100 साल पुराने कारोबार को लग गई ‘नजर’, अब फीका पड़ रहा यहां की मेहंदी का रंग


अनिल राठी/फरीदाबाद: कोई भी त्योहार या शादी-ब्याह का समारोह मेहंदी के बिना पूरा है. मेहंदी हमारी संस्कृति का हिस्सा है. हर धर्म और समुदाय की महिलाएं अपने तीज-त्योहार या शुभ मौके पर मेहंदी लगाती हैं. फिर चाहे वह ईद की मेहंदी हो या करवा चौथ पर सुहागनों के हाथों में लगने वाली मेहंदी.

एक समय था जब फरीदाबाद की मेहंदी काफी मशहूर थी. यहां मेहंदी बनाने की कई फैक्ट्रियां थीं, लेकिन आज हालात बदल चुके हैं. यहां मेहंदी की फैक्ट्रियां न के बराबर हैं. फरीदाबाद औद्योगिक नगरी के रूप में जाना जाता है. यहां कई बड़े-बड़े उद्योग स्थापित हैं. इन्हीं में मेहंदी की भी कई फैक्ट्रियां थी, जिनमें बड़े स्तर पर मेहंदी का उत्पादन होता था. लेकिन बदलते वक्त के साथ इस कारोबार को नजर लग गई.

कृषि योग्य भूमि में कमी
पहले ओल्ड फरीदाबाद में किसान पहले बड़े पैमाने पर मेहंदी की खेती करते थे. बीते दो दशकों में फरीदाबाद में रियल एस्टेट के विकास के कारण कृषि योग्य भूमि तेजी से कम होती चली गई, जिसके कारण कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल होने वाली जो मेहंदी पहले फरीदाबाद में ही उगाई जाती थी, अब वो धीरे-धीरे खत्म हो रही है. इस कारण मेहंदी की लागत बढ़ गई. लागत बढ़ी तो मुनाफा कम हुआ और इसका सीधा असर यहां की फैक्ट्रियों पर पड़ा.

कच्चे माल की उपलब्धता में कमी
पहले फरीदाबाद में बड़े स्तर पर मेहंदी का उत्पादन किया जाता था, उस वक्त कारोबारियों को भी मेंहदी के उत्पादन से काफी मुनाफा था, जिसका कारण ये था कि उस समय लोग फरीदाबाद में बड़े स्तर पर मेहंदी की खेती करते थे, जिसके चलते कारोबारियों को कच्चे माल के लिए दूर नहीं जाना पड़ता था. जैसे-जैसे मेहंदी की खेती कम होती गई, कच्चे माल पर लगने वाली परिवहन की लागत और भी ज्यादा बढ़ती गई, क्योंकि अब अधिकतर व्यापारी अपना कच्चा माल राजस्थान से लाने लगे जिसके कारण परिवहन पर लगने वाली लागत दोगुनी से भी ज्यादा हो गई.

उत्पादन को प्रभावित करने वाले अन्य कारक
कई अन्य कारण भी हैं जो मेहंदी उद्योग के लिए सही साबित नहीं हो रहें. उत्पाद के समय पर डिलीवरी के लिए पर्याप्त परिवहन सुविधा की कमी है. पाकिस्तान और यमन जैसे अन्य मेहंदी उत्पादक देशों से लगातार बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण यहां के उत्पाद को लागत के मुकाबले बेहद कम कीमत पर बाजार में बेचना पड़ता है.

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Author: Jagran Times

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