बाइडेन को ईट्स वाली गिफ्ट के बहाने मोदी ने किया हिंदुत्व विरोधियों को चित! | – News in Hindi

प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन और ‘फर्स्ट लेडी’ जिल बाइडेन से मुलाकात के दौरान अपनी तरफ से कई उपहार दिये. इसमें भारतीय संस्कृति के हिसाब से दस किस्म के दान करने वाली वो खास हस्तनिर्मित काष्ठ मंजूषा भी थी, जिसका निर्माण किया था जयपुर के कलाकारों ने, कर्नाटक से आई हुई चंदन की लकड़ी से.

चंदन की इस काष्ठ मंजूषा यानी बॉक्स के अंदर विघ्नहर्ता गणेश की वो छोटी सी चांदी की मूर्ति भी थी, जिसे कोलकाता के शिल्पियों ने तैयार किया था. दीया भी कोलकाता से ही बनवाया हुआ और ताम्रपत्र उत्तर प्रदेश से. दस किस्म के दान के तहत छोटी- छोटी चांदी की डिब्बियों में कोलकाता में ही चांदी से बना नारियल, मैसूर से आया हुआ सुगंधित चंदन, तमिलनाडु का तिल, राजस्थान में निर्मित चौबीस कैरेट का सोने का सिक्का, पंजाब का घी, झारखंड में बना टसर सिल्क का कपड़ा उत्तराखंड का चावल, महाराष्ट्र का गुड़, राजस्थान में निर्मित 99.5 प्रतिशत शुद्ध चांदी का सिक्का और गुजरात का नमक.

ये सभी दस चीजें उस दशदानम् का हिस्सा है, जिसे भारतीय संस्कृति में उस व्यक्ति के सुदीर्घ जीवन का उत्सव मनाने के लिए की जाती हैं, जो अपने जीवन में हजारवीं बार पूर्ण चंद्र का दर्शन करने जा रहा होता है. दस किस्म के दान होते हैं – गौदान, भूदान, तिलदान, हिरण्यदान, अज्यदान, वस्त्रदान, धन्यदान, गुड़दान, रौप्यदान और लवणदान.

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के लिए इस तरह के दान करने का मौका इसी तीन जुलाई को आने जा रहा है, जब वो अपने सुदीर्घ जीवन में हजारवीं बार पूर्ण चंद्रमा का दर्शन कर रहे होंगे. सबसे अधिक आयु में अमेरिका का राष्ट्रपति बनने वाले जो बाइडेन का जन्म 20 नवंबर 1942 को हुआ था और भारतीय ज्योतिष गणना के हिसाब से अस्सी साल आठ महीने की आयु में अमूमन लोग अपने जीवन में हजारवीं बार चंद्रमा के पूर्ण स्वरुप का दर्शन कर पाते हैं. मोदी का ये उपहार जो बाइडेन के सुदीर्घ जीवन का उत्सव भारतीय संस्कृति के हिसाब से मनाने की तैयारी है, निजी तौर पर बाइडेन इससे कितना खुश होंगे, अंदाजा ही लगाया जा सकता है.

Narendra Modis gifts to the US President,

मोदी का अमेरिकी दौरा खत्म होने के तुंरत बाद तीन जुलाई 2023 को बाइडेन ‘सहस्र पूर्ण चंद्रयम्’ के बड़े अवसर को उत्साह से मना सकते हैं, जो उनके उन विरोधियों के लिए जबरदस्त जवाब होगा, जो अकसर उनकी बड़ी उम्र और खराब सेहत को लेकर उनका मजाक उड़ाते रहते हैं. अस्सी साल और करीब आठ महीने का हो जाने के इस बड़े मौके पर वो विघ्नहर्ता गणेश की आराधना कर सकते हैं, जिसे पीएम मोदी ने गिफ्ट किया है, दानपेटी के अंदर रखकर. गणेशजी की कृपा हो गई, तो इसके बाद न सिर्फ बाइडेन अच्छे स्वास्थ्य के साथ राष्ट्रपति के तौर पर अपना कामकाज कर सकते हैं, बल्कि 2024 में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों में भी दूसरी बार जीत के लिए हाथ आजमा सकते हैं.

उपहारों के जरिये सुदीर्घ सुखी जीवन की कामना

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने शास्त्रीय उपहारों के जरिये न सिर्फ बाइडेन के सुदीर्घ सुखी जीवन की कामना की है, बल्कि उनकी साहित्यिक अभिरूचि की तरफ भी दुनिया का ध्यान खीचा है. बाइडेन के पसंदीदा साहित्यकार हैं, विलियम बटलर ईट्स (William Butler Yeats), जिन्हें अमूमन अपने भाषणों में उद्धृत करते रहते हैं बाइडेन. खास बात ये है कि बाइडेन के साहित्यिक हीरो ईट्स की रचनाओं में भारतीय संस्कृति और मूल्यों की बड़ी इज्जत है, जिन सनातन मूल्यों और संस्कृति पर लगातार हमला हो रहा है अमेरिका में, हिंदूफोबिया खड़ा किया जा रहा है वहां की धरती पर.

अपने मेजबान बाइडेन के इस पसंदीदा साहित्यकार के बारे में पता था पीएम मोदी को, इसलिए वो बाइडेन के लिए खास पुस्तक भेंट में ले गये. ये पुस्तक है 1937 में प्रकाशित ‘The Ten Principal Upanishads’.

The Ten Principal Upanishads

The Ten Principal Upanishads.

ये पुस्तक ईट्स ने एक भारतीय दार्शनिक पुरोहित स्वामी के साथ मिलकर अंग्रेजी में लिखी थी. इस पुस्तक के पहले संस्करण का प्रकाशन हुआ था लंदन में. इसी विंटेज वैल्यू वाले पहले संस्करण की एक प्रति मोदी ने बाइडेन को भेंट की.

अमेरिकन फर्स्ट लेडी जिल को भी दिए खास उपहार

अपने मेजबान जो की जीवन साथी जिल के लिए भी पीएम भारत से खास उपहार लेकर पहुंचे थे, साढे सात कैरेट का लैब ग्रोन ग्रीन डायमंड, जिसे पेपर मेशी वाले हस्तनिर्मित बॉक्स में रखकर दिया गया था. जाहिर है, ये भी भारतीय कारीगरी के इतिहास और वर्तमान की झलक है. कश्मीर के कलाकार जहां कागज की लुग्दियों पर उकेरी जाने ‘पेपर मेशी’ की कला के लिए पिछली कई शताब्दियों से दुनियाभर में मशहूर हैं, तो मोदी के गृह राज्य गुजरात का सूरत शहर ‘डायमंड नगरी’ के तौर पर आयातित हीरों की कटिंग और पॉलिशिंग से आगे बढ़कर खुद ‘लैब ग्रोन डायमंड’ का भी बड़ा केंद्र बनने की राह पर तेजी से आगे बढ़ चला है. हीरे की ये भेंट मोदी के ‘Make in India’ मिशन की कामयाबी का भी चमकदार उदाहरण है.

ये सारे उपहार, चाहे राष्ट्रपति जो बाइडेन के लिए हों, या First Lady जिल के लिए, वो भारतीय संस्कृति, कला, निरंतरता और देश की वैज्ञानिक प्रगति के भी संकेत हैं, जिसने विश्व की सबसे पुरानी जीवित सभ्यता के तौर पर भी सदियों से दुनिया का मार्गदर्शन किया है और विश्वगुरू के तौर पर एक बार फिर से स्थापित होने के लिए कुलांचे मार रहा है. जो बाइडेन भारत की बढ़ती ताकत को खुद बार- बार स्वीकार करते रहे हैं, दुनिया के सामने आने वाली बड़ी चुनौतियों, चाहे सामिरक हों या प्राकृतिक, उस पर मोदी की अगुआर्ई वाले भारत के साथ चलने के लिए बेकरार हैं.

ईट्स की संपादित किताब का चुनाव कर मोदी ने दुनिया और खासतौर पर अमेरिका को एक बड़ा संदेश देने की कोशिश की है. जिस तरह से मोदी की अगुआई में भारत के तेजी से दुनिया के मंच पर बढ़ते कदम से एक बड़ा वर्ग दुखी है, जिसमें देश के अंदर के विपक्षी नेताओं से लेकर दुनिया भर में फैले वामपंथियों- चरमपंथियों का संगठित गिरोह भी शामिल है, उनके लिए भी ये खास संदेश है. हिंदूफोबिया पैदा करने वाले उन जेहादियों, धर्मांतरण गैंग के सदस्यों के लिए भी ये तमाचा है, जो मोदी के अमेरिका दौरे से पहले ही माहौल को बिगाड़ने में लग गये थे, बाइडेन पर दबाव बनाना शुरु कर दिया था.

भारतीय संस्कृति और सनातन भाव के दीवाने थे ईट्स 

आयरलैंड में जन्मे अंग्रेजी साहित्यकार ईट्स खुद भारतीय संस्कृति और सनातन भाव के बड़े दीवाने थे. न सिर्फ उपनिषदों वाली किताब उन्होंने अंग्रेजी में अनूदित और संपादित की, बल्कि भारतीय संस्कृति के अनेक पहलुओं पर काम किया. सुपरस्टार अमिताभ बच्चन के पिता और अपने जीवनकाल में ‘मधुशाला’ सहित दर्जनों कालजयी ग्रंथों के रचयिता के तौर पर मशहूर हिंदी कवि हरिवंशराय बच्चन ने अंग्रेजी के शिक्षक के तौर पर अपनी पीएडी ईट्स पर करने से पहले जो लघु शोध निबंध इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में लिखा था, उसका शीर्षक था- ‘WB Yeats : His Mind and Art’ (ईट्स का मानस और उनकी कला).

पीएचडी करने के सिलसिले में बच्चन कैंब्रिज यूनिवर्सिटी गये थे और वहां रहते हुए ईट्स पर अपने शोध के संदर्भ में डबलिन सहित आयरलैंड के उन तमाम महत्वपूर्ण स्थानों पर गये थे, जिनका ईट्स के साथ महत्वपूर्ण रिश्ता था, उनकी पत्नी से भी मिले थे. कैंब्रिज जाकर पीएचडी करने और ईट्स के बारे में अपने विचार बच्चन ने अपनी मशहूर आत्मकथा के तीसरे खंड ‘बसेरे से दूर’ में विस्तार से लिखा है. इस पुस्तक को पढ़ने से पता चलता है कि अंग्रेजी के महान साहित्यकार ईट्स हिंदू सनातन मूल्यों और संस्कृति से कितने प्रभावित थे, जिस हिंदूत्व, इसको अपनी गोद में रखकर सदियों से सहेजने वाले हिंदुस्तान और इसके प्रतिनिधि के तौर पर मोदी के खिलाफ विरोधियों ने अभियान छेड़ रखा है.

बसेरे से दूर.

बसेरे से दूर.

ईट्स के देहांत के करीब तेरह साल बाद उन पर पीएचडी करने के लिए 1952 में कैंब्रिज यूनिवर्सिटी पहुंचे बच्चन ने अपने गाइड प्रोफेसर हेन से जो शुरुआती चर्चा की, उसके मुताबिक वो ईट्स पर भारतीय दर्शन और दंतकथा का प्रभाव विषय पर पीएचडी करना चाह रहे थे. लेकिन हेन ने उन्हें अपने अध्ययन का दायरा और विस्तृत करने के लिए कहा. आखिरकार बच्चन ने अपना शोध विषय तय किया – ‘WB Yeats and Occultism’ (ईट्स और तंत्र विद्या). चार साल अमूमन इस तरह के शोध के लिए लग जाते हैं, लेकिन ईट्स को लेकर उनकी जो लगन थी और भारतीय मूल्यों और विचारों के प्रति खुद ईट्स का जो लगाव था, उसकी खोज ने बच्चन में काफी फूर्ति भर दी और दो साल में ही बच्चन अपना शोधकार्य पूरा कर 1954 में भारत लौट आए.

ईट्स के दर्शन- चिंतन का जिक्र ‘बसेरे से दूर’ में करते हुए बच्चन लिखते हैं – “ईट्स की अभिरुचि, उनका कौतूहल, उनकी जिज्ञासा, उनका शोध- स्वाध्याय कितना विविध और कैसी- कैसी विचित्र दशाओं में था…. जिस भारत के प्रति वे आकर्षित थे, वह न तो ऐतिहासिक भारत था, न राजनीतिक, वह था श्रीमद्भागवतपुराणाकार के शब्दों में भारतमद्भुतम्, अद्भुत भारत – भारत का वह अद्भुत चाहे उसके पुरा साहित्य में मिले, चाहे उसके दर्शन में, चाहे उसकी दंत- कथाओं में, चाहे उसके अंधविश्वासों में.”

गीतांजलि.

भारत के इन सनातन मूल्यों में ईट्स की जो आस्था थी, उसी का प्रतीक है उपनिषदों पर उनकी पुस्तक भी, जो मोदी ने बाइडेन को भेंट की है. ईट्स की भारतीय मूल्यों के प्रति प्रेम की झलक विश्वकवि रवींद्रनाथ टैगोर की कालजयी कृति ‘गीतांजलि’ के साथ उनके जुड़ाव में भी सामने आई. टैगोर की 1912 की ब्रिटेन यात्रा के दौरान एक कलाकार मित्र के जरिये संपर्क में आये ईट्स ने न सिर्फ गीतांजलि का अंग्रेजी में ‘Indian Society of London’ के बैनर तले प्रकाशन करवाया, बल्कि उसकी भूमिका भी लिखी, टैगोर के अनुवाद को जरूरत के मुताबिक दुरुस्त करने का भी काम किया. गीतांजलि के इसी अग्रेजी अनुवाद वाले संस्करण को साहित्य के लिए 1913में नोबेल पुरस्कार मिला, जो यूरोप के देशों के बाहर किसी साहित्यिक रचना के लिए दिया गया प्रथम नोबेल पुरस्कार था.

टैगोर ने अपनी आत्मकथा में खुद इस घटना का जिक्र किया है. दरअसल 1907 से 1910 के बीच टैगोर ने 156 कविताएं लिखी थीं, जिनका मूल भाव समर्पण था और जो आधारित थीं उन मध्यकालीन गानों पर, जिनमें अध्यात्म और भौतिकतावाद के संघर्ष की झलक भी थी. इन्हीं कविताओं को उन्होंने गीतांजलि का नाम देते हुए काव्य संग्रह के तौर पर पाठकों के सामने परोसा.

रबींद्रनाथ टैगोर की आत्मकथा.

दरअसल 19 मार्च 1912 को उनकी तैयारी थी इंग्लैंड के लिए निकलने की, लेकिन उसके ठीक पहले की रात को उनकी तबीयत खराब हो गई और उन्हें सेहत दुरुस्त होने तक अपनी यात्रा स्थगित करनी पड़ी. बीमारी के इस काल में ही उन्होंने गीतांजलि में शामिल अपनी कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद करना शुरु कर दिया सियालदह में रहते हुए. उन्होंने अंग्रेजी में इनका अनुवाद किया, तब तक तबयीत ठीक हो गई. 27 मई 1912 को उन्होंने समुद्री जहाज से लंदन के लिए प्रस्थान किया.

लंदन पहुंचने पर उनकी मुलाकात हुई अपने पुराने मित्र और मशहूर पेंटर विलियम रोथेंस्टीन से, जो विश्वयुद्ध के दौरान की अपनी पेंटिंग्स के लिए पूरी दुनिया में मशहूर हैं. उन्होंने रोथेंस्टीन को अपनी कविताओं का अंग्रेजी अनुवाद दिखाया, जो उनको पसंद आईं और उन्होंने उनका संपर्क अपने मित्र ईट्स से करवाया. ईट्स को भारत का कालजयी अध्यात्म सबसे अधिक आकर्षित करता था, जिसकी वजह से उनकी निगाह जब गीतांजलि के अंग्रेजी अनुवाद पर पड़ी, तो वो इसे पढ़कर उछल गये. भारत के जिस दर्शन में उनकी गहरी रुचि थी, उसी का भाव इन कविताओं में दिख रहा था. टैगोर को खुद के किये हुए गीतांजलि में शामिल कविताओं के अंग्रेजी अनुवाद की सटीकता और कलात्मकता को लेकर थोड़ा संशय था, लेकिन ईट्स ने उनका भरपूर मनोबल बढ़ाया और अनुवाद को अपने बाकी साहित्यिक मित्रों के साथ साझा किया. सबको इन कविताओं की कलात्मकता पसंद आई.

ईट्स ने खुद बांग्ला से अनुवाद हुई टैगोर की कविताओं में से एक सौ तीन को छांटकर उनका प्रकाशन करवाने की ठानी और खुद इस काव्य संग्रह की प्रस्तावना भी लिखी. लंदन में ईट्स के बाकी साथियों की भी इसमें मदद मिली और इंडियन सोसायटी ऑफ लंदन के जरिये इस काव्य संग्रह का प्रकाशन किया गया, ‘Gitanjali (Song Offerings)’ के तौर पर. टैगोर तो इसके बाद अमेरिका चले गये, जहां उनके पुत्र कृषि विज्ञान में स्नातक की पढ़ाई कर रहे थे. अपनी पहली अमेरिकी यात्रा के बाद अपैल 1913 में टैगोर वापस इंग्लैंड लौटे और वहां से सितंबर 1913 में भारत के लिए प्रस्थान किया. 14 नवंबर 1913 को टैगोर को ये खबर मिली कि गीतांजलि के अंग्रेजी अनुवाद के लिए उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला है.

पराधीन भारत में किसी भारतीय को साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार मिलना, देशवासियों के लिए खुशी का मौका था, मनोबल बढ़ाने वाला था, भारत का गौरव उंचा करने वाला था. ईट्स की टैगोर को ये सम्मान हासिल होने में बड़ी भूमिका थी. उसी ईट्स रचित उपनिषद वाली पुस्तक अमेरिकी राष्ट्रपति को भेंट कर मोदी ने करीब एक सौ दस साल पहले के उस भारतीय संपर्क की याद भी देश और दुनिया को दिलाने की कोशिश की है, जो ईट्स के साथ जुड़ी है, और जिनके साहित्य के चाहक रहे हैं बाइडन, वो भी उस दौर में जब दुनिया भारत को एक बार फिर सम्मान की नजरों से देख रही है और देशवासी उसे विश्वगुरू बनने की राह पर जाते हुए.

Source link

Jagran Times
Author: Jagran Times

Leave a Comment

Read More