
पुनीत माथुर / जोधपुर. एक समय था जब जादूगर का शो देखने के लिए लोगों की भीड़ लगती थी. बच्चे हों या बड़े सभी जादूगर अंकल को देखने के लिए उत्साहित रहते थे. लेकिन अब यह जादूगरों की दुनिया सिमट चुकी है महज कुछ जादूगर इस हुनर को लेकर चल रहे हैं. ऐसे में युवा जादूगर जादू की दुनिया के क्रेज को कम होते देख लोगों से इस कला को बचाने की अपील कर रहे हैं.
जोधपुर की युवा जादूगर आंचल 25 साल से जादू दिखा रही है और आंचल ने बताया कि जब वह 5 साल की थी तब वह अपने पिताजी के साथ जाकर जादू दिखाया करती थी. और उसने यह भी बताया कि उसने अपने पिताजी से ही जादू सीखा है. आंचल ने बताया कि पहले रेडियो, टीवी, सिनेमाघर और मोबाइल और अब न जाने कितने प्लेटफॉर्म मनोरंजन के साधन बन चुके हैं. एक समय था जब मनोरंजन के साधन सीमित हुआ करते थे गांव के मेले रामलीला और जादूगर का शो मनोरंजन का साधन हुआ करता था.
खर्चा निकालना भी बड़ी चिंता
आंचल का ने बताया कि जादू की कला को बचाने के लिए लोग आगे आना चाहिए. पहले जादूगरों को भी किसी गांव में या किसी जगह पर जाकर अपना कैंप लगाने के लिए ज्यादा अनुमतियों की आवश्यकता नहीं पड़ती थी. लेकिन अब महानगरों में तब्दील होते शहरों में जब जादूगर पहुंचता है तो उसे कई तरह की अनुमति लेनी पड़ती है साथ ही उसे यह टेंशन भी हर वक्त सताती है कि अगर लोग देखने के लिए नहीं आए तो उसका खर्चा कैसे निकलेगा. साथ ही उसके साथ चलने वाले क्रू मेंबर और उनका वेतन निकालना भी सबसे बड़ी चिंता है. हालांकि, टीवी पर जादूगर का शो अभी बड़े चाव से देखा जाता है लेकिन हकीकत में जब जादूगर का कार्यक्रम चल रहा होता है तो लोग कम आ रहे हैं.
लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड से सम्मानित
उन्होंने ने बताया कि जादू की कला खत्म होती जा रही है. आवश्यकता है सरकार दो कदम जादूगरों की तरफ बढ़ाएं एक तरफ से जादूगरों को फायदा होगा, तो वही मोबाइल तक सिमट चुके बचपन को भी शारीरिक और मानसिक दोनों फायदे होंगे. बता दें कि आंचल जादूगर को राष्ट्रीय बाल पुरस्कार से सम्मानित भी किया जा चुका है और लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी उसे सम्मानित किया जा चुका है.






