वह कसकती दोपहर | – News in Hindi

जिस लेखक के नायक खुद की मकोड़े और नेवले के रूप में कल्पना करते हों, क्या उसके घर में आमंत्रित लेखक बीयर नहीं परोस सकते? मैंने तय किया कि अभिव्यक्ति के सारे ज़ोखिम उठाने ही होंगे.

“सर्व करोगे या काउंटर पर बैठोगे?”

“तुम बताओ?”

“तुम्हें कहाँ सुविधा होगी—बारटेंडर या वेटर?”

“मुझे इसका कोई अनुभव नहीं है… जो तुम कहो.”

“कुछ लोग सर्व करने में संकोच करते हैं…”

“एकदम नहीं… मुझे काम चाहिये बस.”

पब में काम करने का बरसों पुराना मेरा सपना आज पूरा होने जा रहा था. मेरे घर के चार-पाँच सौ मीटर की परिधि में सैकड़ों पब और बार हैं. एक धांसू पब में मुझे काम मिलने जा रहा था.

“लेकिन बारटेंडर कई किस्म की कॉकटेल बनाते हैं. मुझे कोई समझ नहीं है.”

“इस पब में सिर्फ़ ड्राफ्ट बीयर मिलती है, तुम्हें केवल टोंटी खोलकर गिलास भरना है. एकाध मूर्ख कस्टमर वाइन माँगता है.”

मैं प्रचण्ड उत्साहित था. मेरी अलेक्सान्दर ज़ोलोतारेव से दोस्ती हो गयी थी. वह हर हफ़्ते किसी नये पब में काम करता दिखाई देता था. मैं पूछता कि क्या मुझे भी यह काम मिल सकता है. पहले उसे लगा मैं मज़ाक कर रहा हूँ, लेकिन फिर उसे लगा कि मुझे रहने को भले भव्य घर मिला हुआ है, मेरे पास ज्यादा पैसे नहीं हैं. उस सुबह वह मेरे घर आ गया. दोपहर एक बजे से उसकी पाली शुरू होती थी. बारह घंटे की शिफ्ट पर दो बार खाना और बीयर भी मिलती है. वह मुझे अपने मैनेजर से मिलवाने ले जा रहा था. यह पब पाउडर टावर को जाती सेलेत्ना स्ट्रीट पर था, मेरे घर से सिर्फ़ तीन मिनट दूर. इसके सामने स्टील की मूर्तियों और आकृतियों की आर्ट गैलरी थी. पाउडर टावर कभी ओल्ड टाउन की सीमा मानी जाती थी. आक्रान्ताओं को रोकने के लिये इस टावर पर बारूद लेकर सैनिक तैनात रहते थे. आज एक भारतीय इस इलाके को बारूद से उड़ाने जा रहा था.

जब अलेक्सान्दर मेरे लिये नौकरी खोज रहा था, उसने पूछा था कि क्या मेरे पास वर्क परमिट है? नहीं. तनख्वाह कैश में नहीं मिलेगी क्या? अकाउंट का चक्कर ही खत्म, मैंने कहा.

“तुम्हारा मैनेजर क्या पूछ सकता है?”

“वीजा वगैरह के बारे में पूछेगा… बता देना कि नजदीक रहते हो. रात की पाली मिलने में आसानी रहेगी.”

जब उसने बताया कि पब की यूनिफॉर्म ब्लैक है, मैं उछलने लगा. “मेरे पास ब्लैक शर्ट और जींस है… मालिक का खर्चा बचेगा.”

“नहीं. यूनिफॉर्म और एप्रन वहीं से मिलेगी.”

मैं सोचने लगा कि आखिर कहाँ लफड़ा हो सकता है. पिछले दो महीनों में जिन लोगों से परिचय हुआ है, उनमें से कोई मुझे पब में देख सकता था. ठीक है. देखा करे. लेकिन अगर काफ़्का हाउस के संचालक या संचालिका वहाँ आ गये तो? नियमावली में प्रावधान है कि अगर आप रेजीडेंसी की गरिमा के प्रतिकूल कुछ भी करते पाये गये, रेजीडेंसी तुरंत रद्द कर दी जायेगी. क्या वेटर का काम काफ़्का की गरिमा को चोट पहुँचाता है? जिस लेखक के नायक खुद की मकोड़े और नेवले के रूप में कल्पना करते हों, क्या उसके घर में आमंत्रित लेखक बीयर नहीं परोस सकते? क्या लिबरल मूल्यों का झंडा उठाये फिरता यूरोप एक इंसान से रोजगार का हक़ छीनेगा? मुझे इस तर्क में दम लगा. लेकिन शायद संचालकों को न लगे. फिर? आपने जो मासिक भत्ता दिया था, बहुत कम था. खत्म हो गया. क्या करता? वे कहेंगे कि बताना चाहिये था. बगैर वर्क परमिट के आप कैसे काम कर सकते हैं?

मैंने तय किया कि अभिव्यक्ति के सारे ज़ोखिम उठाने ही होंगे. अगर इस मसले पर रेजीडेंसी रद्द होती है, अगली फ्लाइट से भारत लौटना पड़ता है, हुआ करे. इस अनुभव को नहीं छोड़ा जायेगा.

हम घर से निकल पड़े. मैं सहसा कंपकंपाने लगा.

पब से थोड़ा दूर पहले मैंने पूछा, “भाई, हो जायेगा न?”

उसने अंगूठे का इशारा किया. मैं अपनी पहचान भूल गया था, सिर्फ़ यहाँ ग्राहकों को बीयर सर्व करना चाहता था. काउंटर पर बीयर के गिलासों को उँगलियों पर फिराना चाहता था. हम अंदर प्रवेश कर गये. आलीशान सोफ़े और कुर्सियां. अन्दर तीन पार्टीशन थे, कुछ कुर्सियां बाहर भी थीं. बड़ा-सा काउंटर. पब की दीवारें, छत, आन्तरिक सज्जा—मादक काला रंग हवा में डोल रहा था. कई कस्टमर मुझे देख रहे थे. मैं उन्हें आश्वस्त करना चाहता था कि बहुत जल्द मैं ही उनका ख्याल रखने वाला हूँ.

अलेक्सांदर ने मुझे मैनेजर से मिलवाया. उसने हाथ मिलाया, मुझे बैठने को कहा. उसने काली शर्ट पहने थी. नौकरी के लिये मेरा साक्षात्कार शुरू हो रहा था. मैं किसी सामान्य भारतीय बेरोजगार की तरह घबरा रहा था.

“कभी बार में काम किया है?”

“नहीं, लेकिन दोस्तों की पार्टी में सबके ड्रिंक बनाया करता था.”

उसने कुछ और प्रश्न पूछे, जिनसे नौकरी के लिये मेरी पात्रता कमजोर पड़ती गयी, और फिर उसने अंतिम प्रहार किया, “मेडिकल सर्टिफिकेट है?”

“मेडिकल इंश्युरेंस?… हाँ, तीस हजार यूरो का है.”

“नहीं, डॉक्टर का सर्टिफिकेट.”

बलगम, खून, पेट, गैस, सुबह का पेशाब—उसने तमाम नाम गिनाने शुरू कर दिये.

“मुझे कोई बीमारी नहीं है.”

“हमें सर्टिफिकेट चाहिये.”

मैं सहसा किसी पोपले इंसान जैसा दिखने लगा. “अब ये डॉक्टर कहाँ मिलेगा? आप खुद मेरा चेक-अप करा लीजिये.”

“हमारे पास कोई डॉक्टर नहीं है. तुम्हें ही लेकर आना पड़ेगा.”

अलेक्सांदर यूनीफॉर्म पहने दूर खड़ा था. उसे कुछ समझ आ रहा था लेकिन वह अपने बॉस के बीच हस्तक्षेप नहीं कर सकता था. मैंने उसे कातर निगाहों से देखा— भाई, बचा मुझे. वह नजदीक आ गया, मैनेजर से फ़िरंगी भाषा में कुछ बोला. फिर मेरी ओर मुड़ा, “मैं करवाता हूँ डॉक्टर.”

मैनेजर मुझसे हाथ मिलाकर उठ गया. अलेक्सांदर मुझे छोड़ने बाहर तक आया, आश्वस्त किया. ब्लैक टी-शर्ट पहने गेट पर खड़ी लड़की जिसकी कलाई पर बड़ा-सा टैटू था, शायद किसी रेंगने वाले प्राणी का, जो मुझे आते वक्त देख मुस्कुरायी थी, शायद इसलिए कि एक नया सहकर्मी आ रहा है, मुझे जाते देख फिर मुस्कुराई. मुझे लगा कि मैं प्राग के किसी भी पब या बार में बतौर कस्टमर जा सकता हूँ, पूरे शहर, मेट्रो और ट्राम में घूम सकता हूँ, लेकिन दो टकिये की नौकरी के लिये इनको कमबख्त मेरे खून का सैम्पल चाहिये. मुझे पूँजीवाद को गरियाने की एक और वजह मिल गयी.

(गद्य की विभिन्न विधाओं में लिख रहे लेखक-पत्रकार आशुतोष भारद्वाज इन दिनों प्राग के काफ़्का हाउस में राइटर-इन-रेजिडेंस हैं.)

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Author: Jagran Times

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