कभी कभी हमारे सामने ऐसी घटनाएं, हादसे और वारदातें सामने आतीं हैं जो बड़े-बड़े सवाल खड़े कर देती हैं. हम सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि क्या इन हादसों को या इस अपराध को रोका नहीं जा सकता था. हां, बहुत सी घटनाएं रोकी जा सकतीं हैं शिक्षा से, जागरुकता से, जानकारी से. महाराष्ट्र के ठाणे में एक ऐसी ही घटना सामने आई है जहां एक भाई अपनी 12 साल की मासूम बहन का हत्यारा बन गया.
अब हत्या की जो वजह सामने आई है वो समाज पर सवाल खड़े कर रही है. दरअसल, भाई-भाभी के साथ रहने वाली 12 साल की बच्ची को पहली बार पीरियड हुए, कपड़ों पर खून के धब्बे देखकर उसके भाई को लगा कि बहन ने किसी के साथ शारीरिक संबंध बनाए हैं. कहा जा रहा है कि इसमें बच्ची की भाभी ने भी भाई को ये बताने के बजाए कि ये धब्बे पीरियड के हैं उसे और भड़काया, नतीजतन भाई ने अपनी 12 साल की बहन को तीन दिन तक बेरहमी से पीटा जिससे उसकी मौत हो गई.
मासिक धर्म के बारे में किशोरियों को क्यों नहीं पता?
इस घटना ने एक साथ कई सवाल पैदा किए हैं, साथ ही फिर उस मुद्दे को उठाया है जिसको हमारे देश में हमेशा से अनदेखा किया जा रहा है. मुद्दा है मेंस्ट्रुअल और सेक्सुअल जागरुकता का. 12 साल की बच्ची को जब पहली बार पीरियड आया तो उसे इस बारे में कुछ पता ही नहीं था. वो नहीं जानती थी कि उसकी उम्र बढ़ने के साथ उसके शरीर में बदलाव होगा तो मासिक धर्म जैसा कुछ भी होगा. ये इसलिए हुआ क्योंकि आज भी हमारे घरों में इस बारे में बात नहीं की जाती है ना इसके बारे में बच्चों को कोई जानकारी दी जाती है. जब 12 साल की बच्ची से उसके 30 साल के भाई ने खून के धब्बों के बारे में पूछा तो बच्ची के पास उसके किसी भी सवाल का जवाब नहीं था क्योंकि वो कुछ समझ ही नहीं पा रही होगी. उसे पता ही नहीं था कि उसके शरीर में क्या परिवर्तन हुआ है, ये खून के धब्बे कैसे उसके कपड़ों पर आए. 30 साल का शादीशुदा मर्द क्या ये नहीं जानता था कि इस उम्र में पीरियड शुरु होते हैं?
दरअसल, ये वारदात नहीं होती और एक बच्ची अपनी जान से नहीं जाती, अगर उस बच्ची को पीरियड्स के बारे में कोई जानकारी होती, वो अपने भाई के सवालों के जवाब दे सकती थी. लेकिन जिसे खुद नहीं पता कि पीरियड क्या होते हैं वो क्या ही जवाब देती? उस बच्ची के घर में या स्कूल में किसी भी तरह से मेंस्ट्रुअल अवेयरनेस नहीं दी गई. भाई को भी किसी तरह से सेक्सुअल और मासिक धर्म के बारे में कोई जानकारी नहीं थी या थी भी तो वो अधकचरी जिसका नतीजा ये हत्या है.
पीरियड्स के बारे में बात करना बेशर्मी क्यों?
निचले तबके की बात छोड़ भी दें तो आज भी मिडिल क्लास या हमारा समाज मासिक धर्म पर बात करने से बचता है, या बात करना ही नहीं चाहता है. सोशल मीडिया पर कुछ औरतें इस बारे में जब खुलकर बात करती हैं और इस टैबू से बाहर निकलने के लिए कहती हैं तो उनको ट्रोल किया जाता है, उन्हें गालियां दी जाती हैं, उनको असंस्कारी कहा जाता है. जबकि इस मुद्दे पर बात करना कितनी जरूरी है ये इस घटना से ज़ाहिर हो जाता है. लड़कियां आज भी पीरियड पर बात करने से घबराती हैं. बहुत सारी भ्रांतियां हैं, बहुत सारे टैबू उन्हें इसके बारे में बात करने से रोकते हैं. जबकि ये एक सामान्य शारीरिक प्रक्रिया है.
पीरियड को लेकर ना तो लड़कियों में जागरुकता है ना ही उन्हें पता है कि उन्हें पीरियड के दिनों में किस तरह खुद को साफ रखना है. गांवों में अभी भी औरतों, लड़कियों की पहुंच से सेनेटरी नैपकिन दूर हैं. और उन्हें नहीं पता कि पीरियड में गंदे कपड़े इस्तेमाल करने से या साफ सफाई से नहीं रहने पर उन्हें आगे किस तरह की शारीरिक समस्याएं हो सकती हैं. हालांकि, सरकारों ने इस बारे में जागरुकता अभियान के साथ मुफ्त सेनेटरी पैड की योजनाएं भी चलाई हैं. राजस्थान सरकार उड़ान योजना के तहत 18 से 45 साल की आयु की महिलाओं को हर महीने 12 सेनेटरी नैपकिन मुफ्त बांटती है. इस तरह की योजना हर राज्य सरकार को शुरू करने की जरूरत है.
मासिक धर्म के बारे में तो समाज में जागरुकता है ही नहीं, हम इस पर बात करने से कतराते हैं, मर्द तो इस बारे में सुनना ही पसंद नहीं करते हैं. पीरियड के बारे में बात करना किसी पाप की तरह है. इसी तरह हमारे समाज में सेक्स को लेकर भी हौवा है. सेक्स एजुकेशन को हमारी सभ्यता के खिलाफ मान लिया जाता है. जबकि स्कूलों में बड़े होते बच्चों को सही सेक्स एजुकेशन की जरूरत है. इसी मामले में देख लें तो भाई के दिमाग में ये बात थी या उसे यही पता था कि पहली बार सेक्स करने पर ब्लीडिंग होती है. जबकि ये भी एक बड़ा टैबू है कि पहली बार सेक्स करने पर ब्लीडिंग होगी. आज भी देश के कुछ इलाकों में शादी के बाद लड़की के वर्जिनिटी टेस्ट के लिए उसके बिस्तर पर सफेद चादर बिछाई जाती है. इस सफेद चादर पर लगे खून के धब्बों से साबित होता है कि लड़की वर्जिन थी या नहीं.
जबकि डॉक्टर्स हमेशा ये बताते आए हैं कि लड़कियों कि महिलाओं की योनि में एक पतली परत होती है जिसे हाइमन कहा जाता है, और ये हाइमन बहुत सी वजह से टूट सकती है. जिसमें खेलकूद, साइकिल चलाना,एक्सरसाइज इत्यादि शामिल है. यानी जरूरी नहीं कि जब लड़की पहली बार सेक्स करे तभी ब्लीडिंग हो. भारतीय समाज में यही मान्यता है कि पहली बार सेक्स करने पर महिला को ब्लीडिंग होती है, और अगर ये ब्लीडिंग नहीं हुई तो लड़की पहले किसी के साथ शारीरिक संबंध बना चुकी है. इस गलत जानकारी, भ्रांति की वजह से कई लड़कियों की जिंदगी खराब हो चुकी है, वो जिंदगी भर शक की निगाहों से देखी जाती हैं.
समय समय पर मेस्ट्रुअल और सेक्सुअल अवेयनेस को लेकर बहस होती है. सोशल मीडिया पर लगातार इस बारे में लिखा भी जाता है. लेकिन यहां भी अच्छे-अच्छे पढ़े-लिखे लोग पीरियड पर बात करने से कतराते हैं या फिर इसे इतनी जरूरी बात नहीं मानते हैं कि इस पर खुलकर बात की जाए. 12 साल की बच्ची अपनी ज़िंदगी से इसलिए हाथ धो बैठी क्योंकि उसे पीरियड के बारे में कुछ नहीं पता था. और एक भाई अपनी बहन का हत्यारा इसलिए बन बैठा क्योंकि उसे यही पता था कि पहली बार सेक्स करने से ब्लीडिंग होती है. अगर बच्ची का किसी के साथ शारीरिक संबंध बन भी गया था तो भी उसके भाई को उसकी जान लेने का कोई हक नहीं था. लेकिन भाई के सिर पर तो तथाकथित इज्जत बचाने का भूत सवार था. झूठी इज्जत, झूठा अहंकार, गुस्सा और सबसे ज़्यादा अशिक्षा ने एक मासूम बच्ची की जान ले ली.
निदा रहमानपत्रकार, लेखक
एक दशक तक राष्ट्रीय टीवी चैनल में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी. सामाजिक ,राजनीतिक विषयों पर निरंतर संवाद. स्तंभकार और स्वतंत्र लेखक.










