फादर्स डे पर पढ़ें निदा फ़ाज़ली की अपने पिता पर मशहूर नज़्म- ‘वालिद की वफ़ात पर’

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Father Day Shayari: पिता के साये में हम खुद को मजबूत महसूस करते हैं. पिता के रहते हुए भले ही हमें उनकी अहमियत ना महसूस होती हो, लेकिन जैसे ही हम पिता के साये से दूर होते हैं, तो दुनियादारी का पता चलता है. मशहूर शायर और गीतकार निदा फ़ाज़ली साहब ने अपने वालिद के इंतकाल पर बड़ी ही मार्मिक नज़्म लिखी है. वे कहते हैं उनके वालिद कभी भी उनसे जुदा नहीं हो सकते. वे तो लहू बनकर उनकी रगों में बह रहे हैं. फादर्स डे पर पढ़ें उनकी यह मशहूर नज्म-

वालिद की वफ़ात पर

तुम्हारी क़ब्र पर
मैं फातिहा पढ़ने नहीं आया
मुझे मालूम था
तुम मर नहीं सकते
तुम्हारी मौत की सच्ची ख़बर जिस ने उड़ाई थी
वो झूटा था

वो तुम कब थे
कोई सूखा हुआ पत्ता हवा से मिल के टूटा था

मिरी आंखें
तुम्हारे मंजरों में क़ैद हैं अब तक
मैं जो भी देखता हूं
सोचता हूं
वो वही है
जो तुम्हारी नेक-नामी और बद-नामी की दुनिया थी
कहीं कुछ भी नहीं बदला

तुम्हारे हाथ मेरी उंगलियों में सांस लेते हैं
मैं लिखने के लिए
जब भी क़लम कागज़ उठाता हूं
तुम्हें बैठा हुआ मैं अपनी ही कुर्सी में पाता हूं

बदन में मेरे जितना भी लहू है
वो तुम्हारी
लग़्जिशों नाकामियों के साथ बहता है

मिरी आवाज़ में छुप कर
तुम्हारा ज़ेहन रहता है
मिरी बीमारियों में तुम
मिरी लाचारियों में तुम

तुम्हारी क़ब्र पर जिस ने तुम्हारा नाम लिखा है
वो झूटा है

तुम्हारी क़ब्र में मैं दफ़्न हूं
तुम मुझ में ज़िंदा हो
कभी फ़ुर्सत मिले तो फ़ातिहा पढ़ने चले आना।
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Tags: Hindi Literature, Hindi poetry, Hindi Writer, Literature

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Up Head Line
Author: Up Head Line

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