हाइलाइट्स
जमशेदजी टाटा ने भारत के कपड़ा उद्योग को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया था.
उन्होंने देश में सर्वोत्तम होटल खोलने का सपना देखा था और उसे साकार होते देखा था.
उन्होंने टाटा स्टील कंपनी की नींव रखी थी, लेकिन वे उसे शुरू होते नहीं देख सके थे.
जमशेदजी टाटा को भारतीय उद्योगों का पिता कहा जाता है. उनके जीवन कभी भी हालात उनके अनुकूल नहीं थे, बल्कि उन्होंने स्थितियों से आगे जा कर सोचा और ऐसे काम करने और उपलब्धियां हासिल करने की ठानी जो किसी के लिए भी सोचना तक मुश्किल काम होता था. पढाई पूरी करने से पहले ही वे अपने पिता का उनके व्यवसाय में हाथ बटाने लगे थे. और फिर विरासत के मिले इस व्यवसाय को छोड़ने के बाद जिस व्यवसाय में भी हाथ डाला उससे सोना निकाल लिया और अपने युग में व्यवसायिक कुशलता से नई ऊंचाइयों को छुआ. वे अपने जमाने के दुनिया के सबसे बड़े दानवीर माने जाते हैं. उनकी कहानी उनके बाद हर पीढ़ी के लिए प्रेरणादायक रही है.
पढ़ाई के दौरान ही पिता के व्यवसाय में
जमशेदजी टाटा के पिता नौशरवांजी पारसी पादरियों के वंश में पहले व्यापारी थे. उनका जन्म 3 मार्च 1839 को गुजरात के नवसारी में हुआ था. पढ़ाई के दौरान ही केवल 14 साल की ही उम्र में ही उन्होंने अपने पिता के व्यवसाय में हाथ बंटाना शुरू कर दिया था. उन्होंने 1858 में एल्फिस्टन कॉलेज में स्नातक की पढ़ाई की और पढ़ाई पूरी करने के बाद व्यवसाय से पूरी तरह से जुड़ गए थे.
अफीम के व्यवसाय में
पिता की निर्यात कंपनी की जापान, चीन यूरोप, और अमेरिका में शाखाएं थीं. 1857 के विद्रोह की स्थितियों के कारण उस समय व्यवसाय चलाना एक मुश्किल कार्य था. नुसेरवानजी टाटा नियमित तौर पर चीन जाया करते थे और अफीम का व्यवसाय करते थे. वे अपने बेटे जमशेदजी को भी उसी व्यवसाय मेंडालना चाहते थे और इसके लिए वे से चीन भेजना थे जिससे वे अफीम के व्यापार की बारीकियां सीख सके.
अफीम की जगह कपड़े का व्यवसाय
जब जमशेदजी टाटा चीन गए तो उन्होंने देखा कि भविष्य तो कपड़े के व्यवसाय में है. 29 साल की उम्र तक उन्होंने अपनी पिता की कंपनी में काम किया और फिर 1868 में 21 हजार रुपयों से एक व्यवसाय कंपनी खोली. उन्होंने चिंचपोकली में दिवालिया तेल की कारखाने को खरीद कर उसे रुई की फैक्ट्री में बदला और दो साल बाद उसे मुनाफा में बेच दिया.
जमशेदजी टाटा लीक से हटकर दूर की संभावनाओं को पहचान लेते थे. (फाइल फोटो)
नागपुर में उम्मीद के विपरीत सफलता
इसके बाद उन्होंने पहले नागपुर में ही रुई का कारखाना खोल और फिर वहीं कपड़े का कारखाना भी खोला, लोगों को हैरानी हुई कि मुंबई जैसी जगह को छोड़ कर उन्होंने नागपुर को क्यों चुना. लेकिन जमशेदजी को इसमें भी सफलता मिल गई और 1877 में उन्होंने नागुपर में एक और मिल खोल दी.
यह भी पढ़ें: Pokhran I: परमाणु परीक्षण के लिए कैसे प्रेरित हुआ था भारत?
जीवन के चार लक्ष्य
जमशेदजी टाटा के जिंदगी में चार लक्ष्य थे. वे एकस्टील कंपनी खोलना चाहते थे. इसक अलावा वे एक विश्वस्तरीय प्रशिक्षण संस्थान, एक खास तरह का होटल और एक हाइड्रोइलेक्ट्रिक संयंत्र खोलना चाहते थे. लेकिन वे अपने जीवन में केवल होटल खोलने का ही सपना पूरा होते देख सके. जब 3 दिसंबर 1903 को मुंबई में ताज महल होटल मुंबई के कोलाबा इलाके में खुला. उस समय वह भारत का एकमात्र होटल था जिसमें बिजली थी.
जमशेदजी टाटा अपने जीवन के चार सपनों में केवल ताज होटल का सपना ही अपनी आखों से सामने साकार होता देख सके थे. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Wikimedia Commons)
कपड़ा निर्यातक देश बनाने की चाह
जल्दी ही जमशेदजी भारत में कपड़ा और कपास उद्योग के शीर्ष पर पहुंच गए और अहमदाबाद के आर्थिक विकास में उनकी कपड़ा मिल की बहुत बड़ी भूमिका थी. वे भी स्वदेशी के पक्षधर थे और वे खुद चाहते थे कि मानचेस्टर में जितना महीन कपड़ा तैयार होता था, उसी के स्तर की गुणवत्ता का कपड़ा भारत में भी पैदा हो. कपड़ा उद्योग में वे भारत को निर्यातक की श्रेणी में ला देना चाहते थे.
यह भी पढ़ें: Sukhdev Thapar B’day: गांधी जी को लिखे खत ने बताया, कितने बड़े विचारक थे सुखदेव
लेकिन जमशेदजी टाटा के तीन अधूरे सपनों को उनके वंशजों ने पूरा किया पहले टाटा स्टील कंपनी को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ कंपनियों में से एक बनाया जो एशिया की पहली और भारत की सबसे बड़ी स्टील कंपनी है. इसके अलाव बेंगलूरू में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस आज विज्ञान, इंजीनियरिंग और शोध में भारत के शीर्ष संस्थानों में गिना जाता है. वहीं हाइड्रोइलेक्ट्रिक पॉवर सप्लाई कंपनी जिसे आज टाटा पॉवर के नाम से जाना जाता है भारत को सबसे ज्यादा बिजली पैदा करने वाली कंपनी है. 19 मई 1904 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया था.
.
Tags: History, History of India, India, Research
FIRST PUBLISHED : May 19, 2023, 06:48 IST









