ़ माल गोदाम था जो उस कोने से इस कोने तक फैला हुआ था. दाहिने हाथ को लोहे की छत के नीचे बड़ी बड़ी गांठें पड़ी रहती थीं और हर क़िस्म के माल अस्बाब के ढेर से लगे रहते थे. बाएं हाथ को खुला मैदान था जिस में बेशुमार रेल की पटड़ीयां बिछी हूई थीं. धूप में लोहे की ये पटरियां चमकतीं तो सुल्ताना अपने हाथों की तरफ़ देखती जिन पर नीली नीली रगें बिलकुल इन पटरियों की तरह उभरी रहती थीं, इस लंबे और खुले मैदान में हरवक़त इंजन और गाड़ियां चलती रहती थीं. कभी इधर कभी उधर. इन इंजनों और गाड़ीयों की छक छक फ़क़ फ़क़ सदा गूंजती रहती थी. सुबह सवेरे जब वो उठ कर बालकोनी में आती तो एक अजीब समां नज़र आता. धुंदलके में इंजनों के मुंह से गाढ़ा गाढ़ा धुआं निकलता था और गदले आसमान की जानिब मोटे और भारी आदमीयों की तरह उठता दिखाई देता था. भाप के बड़े बड़े बादल भी एक शोर के साथ पटरियों से उठते थे और आंख झपकने की देर में हवा के अंदर घुल मिल जाते थे. फिर कभी कभी जब वो गाड़ी के किसी डिब्बे को जिसे इंजन ने धक्का दे कर छोड़ दिया हो अकेले पटरियों पर चलता देखती तो उसे अपना ख़याल आता. वो सोचती कि उसे भी किसी ने ज़िंदगी की पटड़ी पर धक्का दे कर छोड़ दिया है और वो ख़ुदबख़ुद जा रही है. दूसरे लोग कांटे बदल रहे हैं और वो चली जा रही है…… न जाने कहां. फिर एक रोज़ ऐसा आएगा जब इस धक्के का ज़ोर आहिस्ता आहिस्ता ख़त्म हो जाएगा और वो कहीं रुक जाएगी. किसी ऐसे मुक़ाम पर जो उस का देखा भाला न होगा.
यूं तो वो बेमतलब घंटों रेल की इन टेढ़ी बांकी पटरियों और ठहरे और चलते हूए इंजनों की तरफ़ देखती रहती थी पर तरह तरह के ख़याल उस के दिमाग़ में आते रहते थे. अंबाला छावनी में जब वो रहती थी तो स्टेशन के पास ही उस का मकान था मगर वहां उसने कभी इन चीज़ों को ऐसी नज़रों से नहीं देखा था. अब तो कभी कभी उस के दिमाग़ में ये भी ख़याल आता कि ये जो सामने रेल की पटरियों का जाल सा बिछा है और जगह जगह से भाप और धुआं उठ रहा है एक बहुत बड़ा चकला है. बहुत सी गाड़ियां हैं जिन को चंद मोटे मोटे इंजन इधर उधर धकेलते रहते हैं. सुल्ताना को तो बाअज़ औक़ात ये इंजन सेठ मालूम होते हैं जो कभी कभी अंबाला में उस के हां आया करते थे. फिर कभी कभी जब वो किसी इंजन को आहिस्ता आहिस्ता गाड़ीयों की क़तार के पास से गुज़रता देखती तो उसे ऐसा महसूस होता कि कोई आदमी चकले के किसी बाज़ार में से ऊपर कोठों की तरफ़ देखता जा रहा है.
सुल्ताना समझती थी कि ऐसी बातें सोचना दिमाग़ की ख़राबी का बाइस है, चुनांचे जब इस क़िस्म के ख़याल उस को आने लगे तो उसने बालकनी में जाना छोड़ दिया. खुदाबख्श से उसने बारहा कहा. “देखो, मेरे हाल पर रहम करो. यहां घर में रहा करो. में सारा दिन यहां बीमारों की तरह पड़ी रहती हूं. मगर उसने हर बार सुल्ताना से ये कह कर उस की तश्फ़ी करदी, जानेमन मैं बाहर कुछ कमाने की फ़िक्र कर रहा हूं. अल्लाह ने चाहा तो चंद दिनों ही में बेड़ा पार हो जाएगा.”
पूरे पांच महीने हो गए थे मगर अभी तक न सुल्ताना का बेड़ा पार हुआ था न खुदाबख्श का. मुहर्रम का महीना सर पर आरहा था मगर सुल्ताना के पास काले कपड़े बनवाने के लिए कुछ भी न था. मुख़तार ने लेडी हैमिल्टन की एक नई वज़ा की क़मीज़ बनवाई थी जिसकी आसतीनें काली जॉर्जजट की थीं. इस के साथ मैच करने के लिए उस के पास काली साटन की सलवार थी जो काजल की तरह चमकती थी. अनवरी ने रेशमी जॉर्जजट की एक बड़ी नफ़ीस साड़ी ख़रीदी थी. उसने सुल्ताना से कहा था कि वो इस साड़ी के नीचे सफ़ैद बोसकी का पेटीकोट पहनेगी क्योंकि ये नया फ़ैशन है. इस साड़ी के साथ पहनने को अनवरी काली मख़मल का एक जूता लाई थी जो बड़ा नाज़ुक था. सुल्ताना ने जब ये तमाम चीज़ें देखीं तो उस को इस एहसास ने बहुत दुख दिया कि वो मुहर्रम मनाने के लिए ऐसा लिबास ख़रीदने की हैसियत नहीं रखती.
अनवरी और मुख़तार के पास ये लिबास देख कर जब वो घर आई तो उस का दिल बहुत गमगीन था. उसे ऐसा मालूम होता था कि फोड़ा सा उस के अंदर पैदा होगया है. घर बिलकुल ख़ाली था.खुदाबख्श हस्ब-ए-मामूल बाहर था. देर तक वो दरी पर गाव तकिया सर के नीचे रख कर लेटी रही, पर जब उस की गर्दन ऊंचाई के बाइस अकड़ सी गई तो उठ कर बाहर बालकोनी में चली गई ताकि ग़म अफ़्ज़ा ख़यालात को अपने दिमाग़ में से निकाल दे.
सामने पटरियों पर गाड़ियों के डिब्बे खड़े थे पर इंजन कोई भी न था. शाम का वक़्त था. छिड़काव हो चुका था इसलिए गर्द-ओ-गुबार दब गया था. बाज़ार में ऐसे आदमी चलने शुरू होगए थे जो ताक झांक करने के बाद चुपचाप घरों का रुख़ करते हैं. ऐसे ही एक आदमी ने गर्दन ऊंची करके सुल्ताना की तरफ़ देखा. सुल्ताना मुस्कुरा दी और उस को भूल गई क्योंकि अब सामने पटरियों पर एक इंजन नुमूदार होगया था. सुल्ताना ने गौरसे उस की तरफ़ देखना शुरू किया और आहिस्ता आहिस्ता ये ख़याल इस के दिमाग़ में आया कि इंजन ने भी काला लिबास पहन रखा है. ये अजीब-ओ-ग़रीब ख़याल दिमाग़ से निकालने की ख़ातिर जब उसने सड़क की जानिब देखा तो उसे वही आदमी बैलगाड़ी के पास खड़ा नज़र आया जिस ने उस की तरफ़ ललचाई नज़रों से देखा था. सुल्ताना ने हाथ से उसे इशारा किया. उस आदमी ने इधर उधर देख कर एक लतीफ़ इशारे से पूछा- किधर से आऊं? सुल्ताना ने उसे रास्ता बता दिया. वो आदमी थोड़ी देर खड़ा रहा मगर फिर बड़ी फुर्ती से ऊपर चला आया.
सुल्ताना ने उसे दरी पर बिठाया. जब वो बैठ गया तो उसने बातचीत शुरू करने के लिए कहा- “आप ऊपर आते डर रहे थे.” वो आदमी ये सुन कर मुस्कुराया. “तुम्हें कैसे मालूम हुआ… डरने की बात ही क्या थी?” इस पर सुल्ताना ने कहा. “ये मैंने इसलिए कहा कि आप देर तक वहीं खड़े रहे और फिर कुछ सोच कर इधर आए.” वह आदमी यह सुन कर फिर मुस्कुराया. “तुम्हें ग़लतफ़हमी हूई. में तुम्हारे ऊपर वाले फ़्लैट की तरफ़ देख रहा था. वहां कोई औरत खड़ी एक मर्द को ठेंगा दिखा रही थी. मुझे ये मंज़र पसंद आया. फिर बालकोनी में सबज़ बल्ब रोशन हुआ तो मैं कुछ देर के लिए ठहर गया. सबज़ रोशनी मुझे पसंद है. आंखों को बहुत अच्छी लगती है.” ये कह उसने कमरे का जायज़ा लेना शुरू कर दिया. फिर वो उठ खड़ा हुआ. सुल्ताना ने पूछा. “आप जा रहे हैं?” उस आदमी ने जवाब दिया. “नहीं, मैं तुम्हारे इस मकान को देखना चाहता हूं… चलो मुझे तमाम कमरे दिखाओ.”
सुल्ताना ने उसको तीनों कमरे एक एक करके दिखा दिए. उस आदमी ने बिलकुल ख़ामोशी से इन कमरों का मुआइना किया. जब वो दोनों फिर उसी कमरे में आगए जहां पहले बैठे तो उस आदमी ने कहा. “मेरा नाम शंकर है.”
सुल्ताना ने पहली बार ग़ौर से शंकर की तरफ़ देखा. वो औसद क़द का मामूली शक्ल व सूरत का आदमी था मगर उस की आंखें असामान्य रूप से साफ़-शफ़्फ़ाफ़ थीं. कभी कभी इन में एक अजीब क़िस्म की चमक भी पैदा होती थी. गठीला और कसरती बदन था. कनपटियों पर उस के बाल सफ़ैद होरहे थे. ख़ाकसतरी रंग की गर्म पतलून पहने था. सफ़ेद क़मीज़ थी जिसका कालर गर्दन पर से ऊपर को उठा हुआ था.
शंकर कुछ इस तरह दरी पर बैठा था कि मालूम होता था शंकर के बजाय सुल्ताना ग्राहक है. इस एहसास ने सुल्ताना को थोड़ा परेशान कर दिया. चुनांचे उसने शंकर से कहा. “फ़रमाइए?”
शंकर बैठा था, ये सुन कर लेट गया. “मैं क्या फरमाऊं, कुछ तुम ही फ़रमाओ. तम ही ने मुझे बुलाया है.” जब सुल्ताना कुछ ना बोली तो वह उठ बैठा. “मैं समझा, लो अब मुझ से सुनो, जो कुछ तुम ने समझा, ग़लत है, मैं उन लोगों में से नहीं हूं जो कुछ देकर जाते हैं. डाक्टरों की तरह मेरी भी फ़ीस है. मुझे जब बुलाया जाए तो फ़ीस देना ही पड़ती है.”
सुल्ताना ये सुन कर चकरा गई मगर इस के बावजूद उसे बेइख़्तयार हंसी आ गई.
“आप काम क्या करते हैं?”
शंकर ने जवाब दिया. “यही जो तुम लोग करते हो.”
“क्या?”
“तुम क्या करती हो?”
“मैं… मैं… मैं कुछ भी नहीं करती.”
“मैं भी कुछ नहीं करता.”
“सुल्ताना ने भुन्ना कर कहा. “ये तो कोई बात न हुई… आप कुछ न कुछ तो ज़रूर करते होंगे.”
शंकर ने बड़े इत्मिनान से जवाब दिया. “तुम भी कुछ न कुछ ज़रूर करती होगी.”
“झक मारती हूं.”
“मैं भी झक मारता हूं.”
“तो आओ दोनों झक मारें.”
“मैं हाज़िर हूं मगर झक मारने के लिए दाम में कभी नहीं दिया करता.”
“होश की दवा करो…… ये लंगर ख़ाना नहीं.”
“और मैं भी वालंटियर नहीं हूं.”
सुल्ताना यहां रुक गई. उसने पूछा. “ये वालंटियर कौन होते हैं.”
शंकर ने जवाब दिया. “उल्लू के पट्ठे.”
“मैं भी उल्लू की पट्ठी नहीं.”
“मगर वो आदमी खुदाबख्श जो तुम्हारे साथ रहता है ज़रूर उल्लू का पट्ठा है.”
“क्यों?”
“इसलिए कि वो कई दिनों से एक ऐसे ख़ुदा रसीदा फ़क़ीर के पास अपनी क़िस्मत खुलवाने की ख़ातिर जा रहा है, जिसकी अपनी क़िस्मत ज़ंग लगे ताले की तरह बंद है.” ये कह कर शंकर हंसा.
इस पर सुल्ताना ने कहा. “तुम हिंदू हो, इसी लिए हमारे इन बुज़ुर्गों का मज़ाक़ उड़ाते हो.”
शंकर मुस्कुराया. “ऐसी जगहों पर हिंदू मुस्लिम सवाल पैदा नहीं हुआ करते. पण्डित मोलवी और मिस्टर जिनाह अगर यहां आएं तो वो भी शरीफ़ आदमी बन जाएं.”
“जाने तुम क्या ऊटपटांग बातें करते हो- बोलो, रहोगे?”
“उसी शर्त पर जो पहले बता चुका हूं.”
सुल्ताना उठ खड़ी हूई. “तो जाओ रस्ता पकड़ो.”
शंकर आराम से उठा. पतलून की जेबों में उसने अपने दोनों हाथ ठूंसे और जाते हुए कहा. “मैं कभी कभी इस बाज़ार से गुज़रा करता हूं. जब भी तुम्हें मेरी ज़रूरत हो बुला लेना…… मैं बहुत काम का आदमी हूं.”
शंकर चला गया और सुल्ताना काले लिबास को भूल कर देर तक उस के विषय में सोचती रही. उस आदमी की बातों ने उस के दुख को बहुत हल्का कर दिया था. अगर वो अंबाले में आया होता जहां कि वो ख़ुशहाल थी तो उसने किसी और ही रंग में उस आदमी को देखा होता और बहुत मुम्किन है कि उसे धक्के देकर बाहर निकाल दिया होता मगर यहां चूंकि वो बहुत उदास रहती थी, इसलिए शंकर की बातें उसे पसंद आईं.
शाम को जब खुदाबख्श आया तो सुल्ताना ने उस से पूछा. “तुम आज सारा दिन किधर ग़ायब रहे हो?”
ख़ुदाबख़्श थक कर चूर चूर हो रहा था, “कहने लगा- “पुराने क़िला के पास से आर हा हूं. वहां एक बुज़ुर्ग कुछ दिनों से ठहरे हूए हैं, उन्ही के पास हर रोज़ जाता हूं कि हमारे दिन फिर जाएं… “
“कुछ उन्होंने तुम से कहा?”
“नहीं, अभी वो मेहरबान नहीं हुए… पर सुल्ताना, मैं जो उनकी ख़िदमत कर रहा हूं वो अकारत कभी नहीं जाएगी. अल्लाह का फ़ज़्ल शामिल-ए-हाल रहा तो ज़रूर वारे न्यारे हो जाऐंगे.”
सुल्ताना के दिमाग़ में मुहर्रम मनाने का ख़याल समाया हुआ था. खुदाबख्श से रोनी आवाज़ में कहने लगी. “सारा सारा दिन बाहर ग़ायब रहते हो… मैं यहां पिंजरे में क़ैद रहती हूं, न कहीं जा सकती हूं न आ सकती हूं. मुहर्रम सर पर आगया है, कुछ तुम ने इसकी भी फ़िक्र की कि मुझे काले कपड़े चाहिऐं, घर में फूटी कोड़ी तक नहीं. कंगनीयां थीं सौ वो एक एक करके बिक गईं, अब तुम ही बताओ क्या होगा?… यूं फ़क़ीरों के पीछे कब तक मारे मारे फिरा करोगे. मुझे तो ऐसा दिखाई देता है कि यहां देहली में ख़ुदा ने भी हम से मुंह मोड़ लिया है. मेरी सुनो तो अपना काम शुरू कर दो. कुछ तो सहारा हो ही जाएगा.”
ख़ुदाबख़्श दरी पर लेट गया और कहने लगा. “पर ये काम शुरू करने के लिए भी तो थोड़ा बहुत सरमाया चाहिए- ख़ुदा के लिए अब ऐसी दुख भरी बातें न करो. मुझसे अब बर्दाश्त नहीं हो सकतीं. मैंने सचमुच अंबाला छोड़ने में सख़्त ग़लती की, पर जो करता है अल्लाह ही करता है और हमारी बेहतरी ही के लिए करता है, क्या पता है कि कुछ देर और तकलीफें बर्दाश्त करने के बाद हम…”
सुल्ताना ने बात काट कर कहा. “तुम ख़ुदा के लिए कुछ करो. चोरी करो या डाका मॉरो पर मुझे एक सलवार का कपड़ा ज़रूर ला दो. मेरे पास सफ़ैद बोसकी की क़मीज़ पड़ी है, उस को में काला रंगवा लूंगी. सफ़ैद नेनों का एक नया दुपट्टा भी मेरे पास मौजूद है, वही जो तुम ने मुझे दीवाली पर ला कर दिया था, ये भी क़ीज़ के साथ ही काला रंगवा लिया जाएगा. एक सिर्फ़ सलवार की कसर है, सो वह तुम किसी न किसी तरह पैदा कर दो… देखो तुम्हें मेरी जान की क़सम किसी न किसी तरह ज़रूर ला दो- मेरी भत्ती खाओ अगर न लाओ.”
ख़ुदाबख़्श उठ बैठा. “अब तुम ख़्वाह-मख़्वाह ज़ोर दिए चली जा रही हो- मैं कहां से लाऊंगा- अफ़ीम खाने के लिए तो मेरे पास पैसा नहीं.”
“कुछ भी करो मगर मुझे साढ़े चार गज़ काली साटन ला दो.”
“दुआ करो कि आज रात ही अल्लाह दो तीन आदमी भेज दे.”
“लेकिन तुम कुछ नहीं करोगे- तुम अगर चाहो तो ज़रूर इतने पैसे पैदा कर सकते हो. जंग से पहले ये साटन बारह चौदह आना गज़ मिल जाती थी, अब सवा रुपय गज़ के हिसाब से मिलती है. साढ़े चार गज़ों पर कितने रुपय ख़र्च हो जाएंगे?”
“अब तुम कहती हो तो मैं कोई हीला करूंगा.” ये कह कर खुदाबख्श उठा. “लो अब इन बातों को भूल जाओ, मैं होटल से खाना ले आऊं.”
होटल से खाना आया दोनों ने मिल कर ज़हरमार किया और सो गए. सुबह हुई.खुदाबख्श पुराने क़िले वाले फ़क़ीर के पास चला गया और सुल्ताना अकेली रह गई. कुछ देर लेटी रही, कुछ देर सोई रही. इधर उधर कमरों में टहलती रही, दोपहर का खाना खाने के बाद उसने अपना सफ़ैद नेनों का दुपट्टा और सफ़ैद बोसकी की क़मीज़ निकाली और नीचे लांड्री वाले को रंगने के लिए दे आई. कपड़े धोने के इलावा वहां रंगने का काम भी होता था.
यह काम करने के बाद उसने वापिस आकर फिल्मों की किताबें पढ़ीं जिन में उस की देखी हुई फिल्मों की कहानी और गीत छपे हूए थे. ये किताबें पढ़ते पढ़ते वो सौ गई, जब उठी तो चार बज चुके थे क्योंकि धूप आंगन में से मोरी के पास पहुंच चुकी थी. नहा धो कर फ़ारिग़ हूई तो गर्म चादर ओढ़ कर बालकोनी में आ खड़ी हूई. क़रीबन एक घंटा सुल्ताना बालकोनी में खड़ी रही. अब शाम होगई थी. बत्तियां रोशन होरही थीं. नीचे सड़क में रौनक के आसार नज़र आने लगे. सर्दी में थोड़ी सी शिद्दत होगई थी मगर सुल्ताना को ये नागवार मालूम न हूई. वो सड़क पर आते जाते टांगों और मोटरों की तरफ़ एक अर्सा से देख रही थी. दफ़अतन उसे शंकर नज़र आया. मकान के नीचे पहुंच कर उसने गर्दन ऊंची की और सुल्ताना की तरफ़ देख कर मुस्कुरा दिया. सुल्ताना ने ग़ैर इरादी तौर पर हाथ का इशारा किया और उसे ऊपर बुला लिया.
जब शंकर ऊपर आग या तो सुल्ताना बहुत परेशान हुई कि इस से क्या कहे. दरअसल उसने ऐसे ही बिना सोचे समझे उसे इशारा कर दिया था. शंकर बेहद मुतमइन था जैसे उसका अपना घर है, चुनांचे बड़ी बेतकल्लुफ़ी से पहले रोज़ की तरह वो गावतकिया सर के नीचे रख कर लेट गया. जब सुल्ताना ने देर तक उस से कोई बात न की तो उस से कहा. “तुम मुझे सौ दफ़ा बुला सकती हो और सौ दफ़ा ही कह सकती हो कि चले जाओ… मैं ऐसी बातों पर कभी नाराज़ नहीं हुआ करता.”
सुल्ताना अन्यमनस्क हो गई, कहने लगी. “नहीं बैठो, तुम्हें जाने को कौन कहता है.”
शंकर इस पर मुस्कुरा दिया. “तो मेरी शर्तें तुम्हें मंज़ूर हैं.”
“कैसी शर्तें?” सुल्ताना ने हंस कर कहा. “क्या निकाह कर रहे हो मुझ से?”
“निकाह और शादी कैसी? न तुम उम्र भर में किसी से निकाह करोगी ना मैं. ये रस्में हम लोगों के लिए नहीं. छोड़ो इन फज़ूलीयात को. कोई काम की बात करो.”
“बोलो क्या बात करूं?”
“तुम औरत हो…… कोई ऐसी बात शुरू करो जिस से दो घड़ी दिल बहल जाये. इस दुनिया में सिर्फ़ दुकानदारी ही नहीं, कुछ और भी है.”
सुल्ताना ज़हनी तौर पर अब शंकर को क़बूल कर चुकी थी. कहने लगी. “साफ़ साफ़ कहो, तुम मुझ से क्या चाहते हो.”
“जो दूसरे चाहते हैं.” शंकर उठ कर बैठ गया.
“तुममें और दूसरों में फिर फ़र्क़ ही क्या रहा.”
“तुममें और मुझ में कोई फ़र्क़ नहीं. उन में और मुझ में ज़मीन-ओ-आसमान का फ़र्क़ है. ऐसी बहुत सी बातें होती हैं जो पूछना नहीं चाहिए ख़ुद समझना चाहिए.”
सुल्ताना ने थोड़ी देर तक शंकर की इस बात को समझने की कोशिश की फिर कहा. “मैं समझ गई हूं.”
“तो कहो, क्या इरादा है.”
“तुम जीते, में हारी. पर मैं कहती हूं, आज तक किसी ने ऐसी बात क़बूल न की होगी.”
“तुम ग़लत कहती हो… इसी मुहल्ले में तुम्हें ऐसी सादा लौह औरतें भी मिल जाएंगी जो कभी यक़ीन नहीं करेंगी कि औरत ऐसी ज़िल्लत क़बूल कर सकती है जो तुम बग़ैर किसी एहसास के क़बूल करती रही हो. लेकिन उनके न यक़ीन करने के बावजूद तुम हज़ारों की तादाद में मौजूद हो… तुम्हारा नाम सुल्ताना है न?”
“सुल्ताना ही है.”
शंकर उठ खड़ा हुआ और हंसने लगा. “मेरा नाम शंकर है…… ये नाम भी अजब ऊटपटांग होते हैं, चलो आओ अंदर चलें.”
शंकर और सुल्ताना दरी वाले कमरे में वापस आए तो दोनों हंस रहे थे, न जाने किस बात पर. जब शंकर जाने लगा तो सुल्ताना ने कहा. “शंकर मेरी एक बात मानोगे?”
शंकर ने जवाबन कहा. “पहले बात बताओ.”
सुल्ताना कुछ झेंप सी गई. “तुम कहोगे कि मैं दाम वसूल करना चाहती हूं मगर.”
“कहो कहो… रुक क्यों गई हो.”
सुल्ताना ने जुर्रत से काम लेकर कहा. “बात ये है कि मुहर्रम आर हा है और मेरे पास इतने पैसे नहीं कि मैं काली सलवार बनवा सकूं… यहां के सारे दुखड़े तो तुम मुझ से सुन ही चुके हो. क़मीज़ और दुपट्टा मेरे पास मौजूद था जो मैंने आज रंगवाने के लिए दे दिया है.”
शंकर ने ये सुन कर कहा. “तुम चाहती हो कि मैं तुम्हें कुछ रुपय दे दूं जो तुम ये काली सलवार बनवा सको.”
सुल्ताना ने फ़ौरन ही कहा. “नहीं, मेरा मतलब ये है कि अगर हो सके तो तुम मुझे एक काली सलवार बनवा दो.”
शंकर मुस्कुराया. “मेरी जेब में तो इत्तिफ़ाक़ ही से कभी कुछ होता है, बहरहाल मैं कोशिश करूंगा. मुहर्रम की पहली तारीख़ को तुम्हें ये सलवार मिल जाएगी. लो बस अब ख़ुश हो गईं.” सुल्ताना के बुन्दों की तरफ़ देख कर शंकर ने पूछा. “क्या ये बुंदे तुम मुझे दे सकती हो?”
सुल्ताना ने हंस कर कहा. “तुम इन्हें क्या करोगे. चांदी के मामूली बुन्दे हैं. ज़्यादा से ज़्यादा पांच रुपये के होंगे.”
इस पर शंकर ने कहा. “मैंने तुम से बुंदे मांगे हैं. उन की क़ीमत नहीं पूछी, बोलो, देती हो.”
“ले लो. ये कह कर सुल्ताना ने बुन्दे उतार कर शंकर को दे दिए. इस के बाद अफ़्सोस हुआ मगर शंकर जा चुका था.”
सुल्ताना को क़तअन यक़ीन नहीं था कि शंकर अपना वाादा पूरा करेगा मगर आठ रोज़ के बाद मुहर्रम की पहली तारीख़ को सुबह नौ बजे दरवाज़े पर दस्तक हुई. सुल्ताना ने दरवाज़ा खोला तो शंकर खड़ा था. अख़बार में लिपटी हुई चीज़ इसने सुल्ताना को दी और कहा. “साटन की काली सलवार है… देख लेना, शायद लंबी हो… अब मैं चलता हूं.”
शंकर सलवार दे कर चला गया और कोई बात उसने सुल्ताना से न की. उस की पतलून में शिकनें पड़ी हुई थीं. बाल बिखरे हूए थे. ऐसा मालूम होता था कि अभी अभी सो कर उठा है और सीधा इधर ही चला आया है.
सुल्ताना ने काग़ज़ खोला. साटन की काली सलवार थी ऐसी ही जैसी कि वो अनवरी के पास देख कर आई थी. सुल्ताना बहुत ख़ुश हूई. बुंदों और इस सौदे का जो अफ़्सोस उसे हुआ था इस सलवार ने और शंकर के वायदा निभाने ने दूर कर दिया.
दोपहर को वो नीचे लांडरी वाले से अपनी रंगी हुई क़मीज़ और दुपट्टा लेकर आई. तीनों काले कपड़े उसने जब पहन लिए तो दरवाज़े पर दस्तक हुई. सुल्ताना ने दरवाज़ा खोला तो अनवरी अंदर दाख़िल हुई. उसने सुल्ताना के तीनों कपड़ों की तरफ़ देखा और कहा- “क़मीज़ और दुपट्टा तो रंगा हुआ मालूम होता है, पर ये सलवार नई है… कब बनवाई?”
सुल्ताना ने जवाब दिया. “आज ही दर्ज़ी लाया है.” ये कहते हुए उस की नज़रें अनवरी के कानों पर पड़ीं- “ये बुन्दे तुमने कहां से लिए?”
अनवरी ने जवाब दिया. “आज ही मंगवाए हैं.”
इसके बाद दोनों को थोड़ी देर तक ख़ामोश रहना पड़ा.
ये भी पढ़ें –
रोंगटे खड़े कर देती है इस्मत चुग़ताई की लोकप्रिय कहानी ‘अमर बेल’
रोटी की भूख पर करारा कटाक्ष है श्रीलाल शुक्ल की मार्मिक रचना ‘एक चोर की कहानी’
मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें, मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं : जौन एलिया
.
Tags: Books, Hindi Literature, Hindi Writer, Literature
FIRST PUBLISHED : June 12, 2023, 16:47 IST






