(ममता जयंत/ Mamta Jayant)
कहन की कला में पारंगत जिन्दगी को कहानी की तरह बुनने और गुनने वाले प्रियदर्शन ने हिंदी जगत को न केवल कविता, कहानी, उपन्यास, संस्मरण, आलेख, गज़ल जैसी विविध विधाओं की सत्रह जरूरी कृतियां दी हैं बल्कि अनुवाद के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. तीन दशकों से लगातार नए-पुराने लेखकों के साथ सक्रिय रहते हुए इस निरंतरता को बराबर बनाए रखा है. इसी क्रम में आए उनके सद्यः प्रकाशित कहानी संग्रह ‘सहेलियां और अन्य कहानियां’ ने जहां कहानियों को पाठकों से जोड़ने की कलात्मकता का अनूठा उदाहरण पेश किया है वहीं लेखन को जनप्रिय बनाने की मिसाल भी कायम की है.
‘सहेलियां और अन्य कहानियां’ पुस्तक की बारह कहानियों में अधिकतर कहानियां स्त्रियों की कथा-व्यथाओं, विचित्रता-विविधताओं और उनके स्वभावों पर आधारित हैं. कहानियों में स्त्रियों की प्रकृति और प्रवृत्ति उन्हें रोचक, प्रेरक व संग्रहणीय बनाती है. बतौर कथाकार वे लिखते हैं- “इन तमाम वर्षों में अच्छा-बुरा जो हुआ, उनमें एक बात स्त्री-स्वातंत्र्य के प्रति पैदा हुई नई चेतना है. स्त्रीत्व के प्रति विकसित हुई एक नई संवेदनशीलता है. हमारे समय की लड़कियां बदली हुई हैं, उनकी चुनौतियां भी. इस बदलाव की छाया इस संग्रह की बहुत सारी कहानियों में है.”
बदलाव की छाया में लिखी गई ये कहानियां किन्हीं सायास प्रयासों से नहीं लेखक के अनायास अनुभवों से उपजी कहानियां हैं. संग्रह की पहली कहानी ‘भूल गई थी अम्मा’ जहां अतीत और वर्तमान के बीच चल रहे स्त्री मन के द्वंद्व को सामने लाती है वहीं संचार क्रांति के चलते बदलते भारत की तस्वीर भी पेश करती है. जिसमें अम्मा के दौड़ने से ठहरने तक की यात्रा है. जो सिर्फ उस स्मार्टफोन को मालूम है, जिसने उसे सिरे से पहचाना है. कहानी में कथाकार ने अट्ठारह साल की लड़की और अड़तालीस वर्ष की औरत के अन्तर्द्वन्द को रोचक ढंग से प्रस्तुत किया है. इतना ही नहीं कहानी घर, परिवार, समाज की बहुत सारी परतों को खोलती चलती है.
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संग्रह की दूसरी कहानी ‘कट्टा’ जहां दो औजारों, दो पेशों के बीच एक युद्ध है वहीं एक जंग है मानसिकता की. यह कहानी जितनी मुन्ना भाई और शिव के सम्बन्धों की है उतनी ही राजनीति और पत्रकारिता की भी. और उससे कहीं ज्यादा कलम और कट्टा की. कहानी नेताओं की नीयत, बढ़ते भ्रष्टाचार और बदलते माहौल में देश की राजनीति को उजागर करने में पूरी तरह सफल रही है. आज जब ऐसी दुनिया बन रही है जो मनुष्य को एक उपयोगी मशीन के रूप में इस्तेमाल कर रही है वहां इस तरह की कहानियां मानवीय प्रतिरोध के रूप में सामने आती हैं. जिन्हें चुनौती के रूप में देखे जाने की जरूरत है.
प्रियदर्शन की कहानियां न सिर्फ समय-समाज से रूबरू कराती हैं बल्कि मनुष्य होने का ढंग भी सिखाती हैं. संग्रह में शामिल ‘जब कहानी मिलती है’, ‘लाश’ और ‘चीख’ आत्मकथात्मक शैली में लिखी गईं ऐसी ही कहानियां हैं जो पढ़ते हुए कथाकार के आत्मावलोकन का आभास देती हैं. जिनमें एक साधन सम्पन्न व्यक्ति है जो जागरूक होते हुए भी अपनी रोज़मर्रा की आपाधापी के चलते जिम्मेदारियों से विमुख रह जाता है और कुछ न कर पाने का यह अपराध बोध उसे खाए जाता है. यह जीवन की बढ़ती खींचतान के बीच वेदना और मूल्यों को बराबरी पर रखती वे कहानियां हैं जिनमें कथाकार बने रहकर भी विलग है. इन कहानियों में जहां दौर की विडम्बना है तनाव, यातना और भय है वहीं कहानीकार ने संभावना, विश्वास और संवेदनाओं के बिम्ब रचे हैं.
एक कथाकार के रूप में प्रियदर्शन की रचनात्मकता हर बार नए सिरे से प्रकट होती है. उनकी वैचारिक दृष्टि का प्रभाव इन कहानियों पर साफ नजर आता है. यह समय की विडंबना को दर्ज करती शुद्ध कहानियां हैं. यहां ‘पत्थर’, ‘राम जी की दाढ़ी’ और ‘हिना’ जैसी कहानियों को रेखांकित करना जरूरी है, जो एक वर्ग विशेष को ध्यान में रखकर बुनी गई हैं, जिसे बिगड़ते माहौल बदलती राजनीति ने एक वंचित वर्ग बना छोड़ा है.
पत्थर की ‘रूखसाना’ से ज्यादा पीड़ित कौन होगा? जो आजादी के अमृत काल में पत्थर की मार झेल रही है और हमारे सभ्य समाज द्वारा उसकी आह सुनने की बजाय उसे चुप रहने की सलाह दी जाती है. पर वह नाटक के जरिए अपना प्रतिरोध भी दर्ज करती है और अपने सहज स्वभाव से राकेश जैसे भ्रमित युवा की मानसिकता को बदलने में भी कामयाब रहती है. हालांकि यह सब इतना आसान नहीं है लेकिन कथाकार की सकारात्मक सोच और लेखन शैली इसे आसान बनाती है.
कहानीकार जहां पतन की कहानी कहते हुए पात्रों की पीड़ा तक पहुंचे हैं वहीं शरारत, साज़िश और सियासत जैसी तमाम प्रतिकूलताओं के बीच प्रतिरोध के नए रास्ते भी खोजे हैं. इन कहानियों के माध्यम से लेखक ने चेतन भाव बोध के साथ एक मानवीय समाज बनाने की पुरजोर कोशिश की है. यह कहानियां आशा, विश्वास और सकारात्मकता के साथ आगे बढ़ती हुई गिरते मानवीय मूल्यों को रोकने में सार्थक सिद्ध होती हैं. समय के साथ-साथ होने वाले परिवर्तन को कहानीकार ने कहानियों में बखूबी दर्ज किया है.
संग्रह की शीर्षक कहानी ‘सहेलियां’ न सिर्फ सोनाली और सुजाता की कहानी है बल्कि उन तमाम स्त्रियों की कहानी है जो बहुत कुछ खोने के बाद बहुत कुछ पाने की कवायद करती हैं. बावजूद इसके अपने हिस्से की लड़ाई लड़ना नहीं भूलतीं. कहानी जहां स्त्रियों की सामान्य प्रवृत्ति को सामने लाती है वहीं सामाजिक संरचना को भी उजागर करती है. आज भी परिवार स्त्री की पहली जरूरत और जिम्मेदारी है अपेक्षाकृत कैरियर के. कैसे सोनाली और सुजाता बेटियों का टैस्ट दिलाकर अकेले अपनी जिम्मेदारी कुशलता से निभाती हैं. कहानीकार ने यहां स्त्री सशक्तिकरण के साथ बहनापे की भी पुख्ता मिसाल पेश की है. स्त्री मन की यह कहानियां कई-कई स्तरों पर चलती कई-कई परतों को खोलती हैं.
पेशे से पत्रकार स्वभाव से साहित्यकार प्रियदर्शन का यह कहानी संग्रह न केवल स्त्री मन की थाह लेता है बल्कि देशकाल समय-समाज की उन राजनीतिक, सामाजिक स्थितियों पर भी नज़र डालता है जहां आमतौर पर देख पाना संभव नहीं होता. इन कहानियों में रोज़मर्रा के जीवनानुभव के साथ बदलाव की एक लय है, जिन्हें पढ़ते हुए पाते हैं कि भारतीय समाज का जो स्वरूप बदला है या जो परिवर्तन हो रहे हैं, कहानियां उसका विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत करती हैं.
भाषा के अपव्यय से बचते हुए प्रियदर्शन समसामयिक लेखन में भी अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं. उनकी सामाजिक-राजनीतिक टिप्पणियां नित नए आयाम रचती पाठकों को नयी दिशा देती हैं.
प्रियदर्शन हिंदी जगत के महत्वपूर्ण लेखक हैं जो बिना गंभीरता ओढ़े अपनी सरल सहज भाषा में साहित्य को समृद्ध करने का काम पूरी ऊर्जा और आत्मीयता के साथ कर रहे हैं. ‘उसके हिस्से का जादू’, ‘बारिश, धुआं और दोस्त’, और ‘हत्यारा तथा अन्य कहानियां’, के बाद आया उनका यह चौथा कहानी संग्रह है. इन संग्रहों की कहानियां पाठकों को समृद्ध करने के साथ बेहतर मनुष्य बनाने का काम भी करती हैं.
पुस्तकः सहेलियां और अन्य कहानियां
लेखकः प्रियदर्शन
प्रकाशकः राधाकृष्ण प्रकाशन
मूल्यः 199 रुपये

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Tags: Books, Hindi Literature, Hindi Writer, Literature
FIRST PUBLISHED : June 23, 2023, 20:09 IST






