अशोक तिवारी की किताब ‘समकालीन हिंदी कविता और सांप्रदायिकता’ का लोकार्पण

नई दिल्ली के आईटीओ स्थित सुरजीत भवन सभागार में जानेमाने शिक्षाविद् और रंगकर्मी अशोक तिवारी की किताब “समकालीन हिंदी कविता और साम्‍प्रदायिकता” का लोकार्पण किया गया. पुस्तक के लोकार्पण कार्यक्रम में वैज्ञानिक और शायर गौहर रज़ा, कहानीकार नमिता सिंह, हरियश राय, लेखक अशोक तिवारी सहित दिल्ली के कई जानेमाने साहित्य प्रेमी, शोधकर्ता तथा अध्यापक उपस्थित हुए. कार्यक्रम का संचालन सैयद परवेज ने किया.

कार्यक्रम में लेखक अशोक तिवारी ने पुस्तक के विषय पर रोशनी डालते हुए कहा कि यह एक ऐसा विषय है जिस पर शोधकार्य पूरा होने का दावा करना निःसंदेह चुनौतीपूर्ण है. उन्होंने कहा समकालीन हिंदी कविता में सांप्रदायिकता विरोध के सभी स्वरों को समाहित करने की मेरी भरसक कोशिश रही है.

वरिष्ठ कहानीकार नमिता सिंह ने कहा कि डॉ. अशोक तिवारी की यह पुस्तक एक बहुत महत्वपूर्ण काम के रूप में हमारे सामने आई है. लेखक सांप्रदायिकता की समस्या को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में तलाशते हुए इस पर विचार करते हैं. उन्होंने इस काम में बहुत श्रम किया है.

कहानीकार हरियश राय ने कहा कि अशोक तिवारी की किताब ‘समकालीन हिंदी कविता और साम्‍प्रदायिकता’ हमारे आज के समय के एक विशिष्‍ट किताब है. इस किताब में अशोक तिवारी भारतीय संस्कृति के उदार सहिष्णु और समावेशी रुप को सामने रखते हुए साम्‍प्रदायिकता को खारिज कर देते हैं. और समकालीन कविता की उन कविताओं की शिनाख्त करते हैं जहां साम्‍प्रदायिकता का प्रबल विरोध है.

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जानेमाने वैज्ञानिक तथा शायर गौहर रज़ा ने किताब के बहाने वर्तमान समय की विषम सामाजिक राजनीतिक परिस्थितियों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह किताब आज बेहद प्रासंगिक है. कार्यक्रम के संचालक सैयद परवेज़ ने कहा कि यह किताब साम्प्रदायिकता को रोकने और उसकी तह तक पड़ताल करती है.

समकालीन हिंदी कविता और साम्‍प्रदायिकता
‘समकालीन हिंदी कविता और साम्‍प्रदायिकता’ पुस्तक बेहद संवेदनशील लम्हों को संजोती हुई आगे बढ़ती है. पुस्तक में कविता की तमाम प्रवृत्तियों का क्रमवार अध्ययन करते हुए विभिन्न आयामों को समझते हैं. इस पुस्तक में जिस प्रवृत्ति का बेबाकी से खुलासा किया है, वह है साम्प्रदायिकता, जो आज हमारे दौर की सबसे बड़ी चुनौती है.

समकालीन हिंदी कविता में सांप्रदायिक रंगों की अच्छे से पहचान की गई है, वहीं दूसरी ओर सांप्रदायिकता के विरोधस्वरूप सांप्रदायिक सद्भाव एवं मानवीय मूल्यों को सहेजा गया है इस पुस्तक में सांप्रदायिकता के समाधान की कुछ दिशाएं सुझाई हैं तथा जूझने की तमाम स्थितियों को हल के रूप में प्रस्तुत किया है.

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Author: Jagran Times

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