
ओम प्रयास/हरिद्वार. हरिद्वार सभी धर्म के प्राचीन स्थानों का मुख्य केंद्र कहा जाता है. आज हम अपनी खबर में आपको एक ऐसे स्थान के बारे में बताने जा रहे हैं जो करीब 750 साल से भी ज्यादा पुराना है. यह स्थान हरिद्वार के जंगलों में स्थित है, जहां लोगों का आना-जाना लगा रहता है. हम अपनी खबर में हजरत सैयद सुल्तान शाह दरगाह के बारे में बताने जा रहे हैं जो करीब 750 साल से भी ज्यादा पुराना है.
हजरत सैयद सुल्तान शाह दरगाह हरिद्वार हिल बाईपास रोड पर से करीब 300 मीटर अंदर जंगलों में स्थित है. इस दरगाह पर रोजाना हर धर्म के व्यक्ति अपनी मन्नत लेकर जाते हैं तो कुछ लोग जिनकी मन्नते पूरी हो गई हैं वह यहां प्रसाद चढ़ाने जाते हैं. हरिद्वार में स्थित हजरत सय्यद सुल्तान शाह दरगाह पर चादर चढ़ाने का महत्व बताया गया है. इस दरगाह पर सालाना उर्स भी होता है जिसमें जनपद समेत बाहर से भी जायरीन यहां चादर चढ़ाने आते हैं. कहा जाता है कि यहां मांगी गई मुरादे पूरी होती हैं. दरगाह के अंदर डोरी या धागा बांधने का भी महत्व है. कहते हैं जो व्यक्ति यहां आकर अपनी मन्नतें मांगते हैं .वह दरगाह के अंदर एक धागा बांधकर जाते हैं और अपनी मुराद पूरी होने के बाद वह आकर धागा खोल देते हैं. यह परंपरा काफी पुरानी बताई जाती है.
घने जंगलों के बीच है दरगाह
यह दरगाह जंगलों में स्थित है और हरिद्वार के जंगलों में गुलदार से लेकर हर तरह के जीव जंतु हैं. ऐसे में आज तक कोई भी जानवर दरगाह परिसर या रास्ते में नहीं आया.यह भी कह सकते हैं कि दरगाह पर जाने वाले लोगों को आज तक जंगल के किसी भी जानवर ने परेशान नहीं किया. हजरत सैयद सुल्तान शाह दरगाह पर जाने वाले लोगो को किसी जंगली जानवर का डर नही रहता हैं.
पूरी होती है सभी लोगों की मन्नत
दरगाह पर पिछले 50-60 सालों से देख रेख कर रहे खैर अली शाह ने कहा कि दरगाह पर आने वाले लोग यहां आकर मन्नते मांगते हैं, और जब उनकी मन्नते पूरी हो जाती हैं तो वह यहां आकर फूल, प्रसाद, चादर आदि चढ़ाकर जाते हैं. वहीं कुछ लोग यहां आकर मन्नतें मांगने के साथ डोरी का धागा या फिर काला धागा बांधकर अपनी मन्नते मांगते हैं. जब मन्नत उनकी मन्नत पूरी हो जाती है तो वह दरगाह पर प्रसाद चढ़ाते हैं और अपना बांधा हुआ धागा/डोरी खोल कर जाते हैं. इस दरगाह पर आने वाले सभी लोगों की मन्नतें पूरी होती हैं.
हर साल उर्स का होता है आयोजन
खैर अली शाह बताते हैं कि जिन लोगों को डॉक्टर जवाब दे देते हैं, वह भी यहां दरगाह से ठीक होकर जाते हैं. वही उनका कहना है कि यहां पर हजरत सय्यद सुल्तान शाह दरगाह पर हर साल उर्स भी लगता है. यहां उर्स के अवसर पर हर धर्म के लोग कंधे से कंधा मिलाकर सेवा करते हैं. यहां पर उर्स के दौरान भंडारे का भी आयोजन किया जाता है. इस दरगाह पर कोई भेदभाव नहीं है, इसलिए यहां पर साधु संत भी आते हैं और पीर फकीर भी यहां पर आते हैं.
समय के साथ उर्स का उत्साह हुआ खत्म
खैर अली शाह बताते हैं कि दरगाह का प्राचीन इतिहास हरिद्वार से जुड़ा हुआ है. हरिद्वार का प्राचीन नाम मायापुर है और मायापुर के राजा दुलीचंद के यहां हजरत सय्यद सुल्तान शाह की दुआ से दो पुत्रों ने जन्म लिया था, जिसमे बड़े बेटे का नाम भूप सिंह और छोटे का नाम मानसिंह था. वह बताते हैं कि आज जिस स्थान पर दरगाह स्थित है यह जमीन राजा दुलीचंद ने बाबा को दान में दी थी. बाबा के इस दुनिया से चले जाने के बाद राजा दुलीचंद के द्वारा ही सब कुछ किया गया था. राजा दुलीचंद के द्वारा ही इस स्थान पर उर्स मेले का आयोजन किया गया था. बाबा के उर्स पर लगने वाले मेले में हाथी, घोड़े जैसे सभी सामान मिलते थे, लेकिन वक्त बदलने के साथ-साथ अब उर्स केवल मोहर्रम की चांद रात 3, 4 और 5 को लगता है.
पूरी हुई वशिष्ठ सोनी की दुआ
दरगाह पर फूल प्रसाद चढ़ाने आए श्रद्धालु वशिष्ठ सोनी बताते हैं कि वह दरगाह पर प्रसाद चढ़ाने आए हैं. उन्होंने दुआ मांगी थी उनके यहां बेटा हो जाए. तीन बेटियों के बाद उनके यहां बेटा हो गया है, इसीलिए यहां प्रसाद चढ़ाने आए हैं. संगीता सोनी बताते हैं कि वह कई साल बाद यहां दरगाह पर आई हैं. जब वह दरगाह पर पहले आई थी तो उन्होंने मन्नत मांगी थी. वह मन्नत पूरी हो गई है इसलिए वह यहां पर प्रसाद चढ़ाने आई हैं.
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Tags: Dharma Aastha
FIRST PUBLISHED : May 14, 2023, 15:06 IST









