भारत का वो राजा, जिसको हिटलर ने तोहफे में दी थी 05 इंजन वाली शानदार कार

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हाइलाइट्स

ये साल 1935 की बात है. तब महाराजा जर्मनी के दौरे पर थे और उनकी मुलाकात हिटलर से हुई
जर्मन तानाशाह ने यादगार के तौर पर महाराजा भूपिंदर सिंह को कई तोहफे दिए

आजादी से पहले देश में कई राजा महाराजा पूरी शानोशौकत के साथ रहते थे. ब्रिटिश राज ने उन्हें काफी आजादी दे रखी थी. ये राजा अपनी रियासतें खुद संभालते थे. इन राज्यों को प्रिंसले स्टेट कहते थे.  राजाओं के पास अथाह वैभव, खूबसूरत रानियां  तो थीं हीं. साथ ही एक से बढ़कर एक शौक भी रहे. हालांकि वैभवपूर्ण जीवन में पटियाला महाराज का कोई मुकाबला नहीं था. वह अंग्रेजों के करीब थे तो हिटलर से भी उनकी मुलाकात हुई थी. ये मुलाकात ऐसी थी कि हिटलर को वह इतने पसंद आ गए कि वह ना केवल उनसे कई बार मिला बल्कि उसने उन्हें शानदार मेबेच कार भी उपहार में दे दी.

पटियाला स्टेट की स्थापना साल 1763 में बाबा आला सिंह ने मुगलों का शासन अस्वीकार करते हुए की थी. धीरे-धीरे ब्रिटिशों के सहयोग से और खासकर साल 1857 की क्रांति के दौरान अंग्रेजों का साथ देने के साथ ही पटियाला राज्य और भी मजबूत हो गया.

पंजाब की उपजाऊ जमीन पर तब खूब खेती-किसानी होती थी. उससे मिले टैक्स से जल्दी ही पटियाला देश के सबसे रईस स्टेट्स में गिना जाने लगा. अफगानिस्तान, चीन और मिडिल ईस्ट से अंग्रेजी की तनातनी के बीच पटियाला स्टेट एक बार फिर से अंग्रेजी हुकूमत का वफादार बनकर सामने आया. इससे इस स्टेट का रुतबा देश के साथ-साथ विदेशों में भी बढ़ने लगा.

भूपिंदर सिंह राजनैतिक तौर पर काफी मजबूत राजा के तौर पर उभरे. वह ताकतवर भी थे और शानोशौकत के साथ रहने वाले महाराजा.

18 साल की उम्र में महाराजा बने थे भूपिंदर सिंह
अब बात करें पटियाला महाराज भूपिंदर सिंह की तो पिता महाराज रजिंदर सिंह की मौत के बाद महज 9 साल की उम्र में ही उनके पास पटियाला रियासत की बागडोर आ गई. हालांकि औपचारिक तौर पर उन्होंने राज्य की कमान 18 साल की उम्र में ली. अगले 38 सालों तक राज्य किया.

भूपिंदर सिंह राजनैतिक तौर पर काफी मजबूत राजा के तौर पर उभरे. चैंबर ऑफ प्रिंसेज के महत्वपूर्ण सदस्य होने के कारण उनकी पूछ-परख भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी थी. इंग्लैंड, स्पेन, स्वीडन, नार्वे और कई दूसरे देशों के शासक भूपिंदर सिंह के दोस्त हुआ करते. राजनैतिक तौर पर मजबूत होना भी एक वजह मानी जाती है कि हिटलर ने उन्हें कार तोहफे में दी.

महाराजा से मुलाकात हिटलर को बहुत पसंद आई
ये साल 1935 की बात है. तब महाराजा जर्मनी के दौरे पर थे. हिटलर और महाराज भूपिंदर सिंह की मुलाकात के बारे में उनके पोते राजा मालविंदर सिंह बताया करते थे. इसका जिक्र शारदा द्विवेदी की किताब Automobiles of the Maharajas में भी है.

मालविंदर सिंह बताते हैं कि जर्मनी पहुंचे दादा ने जब हिटलर से मुलाकात का वक्त मांगा तो हिटलर ने काफी टालते हुए 5 से 10 मिनट के लिए हामी भरी. दोनों की मुलाकात हुई तो बातों का सिलसिला ऐसे बढ़ता गया कि कब 5 मिनट 15 और 30 होते हुए एक घंटे से ज्यादा हो गया, दोनों को ही अंदाजा नहीं हो सका.

जर्मन तानाशाह ने यादगार के तौर पर महाराजा भूपिंदर सिंह को कई तोहफे दिए. पहले तो वह महाराजा से मिलना नहीं चाहता था. इसमें उसने कई बार टालमटोल भी किया लेकिन एक बार जब मिला तो फिर महाराजा को पसंद करने लगा.

हिटलर ने महाराजा को लंच भी दिया
आमतौर पर देश और ग्लोबल राजनीति में उलझे रहने वाले हिटलर ने राजा से लंच के लिए रुकने का आग्रह किया. लंच के दौरान अगले रोज दोबारा मिलने की बात हो चुकी थी. दूसरे दिन के बाद दोनों लगातार तीसरे दिन भी मिले. यही तीसरा दिन था, जिस रोज जर्मन तानाशाह ने यादगार के तौर पर महाराजा भूपिंदर सिंह को कई तोहफे दिए. इसमें कई सारे जर्मन हथियार थे जैसे लिग्नोस, वेल्थर और लगर ब्रांड की पिस्टलें. इसके साथ ही एक बेहद खास तोहफा लॉन में महाराजा का इंतजार कर रहा था, ये थी चमचमाती हुई मेबेच कार.

ये कार जर्मनी से लाई गई
इस आलीशान कार के अब तक सिर्फ 6 मॉडल बने हैं. काफी लंबी-चौड़ी इस कार में 12 इंजन होते हैं, जिससे बोनट का साइज काफी बड़ा हो जाता है. पांच लोगों के बैठ सकने लायक इस कार की सीट फोल्ड होती थीं और बैठने वालों के आराम के लिए फुट रेस्ट भी थे.

कार जर्मनी से जहाज में लाई गई और महाराज भूपिंदर सिंह के मोती महल पैलेस में दूसरी आलीशान कारों के बीच खड़ी कर दी गई. दूसरे विश्वयुद्ध के दौर में कार एकाएक महल के किसी कोने में अदृश्य हो गई जो सीधे आजादी के बाद बाहर निकली.

कार प्लेट पर इसका नंबर था 7
तब तक पटियाला महाराज की मौत हो चुकी थी. उनके बेटे महाराज यादवेंद्र सिंह ने पंजाब में ये कार रजिस्टर करवाई, जिसकी नंबर प्लेट पर 7 लिखा था. बाद में ये कार अमेरिका के किसी प्राइवेट संग्रहकर्ता ने 5 मिलियन डॉलर से भी ज्यादा कीमत पर खरीद ली. कार का घूमना यहां नहीं थमा, बल्कि साल 2015 में एक से दूसरे तक होते हुए कार डेनमार्क में नीलाम हुई, जिसे किसी अज्ञात व्यक्ति ने अज्ञात राशि में खरीद लिया.

Tags: Germany, Hitler in hell, Kings, Maharaja Ranjit Singh

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Up Head Line
Author: Up Head Line

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