मध्‍य प्रदेश जनजातीय संग्रहालय: जनजातीय रंगों से सराबोर दिलचस्‍प संग्रहालय

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मध्‍य प्रदेश का आदिवासी संसार अनेक रंगों से सराबोर है. पूरे जनजातीय परिदृश्‍य पर नजर डालें तो एक इंद्रधनुषीय आभालोक नजर आता है. हर जनजाति की जीवन शैली भिन्‍न है. उनका रहन-सहन, खानपान और पहनावा एक दूसरे से जुदा है. तीज-त्‍योहार हों या पूजा-अनुष्‍ठान या फिर जन्‍म-मृत्‍यु और विवाह संस्‍कार, सबका सब कुछ अलग है. नृत्‍य और गीत-संगीत से तो उनकी अपनी अलग पहचान सर्वविदित है ही.

मध्‍य प्रदेश की बात करें तो एक सिरे से दूसरे सिरे तक फैली इन जनजातियों को समझने के लिए आपको लंबी और कहीं-कहीं दुरूह यात्रा भी करना पड़ सकती है. स्‍वाभाविक रूप से इसके लिए खूब ज्‍यादा समय की भी दरकार होगी. लेकिन आपको कैसा लगेगा अगर हम कहें कि आपको महज एक दिन निकालना है और आप आदिवासियों की रहस्‍य के आवरण से ढंकी इस दिलचस्‍प दुनिया में सीधे दाखिल हो सकते हैं, उसे समझ सकते हैं, उसके बारे में बहुत कुछ जान सकते है – सब कुछ एक दिन में? जी हां, इसे संभव बनाता है भोपाल स्थित ‘मध्‍य प्रदेश जनजातीय संग्रहालय’.

तो चलें ‘इंटरनेशनल म्‍यूजियम डे’ पर करते हैं इसी संग्रहालय की बात.

भोपाल की खूबसूरत पहाड़ी श्यामला हिल्‍स पर बसा ये संग्रहालय रोचक जानकारियां तो अपने आप में समेटे ही है. इसका खूबसूरत आर्किटेक्‍ट और इसकी दिलचस्‍प बुनावट सीधे आपके दिलो दिमाग में दाखिल होने और उस पर पूरी तरह छा जाने की काबिलियत रखती है.

जनजातीय संग्रहालय रेवती कामथ द्वारा डिजाइन किया गया है. इसका उद्घाटन जून 2013 में किया गया था. संग्रहालय अलग-अलग थीम दीर्घाओं में विभाजित है, जो मध्‍य प्रदेश की विभिन्‍न जनजातियों जैसे गोंड, भील, कोरकू, बैगा, भारिया, सहरिया और कोल जनजातियों की बात करती हैं. इनमें शामिल हैं कला, संस्‍कृति, परंपरा, जीवन उपयोगी शिल्‍प-चित्र, रहन-सहन तथा रीति-रिवाज आदि. इन सभी को यहां विभिन्‍न माध्‍यमों के सहारे आकर्षक और रोचक अंदाज़ में पेश किया गया है.

यहां समय-समय पर कार्यशालाएं, सांस्‍कृतिक कार्यक्रम आदि भी आयोजित किए जाते हैं. इन आयोजनों का मुख्‍य उद्देश्‍य जनजातीय समाज की मान्‍यताओं और उनकी कला संस्‍कृति से लोगों का सीधा साक्षात्‍कार कराना है. ऐसे अनेक प्रादर्श यहां मूल रूप में प्रदर्शित किए गए हैं, जो जनजातीय संस्‍कृति में रोजमर्रा उपयोग किए जाते हैं.

यहां की प्रमुख दीर्घाओं में ये शामिल हैं. ‘सांस्‍कृतिक वैविध्‍य दीर्घा’ में मध्‍य प्रदेश की विशिष्‍टता को स्‍थापित करने, उसकी बहुरंगी, बहुआयामी संस्‍कृति को दर्शाने का उपक्रम है. ‘जीवन शैली दीर्घा’ में शीर्षक के अनुरूप आदिवासी जीवन शैली देखने को मिलती है. ‘कलाबोध’ में गीत, पर्व, मिथकों और अनुष्‍ठानों को समेटा गया है. ‘देवलोक दीर्घा’ में संकेतों और प्रतीकों के सहारे आदिवासी समुदाय द्वारा लिखे गए वितान की झलक देखी जा सकती है. ‘रक्‍कु दीर्घा’ में बचपन और उसके खेलों पर आधारित प्रदर्शनी है.

‘छत्‍तीसगढ़ दीर्घा’!
‘मध्‍य प्रदेश’ पर केंद्रित ‘संग्रहालय’ में छत्‍तीसगढ़ का क्‍या काम? वर्तमान में भले ही इसे अतिथि राज्‍य की संज्ञा के साथ स्‍थान दिया गया है लेकिन यह राज्‍य था तो पहले मध्‍य प्रदेश का ही अंग. सो यह गैलरी यहां है. इसमें छत्‍तीसगढ़ राज्‍य के जनजातीय समुदाय के जीवन की झलक देखने को मिलती है.

इन छह दीर्घाओं में जहां एक ओर प्राकृतिक उपादानों मसलन पुआल, पत्‍ते, पत्‍थर, मिट्टी, बांस, लकड़ी, लोहा, सूखे वृक्षों-टहनियों आदि का भरपूर उपयोग किया गया है, वहीं दूसरी ओर आधुनिक औजारों, तकनीक, दृश्‍य-श्रव्‍य माध्‍यमों, प्रकाश संयोजन आदि का भी इस्‍तेमाल किया गया है.

यह तो आधुनिक इमारत के भीतर आदिवासी जीवन दृष्टि को पकड़ने की चेष्‍टा हुई. यह अपने आप में विरोधाभासपूर्ण है. इस विरोधाभास का उल्‍लेख खुद म्‍यूजियम की पुस्तिका में है. जवाब भी वहीं है ‘यदि सच्‍चे अर्थों में हमें उस (जनजातीय) जीवन पद्धति को जानना है, तो हमें उनके बीच, उनके परिवेश में जाना होगा. किंतु संग्रहालय का दायित्‍व तथा ध्‍येय शहरी और आदिवासी दोनों समाजों के प्रति और दोनों के बीच परस्‍पर संवाद की पृष्‍ठभूमि तैयार करना है.’ इसी के चलते दीर्घाओं में आधुनिक और देशज दोनों सामग्रियों का इस्‍तेमाल किया गया है. पुस्तिका लिखती है ‘दीर्घाओं को बहुआयामी, ज्ञानवर्द्धक, चित्‍ताकर्षक तथा देशज ज्ञान से भरपूर किंतु साथ ही दिलचस्‍प बनाए बगैर आज के इस तेज रफ्तार समय में दर्शकों को संग्रहालय की ओर मोड़ना संभव नहीं है.’

मध्‍य प्रदेश ओर भोपाल के दूसरे ट्रायबल संग्रहालयों से यह संग्रहालय कैसे अलग है? सवाल के जवाब में संग्रहालय के क्‍युरेटर अशोक मिश्रा कहते हैं, ‘यह मध्‍य प्रदेश की प्रमुख जनजातियों की जीवन उपयोगिता के तमाम उपकरणों को उनके सौंदर्यबोध में अभिव्‍यक्‍त करता है.’ जबकि छिदवाड़ा का ‘बादल भोई राज्‍य आदिवासी संग्रहालय’ जनजातियों के स्‍वाधीनता आंदोलन में योगदान और जीवन उपयोगी वस्‍तुओं के प्रदर्शन का स्‍थल है. ‘भारत भवन’ जनजातीय कलाओं के श्रेष्ठ की प्रदर्शन स्‍थली है. ‘इंदिरा गांधी राष्‍ट्रीय मानव संग्रहालय’ जनजातीय जीवन की विकास यात्रा को विभिन्‍न प्रादर्शों के आधार से प्रस्‍तुत करता है.
भविष्‍य की योजनाओं के बारे में अशोक मिश्रा कहते हैं, ‘भविष्‍य में प्रदेश की सातों जनजातियों के प्रतिनिधि आवासों के निर्माण की योजना है. जहां इन जातियों के लोग रहेंगे. वे यहां विजि़ट करने वाले लोगों को सशुल्‍क भोजन परोसेंगे और शिल्‍प रचना का निर्माण और विक्रय कर सकेंगे.’

राजेंद्र जांगले मशहूर डायरेक्‍टर और फिल्‍मकार हैं. ट्रायबल पर खूब काम किया है. हाल ही में मध्‍य प्रदेश की सभी सातों ट्राइबल पर डाक्‍यूमेंट्रीज भी की हैं. उन्‍हें छह राष्‍ट्रीय फिल्‍म पुरस्‍कार प्राप्‍त हुए है जिसमें ट्राइबल म्‍यूजि़यम के लिए बनाई गई ‘मांदल के बोल’ को नान फीचर फिल्‍म कैटेगरी में 68 वां राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार मिला है. म्‍यूजियम पर और भी डाक्‍यूमेंट्रीज़ की हैं, जो प्रदर्शित होना हैं. राजेंद्र जांगले कहते हैं, ‘यह जनजाति पर केंद्रित दुनिया का इकलौता म्‍यूजि‍यम है. इसकी सबसे बड़ी खासियत इसका जीवंत होना है. यहां चीजें लगभग वैसी और उसी रूप तथा आकार में नजर आती हैं जैसी वो आदिवासी इलाकों में दिखाई देती हैं. शादी का मंडप जरूर अपवाद है जहां सभी जनजातियों के विवाह मंडप से कुछ-कुछ लेकर नया रूप दिया गया है.’

संग्रहालय का प्रतीक चिह्न बिरछा है. यह धरती की उर्वरा शक्ति और जीवंतता का प्रतीक वृक्ष है. मध्‍य प्रदेश की गोंड तथा कुछ अन्‍य जनजातियों की स्त्रियां यह गुदना-बिरछा जोहरा यानि वृक्ष का जेवर अपने शरीर पर धारण करती हैं. इन्‍हें धारण करना घर-परिवार के लिए अक्षुण्‍य अन्‍न की ढ़ेरियों की कामना करना है.

कुल मिलाकर कहा जा सकता है जनजातीय संग्रहालय देखना हमेशा याद रहने वाला अनुभव है. ये ठीक है कि आप यहां आए, घूमे-बैठे, कैंटीन में कॉफी का लुत्‍फ लिया, चट्टानों के बीच बने नेचुरल लुक वाले बाग में तफरीह की, सेल्फियां लीं और चले गए. ठीक है, ऐसा तो होगा ही, क्‍योंकि यहां धूनी रमाने की परमिशन तो है नहीं लेकिन ये तय है कि इसकी खूबसूरति और इसकी विलक्षणता आपके जेहन में खूंटी की तरह ठुक जाएगी. आपके दिलो-दिमाग में हमेशा के लिए धूनी रमाकर बैठ जाएगी. तय मानिए आप इसे देखकर बाहर निकलेंगे तो इसके सौंदर्यबोध, इसके आर्किटेक्‍चर-डिजाइन और इसकी प्रदर्शन-कलात्‍मकता में देर तक गहरे डूबे रहेंगे. यह सुनने की नहीं देखने की चीज है, इसकी खूबसूरती को शब्‍दों में बयां नहीं किया जा सकता. कह सकते हैं:

सिर्फ एहसास है ये, रूह से महसूस करो, प्‍यार को प्‍यार ही रहने दो कोई नाम न दो.

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Up Head Line
Author: Up Head Line

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