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धीरेंद्र चौधरी/ रोहतक. रोहतक का गुरुद्वारा बंगला साहिब का गुरु तेग बहादुर सिंह से गहरा नाता है. यह गुरुद्वारा देश-दुनिया के लाखों-करोड़ों सिखों की आस्था का केंद्र है.जानकारों के मुताबिक सिखों के नौंवे गुरु तेग बहादुर जी अपनी शहादत देने के लिए जब आनन्दपुर साहिब से दिल्ली के लिए निकले थे,तब वे 13 दिन तक रोहतक में रूके थे.जिस स्थान पर गुरू जी रूके थे, वहां पर जंगल हुआ करता था और उसमें ईमली और नीम के दो बड़े दरख्त थे, इन पेड़ों से वे अपने घोड़े को बांधते थे.गुरु तेग बहादुर जी के यहां से जाने के बाद लोगों ने इसे आस्था का केन्द्र बना दिया और आज यहां एक बहुत सुंदर गुरुद्वारा विराजमान है, जिसे गुरुद्वारा बंगला साहिब के नाम से जाना जाता है. उनका शहीदी दिवस 24 नवम्बर,1675 मनाया जाता है.
दरअसल गुरु तेग बहादुर जी ने हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए अपनी शहादत दी थी. जिस वक्त मुगल बादशाह औरंगजेब अपने शासनकाल के दौरान जबरन धर्मांतरण करवा रहे थे, उस वक्त कश्मीरी पंडितों का एक जत्था पंडित कृपाराम की अगुवाई में गुरु तेग बहादुर जी से मिला था और अपने धर्म की रक्षा करने की गुहार लगाई थी. जिस वक्त कश्मीरी पंडितों का जत्था गुरू जी से मिलने आया था, उस वक्त गुरु जी के 9 साल के पुत्र गोबिंद राय भी वहीं पर मौजूद थे, जो बाद में गुरु गोबिंद सिंह बने. गुरु तेग बहादुर जी ने पंडितों को आश्वासन दिया कि वे अपनी कुर्बानी देकर उनके धर्म की रक्षा करेंगे. साथ ही यह भी कहा कि औरंगजेब को संदेश भिजवा दो कि अगर गुरु तेग बहादुर का धर्म परिवर्तन करवा सको तो वे भी इस्लाम धर्म अपना लेंगें. ये बातें सुनकर 9 साल के गुरु गोबिंद सिंह जी ने भी अपने यतीम होने की परवाह न करते हुए गुरु जी को शहादत देने के लिए प्रेरित किया.
आस्था का केंद्र है गुरुद्वारा बंगला साहिब
जिस वक्त गुरु तेग बहादुर जी कश्मीरी पंडितों की चोटी, जनेऊ और तिलक की रक्षा के लिए आनन्दपुर साहिब से दिल्ली जा रहे थे, उस दौरान वे पंजाब (वर्तमान हरियाणा) के कई स्थानों पर रूके और कुंएं व बावड़ियां बनवाई. वे पटियाला से कैथल होते हुए जींद, लाखनमाजरा और रोहतक में भी रूके. रोहतक के माईजी का गुरुद्वारा में वे लंगर छकते थे और फिलहाल जिस स्थान पर गुरुद्वारा बंगला साहिब है, यहां पर रूके थे. इस गुरुद्वारे की बहुत मान्यता है और देशभर ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी लोग यहां दर्शन करने के लिए आते हैं.
हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए दिया बलिदान
गुरुद्वारे के इतिहास के बारे में बताते हुए महेन्द्र धींगड़ा ने बताया कि हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए गुरु जी ने अपने शीश का बलिदान दिया था. गुरू जी यहां 13 दिन रूके थे और इसके बाद एक गरीब गडरिए की बेटी की शादी में मदद करने के लिए यहां से आगरा गए थे. जहां पर उन्होंने अपनी गिरफ्तारी दी थी, उनके साथ भाई दयाला जी, भाई मतिदास और सतिदास को भी गिरफ्तार कर लिया गया था.औरंगजेब ने अनेक यातनाएं दी, लेकिन वे गुरु जी और उनके शिष्यों का धर्म परिवर्तित नहीं करा सका. गुरू जी की आंखों के सामने उनके तीनों शिष्यों में से एक को आरी से कटवा दिया, दूसरे को गर्म देग में बैठा दिया और तीसरे को रूई लपेटकर आग लगा दी.तीनों ने शहादत दे दी, लेकिन उनकी यातनाओं के सामने झुके नहीं. गुरू तेग बहादुरजी ने भी अपना बलिदान देकर हिन्दू धर्म की रक्षा की थी . उनकी शहादत को युगों-युगों तक याद रखा जाएगा, जिन्होंने धर्म की रक्षा के लिए बलिदान दिया.
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Tags: Dharma Aastha, Religion 18
FIRST PUBLISHED : June 27, 2023, 14:24 IST






