(नूपुर झा/ Noopur Jha)
पटना हाईकोर्ट से शिमला हाईकोर्ट तक का सफर कुछ लोगों के लिए कुछ घंटों का हो सकता है. न्यायमूर्ति लीला सेठ के लिए ये उनके जीवन की सबसे लम्बी यात्रा रही. देश की पहली महिला मुख्य न्यायमूर्ति जस्टिस लीला सेठ बड़े सरल शब्दों में अपने पारिवारिक जीवन और करियर के बीच का ताल मेल व्याख्यान करती हैं. हालांकि पाठक यदि कुछ अद्भुत जीवन शैली की उम्मीद करेंगे तो उनको ये कदाचित नहीं मिलेगा. जस्टिस सेठ ने बहुत निष्कपटता के साथ अपने जीवन के ऐसे पक्ष पाठकों के सामने रखे जो उनके ईमानदार व्यक्तित्व का वर्णन करती है. आप उनको जीवन से जूझते भी देखेंगे, कई बार हालात से भागते भी देखेंगे और सहजता के साथ उनका उत्थान भी देखेंगे.
शुरुआत जस्टिस लीला सेठ अपने बचपन से करती हैं जो कि एक मिलाजुला अनुभव रहा उनके लिए. अपने पिता के निधन से पहले उनकी पारिवारिक स्थिति ठीक थी, लेकिन उनके गुज़र जाने के बाद हालात खराब होते चले गए. बच्चों की पढ़ाई के लिए उनकी मां को काफी मशक्कत करनी पड़ी. लेकिन सभी मुसीबतों का सामना करके भी उनकी माताजी ने अपने बच्चों को पढ़ाया-लिखाया, स्वावलम्बी बनाया. कहानी मार्मिक है, आपके दिल को छूती है, और सहज है.
शादी के कुछ ही दिन बाद लीला सेठ अपने पति और बच्चे सहित लंदन चली गईं. उस समय तक उन्होंने अपने करियर के बारे में ज़्यादा कुछ सोचा नहीं था. परिवार की देखभाल करने के साथ-साथ उन्होंने पढ़ने का निश्चय किया और वैकल्पिक विषय ‘विधिक अध्ययन’ का चुनाव किया. उनके जीवन का रुख तब बदला जब उन्होंने इस विषय में सर्वाधिक अंक प्राप्त किए. सही मायने में लीला सेठ से जस्टिस लीला सेठ बनने का सफर उस वक़्त शुरू हुआ.
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जिस समय लीला सेठ ने न्याय व्यवस्था में आने का निश्चय किया, उस वक़्त भारतीय न्याय व्यवस्था में महिलाओं का कोई स्थान नहीं था. एक घटना की चर्चा करते हुए वह बताती हैं कि पटना हाईकोर्ट में उनके चैम्बर में महिला शौचालय केवल दो महिलाओं के लिए प्रयोग में था, और शौचालय के बाहर ताला लगाना पड़ता था. एक दिलचस्प बात ये भी है उनके मुवक्किल उन्हें ‘सर’ कह कर बुलाते थे.
वह अपने बच्चों की खास चर्चा करती हैं – विक्रम, आराधना और शान्तं. वे अपनी चौथी बेटी इरा की भी चर्चा करती हैं जो कि उनके छोटे भाई द्वारा गोद ली गयी थी. इरा का असमय दुनिया से चले जाना उनके लिए एक दुखद घटना रही. लीला सेठ अपने बच्चों के जीवन में काफ़ी लिप्त रहीं, लेकिन हर कामकाजी महिला का व्यक्तिगत दुःख, बच्चों से दूर रहने की पीड़ा उनको भी काफी महसूस हुई. लेकिन उन्होंने तय किया था कि बच्चों को अपनी ख़ुद की पहचान बनाने के लिए हमेशा प्रेरित करेंगी.
एक मुद्दा है जिसकी चर्चा हम उतनी नहीं करते जितनी करनी चाहिए. जब आप अपने जीवन के शिखर पर होते हैं, तो काफी वक़्त के लिए आप उससे आगे के बारे में नहीं सोचते. फिर एक दिन जब समय पूरा हो जाता है तो आप सेवामुक्त हो जाते हैं – लेकिन जीवन से मुक्त नहीं होते. फिर आप करते हैं? क्या हम सेवा मुक्त होने के बाद भी काम कर सकते हैं? यदि हां तो क्या? सेवामुक्त होना सिर्फ एक आर्थिक बदलाव नहीं है, ये आपकी जीवनशैली का बदलाव है – हममें से बहुत लोग ऐसे हैं जो इसके बारे में कम सोचते हैं. जस्टिस लीला ने शिमला हाईकोर्ट से रिटायर होने के बाद भी सोचा नहीं था कि आगे क्या करना चाहती हैं. काफी मशक्कत के बाद उन्होंने निश्चय किया कि वे विधि व्यवस्था के उन विषयों का अध्ययन करेंगी जो उन्होंने अपने करियर के दौरान नहीं किया. मेरे लिए किताब का ये अध्याय सबसे महत्वपूर्ण और दिलचस्प रहा. जस्टिस लीला सेठ उन खुशनसीब लोगों में से हैं जिन्होंने अपने जीवन की “सेकंड इनिंग” का भी भरपूर लुत्फ़ उठाया.

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FIRST PUBLISHED : June 27, 2023, 19:15 IST






