प्रेमचंद की कहानी ‘नादान दोस्त’ का नाट्य रूपांतरण


हिंदी नाटक: प्रेमचंद की कहानियों में कथावस्तु, पात्र, भाषा और संवाद, ये सभी विशेषताएं देखने को मिलती हैं. उनकी हर कहानी नाटक के सभी तत्वों को अपने अंदर समेटे हुए हैं. प्रसिद्ध लेखिका रिंकल शर्मा ने प्रेमचंद की कहानियों का नाट्य रूपांतरण करने की पहल की है. इस पहल का नतीजा ‘प्रेमचंद मंच पर’ के रूप में हमारे सामने है. रिंकल कहती हैं- प्रेमचंद की कहानियां रंगमंच या मानव मस्तिष्क हो, सभी जगह अपनी-अपनी एक खास छाप छोड़ती हैं.

‘प्रेमचंद मंच पर’ संकलन में रिंकल शर्मा ने मुंशी प्रेमचंद की चार कहानियों ‘पंच-परमेश्वर’, ‘नादान दोस्त’, ‘गुल्ली-डंडा’ और ‘कज़ाकी’ का नाट्य रूपांतरण किया गया है. ‘प्रेमचंद मंच पर’ का प्रकाशन प्रभाकर प्रकाशन ने किया है. प्रेमचंद जयंती पर प्रस्तुत है इसी संकलन से एक कहानी ‘नादान दोस्त’ का नाट्य रूपांतरण-

पात्र – परिचय
केशव : (उम्र 11 साल)
श्यामा : केशव की बहन (उम्र 8 साल)
अम्मा : केशव की माँ (उम्र 25-28 साल)
बाबूजी : केशव के पिता (28- 32 साल)
बगलू : नौकर (उम्र 20-22 साल)

दृश्य – एक

[मंच पर पर्दा उठता है. मंच पर बाईं तरफ एक सोफा लगा है जिस पर अम्मा जी बैठी मटर छील रही हैं. बीच में मंच खाली है. मंच के दाईं ओर एक पेड़ की आकृति लगी है. मंच के बीच में दो बच्चे, केशव (एक लड़का, कमीज और निक्कर पहने) और श्यामा (एक लड़की, फ्रॉक पहने) पकड़म- पकड़ाई खेल रहे हैं.]

श्यामा – भैया! दम है, तो मुझे पकड़कर कर दिखाओ.
केशव – तुझे पकड़ना तो मेरे बायें हाथ का खेल है. अभी रुक.

[श्यामा आगे –आगे भाग रही है और केशव उसके पीछे-पीछे. दोनों मंच के बीच में इधर-उधर भाग रहे हैं.]
श्यामा – भैया! आज, मुझे नहीं पकड़ पाओगे.
केशव – (हांफते हुए) अच्छा ये बात है तो अब देख.
[केशव उसकी चोटी पकड़कर खींचता है.]
श्यामा – (दर्द से) आह! भैया मेरी चोटी छोड़ो, दुखता है.
केशव – (हंसकर) पकड़ लिया न.
श्यामा – (चोटी छुड़ाते हुए) चोटी छोड़ो मेरी, अम्मा! अम्मा!
[अम्मा शब्द सुनते ही केशव डर के मारे चोटी छोड़ देता है.]
श्यामा – (हंसकर इधर-उधर भागते हुए) उल्लू बनाया, बड़ा मज़ा आया!
केशव – झूठी, अम्मा को बुलाने की धमकी देती है. अब नहीं छोडूंगा.
[दोनों फिर भागते हैं और इस बार फिर केशव, श्यामा की चोटी पकड़ लेता है.]

श्यामा – (दर्द में) भैया, छोड़ो आह! चोटी छोड़ो!
केशव – (चिढ़ाकर) अब बुला अम्मा को.
श्यामा – (चिल्लाकर) बुलाऊंगी, अम्मा! अम्मा!
[केशव फिर से डरकर उसकी चोटी छोड़ देता है और श्यामा सीधे मां के पास जाती है जो, सोफे पर बैठी मटर छील रही हैं.]

श्यामा – (रुआंसे स्वर में) अम्मा जी! देखो न, भैया ने मेरी चोटी खींची.
अम्मा – (रोबदार आवाज में) केशव! तूने श्यामा की चोटी खींची?
केशव – (घबराकर) नहीं अम्मा जी! ये झूठ बोल रही है.
श्यामा – (खीजकर) अम्मा जी! भैया झूठ बोल रहे हैं.
केशव – (गुस्से से) तू झूठी!
श्यामा – (मुंह चिढ़ाकर) आप झूठे
केशव – तू
श्यामा – आप, आप, आप झूठे.

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अम्मा – (झल्लाकर) बस करो तुम दोनों. सारा दिन धमा-चौकड़ी मचाए रहते हो. आने दो तुम्हारे बाबूजी को. वही ख़बर लेंगे तुम्हारी.
[तभी बाबूजी (पेंट-शर्ट पहने, आंखों पर चश्मा और हाथ में एक बैग लिए हुए) का प्रवेश]
बाबूजी – अरे! क्या हुआ? क्यूं इतना शोर मचा रक्खा है?

[बाबूजी अपना बैग एक तरफ रखकर, कुर्सी पर बैठ जाते हैं.]
श्यामा – बाबूजी! देखो ना, भैया मेरी चोटी खींच रहे थे. मुझे कितना दर्द हुआ.
बाबूजी – (केशव की ओर गुस्से से देखते हुए) केशव!
केशव – नहीं बाबूजी! श्यामा झूठ बोल रही है. वो तो बस पकड़म-पकड़ाई खेलते समय गलती से इसकी चोटी मेरे हाथ में आ गई थी.
श्यामा – बाबूजी, भैया झूठ बोल रहे हैं. भला कोई चोटी पकड़कर भी खींचता है?
बाबूजी – ओफ्फो! झगड़ना बंद भी करो. देखो मैं तुम दोनों के लिए मिठाई लाया हूं. लेकिन तभी मिलेगी, जब तुम दोनों आपस में सुलह कर लोगे.
श्यामा, केशव – (ख़ुशी से तालियां बजाते हुए) मिठाई!

[तभी चिड़िया की आवाज सुनाई देती है]

बाबूजी – ये चिड़िया की आवाज कैसी ?
अम्मा – बाहर से आ रही होगी. कार्निस पर सारा दिन चिड़िया अपना डेरा जमाये रहती है.
बाबूजी – लगता है अंडे दे दिए होंगे. चलो, तुम मेरे लिए एक कप चाय बना दो. मैं जरा हाथ-मुंह धो लेता हूं.

[बाबूजी का प्रस्थान]

केशव – अम्मा जी! क्या सचमुच चिड़िया ने कार्निस पर अंडे दिए हैं?
अम्मा – पता नहीं, कल दिखवाती हूं. चलो तुम दोनों अब पढाई करो. मैं बाबूजी को चाय देकर आती हूं.

[अम्मा चाय बनाने चली जाती हैं]

श्यामा – भैया! वो चिड़िया ने अंडे…
केशव – तू चुप कर! अम्मा जी से मेरी झूठी शिकायत करती है. अब देख तू.

[केशव श्यामा को मारने के लिए भागता है और श्यामा अपनेआप को बचाने के लिए भागती है]
श्यामा – बचाओ! अम्माजी! अम्मा जी!
केशव – (गुस्से से)आज तो तुझे छोडूंगा नहीं.
श्यामा – (दोनों हाथ जोड़कर) अच्छा भैया! माफ कर दो.
केशव – क्यूं माफ कर दूं? तू मुझे अम्मा जी से डांट खिलवाती है.
श्यामा – देखो भैया, अगर हम झगड़ा करेंगे तो बाबूजी जो मिठाई लाए हैं ना, अम्मा वो न देवेंगी फिर हमको. सोच लो.
केशव – (मिठाई का सोचकर) हां सो तो है. चल आज तो तुझे छोड़ दिया.
श्यामा – (शरारती हंसी हंसकर) छोड़ोगे तो तब न भैया, जब पकड़ पाओगे.
[कहकर श्यामा फिर भागती है और केशव उसके पीछे भागता है]

केशव – (हांफते हुए) श्यामा! आज तुझे पकड़कर ही दम लूंगा.
श्यामा – तुम्हारे बस का नहीं भैया…पकड़ो तो जानू.

[मंच पर अंधेरा हो जाता है और अंधेरे में बच्चों के स्वर सुनाई देते हैं]

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दृश्य – दो

[मंच पर धीरे-धीरे रोशनी होती है. सुबह का समय है. बाबूजी काम पर जाने को तैयार हैं. अम्मा, बाबूजी का बैग देते हुए नौकर को आवाज देती हैं.]

अम्मा – बगलू! ओ बगलू

[नौकर अन्दर आता है]

नौकर – आपने बुलाया अम्मा जी.
अम्मा – बगलू जरा बाहर कार्निस पर चढ़कर देख तो, क्या माज़रा है? सारा दिन वहां चिड़ियों का जमघट लगा रहता है.
बगलू – जी अम्माजी, अभी देखता हूं.

[नौकर चला जाता है ]

[ केशव और श्यामा स्कूल की ड्रेस पहने हुए आते हैं. दोनों ने अपना-अपना बस्ता लिया हुआ है. श्यामा के हाथ में एक कंघी भी है.]

केशव – अम्मा जी! मेरे बाल बना दो.
श्यामा – अम्मा जी! पहले मेरी चोटी बनाओ.
केशव – अम्मा जी, मेरे बाल छोटे हैं, जल्दी बन जाएंगे.
श्यामा – अम्मा जी, कंघी तो मैं लेकर आई हूं न.
अम्मा – (चिढ़कर) ओह्हो तुम दोनों, फिर झगड़ना शुरू हो गए .केशव तुम इधर आओ.

[केशव अम्मा के पास आता है. अम्मा केशव के बाल बनाती हैं]

बाबूजी – केशव की मां, मैं चलता हूं, मुझे देर रही है.
[बाबूजी का प्रस्थान]

[अम्मा जी अब केशव को हटाकर श्यामा की चोटी बांधने लगती हैं, तभी नौकर बगलू आता है]
बगलू – अम्मा जी! वहां कार्निस पर चिढ़ा और चिड़िया ने अपना घोंसला बना लिया है.
अम्मा – अच्छा ! फिर तो लम्बे समय तक यहीं ढेरा डालेंगे.
बगलू – तो हटा दूं क्या?
अम्मा – क्या?
बगलू – घोंसला और क्या.
अम्मा – अरे नहीं रे, भला किसी का घोंसला भी कोई तोड़ता है? रहने दे अब. जैसी प्रभु इच्छा. चल तू जा बाहर जाकर आंगन साफ़ कर दे.
बगलू – जी अम्मा जी.
[बगलू चला जाता है]
श्यामा – अम्मा जी, चिड़िया का घोंसला कैसा होता है?
केशव – अम्मा जी घोंसले में चिड़िया अंडे कैसे देगी?
श्यामा – अंडे किस रंग के और कितने होंगे?
केशव – अंडे में से फिर बच्चे कैसे निकलेंगे?
श्यामा – क्या बच्चे अंडे से निकालकर फुर्र से उड़ जायेंगे?

केशव – नहीं री पगली, पहले तो पर निकलेंगे, बगैर परों के बेचारे कैसे उड़ेंगे?
श्यामा – बच्चे क्या खायेंगे? चिड़िया बेचारी उन्हें क्या खिलाएगी, बताओ न अम्मा जी.
केशव – बताओ न अम्मा जी.
अम्मा – ओफ्फो तू दोनों के इतने सारे सवालों के जवाब देना शुरू करुंगी तो पूरा दिन यहीं हो जाएगा.
केशव – तो अम्मा जी कब बताओगी?
अम्मा – स्कूल से आ जाओगे तब. चलो अब जाओ वरना देर हो जाएगी.
श्यामा – पक्का शाम को बताओगी?
अम्मा – हां, पक्का.

[दोनों बच्चे चले आते हैं और अम्मा थककर बैठ जाती हैं]
अम्मा – उफ़! ये चिड़िया और उसका घोंसला. ये बच्चे भी न.
[मंच पर धीरे-धेरे रोशनी कम हो जाती है.]

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दृश्य – तीन

[मंच पर धीरे-धीरे रोशनी आती है. श्यामा और केशव स्कूल से आ रहे हैं. वो घर के बाहर कार्निस की ओर देख रहे हैं]

केशव – श्यामा अब तो तीन-चार दिन हो गए. अब जरूर चिड़िया ने अंडे दे दिए होंगे.
श्यामा – हां भैया मुझे भी ऐसा ही लगता है.
केशव – हो सकता है अंडे में से बच्चे भी निकल आए हों!
श्यामा – हां भैया हो मुझे भी ऐसा ही लगता है.
केशव – (श्यामा की तरफ बड़ी आंखों से देखते हुए) तुझे खुद भी कुछ लगता है या जो मैं कह रहा हूं, सब वैसा ही लगता है.
श्यामा – अरे गुस्सा क्यूं होते हो? जो लग रहा है वही तो कह रही हूं.
केशव – अच्छा ठीक है ठीक है.
श्यामा – भैया अगर बच्चे अंडों से निकल आए होंगे तो बेचारों को भूख भी लगाती होगी.

केशव – वो तो लगेगी ही. हर जीव को भूख लगती है.
श्यामा – (दुखी होकर) लेकिन भैया बेचारी चिड़िया अकेली इतना दाना कहां से ला पाती होगी कि अपना और बच्चों का पेट भर सके.
केशव – हम्म (सोचते हुए) बात तो सही है, चिड़िया अकेली इतना दाना कैसे ला सकती है?
श्यामा – भैया! बेचारे बच्चे भूख से चूं-चूं करते होंगे न?
केशव – हां श्यामा, बेचारे बच्चे भूखे होंगे. अब हमको ही कुछ करना होगा.
श्यामा – लेकिन क्या भैया?
केशव – हमें कार्निस पर बच्चों और चिड़िया के लिए दाना रखना होगा.
श्यामा – मगर कैसे भैया?
केशव – वो सोचना होगा. लेकिन दाने का इंतजाम तो करना ही होगा.
श्यामा – (खुश होते हुए) फिर तो चिड़िया को चारे के लिए कहीं उड़कर न जाना पड़ेगा न?
केशव – नहीं, तब क्यों जाएगी?
श्यामा – (कुछ सोचते हुए) क्यों भैया, क्या कार्निस पर बच्चों को धूप न लगती होगी?
केशव – (चौंककर) हां, इस तरफ तो मेरा ध्यान गया ही नहीं. ऊपर तो छाया भी नहीं.
श्यामा – और पानी भी नहीं, बेचारे प्यास से तड़फ रहे होंगे.
केशव – तू ठीक कहती है श्यामा. अब हमकों ही दाने-पानी और छांव का इंतज़ाम करना होगा.
श्यामा – लेकिन कब और कैसे?
केशव – आज दोपहर का जब अम्मा जी सो जाएंगी तब.
श्यामा – तो तय रहा.

[मंच पर रोशनी धीरे-धीरे कम हो जाती है]

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दृश्य – चार

[मंच पर अम्मा जी बैठी एक थापल में चावल साफ कर रही हैं.]

अम्मा – दोपहर चढ़ आई है और ये बगलू अभी तक बाजार से नहीं आया. (सोचते हुए) ऐसा तो नहीं आ गया हो और मुझे ही न पता चला हो. आवाज देकर देखती हूं. बगलू! ओ बगलू !

[बगलू अन्दर आता है]

बगलू – जी अम्मा जी.
अम्मा – कहां चला गया था? कितना काम पड़ा है घर में.
बगलू – तरकारी लेने, आपने ही ने तो भेजा था.
अम्मा – ले आया?
बगलू – कब का, रसोईघर में रख भी दी.
अम्मा – अच्छा ठीक है. अब जा जाकर थोड़ा आराम कर ले. शाम को मत सुस्ताना काम के वक्त.
बगलू – जी अम्मा जी

[बगलू चला जाता है. तभी केशव और श्यामा आते हैं]

केशव – अम्मा जी, आज आप आराम नहीं करेंगी?
श्यामा – हां, अम्मा जी आप कितना थक जाती होंगी ना, घर के काम करते-करते.
अम्मा – अरे वाह ! आज तुम दोनों को मेरी बड़ी चिंता हो रही है? कुछ चाहिए क्या?
केशव – नहीं अम्मा जी, हम तो बस ऐसे ही कह रहे थे.
श्यामा – (केशव की हां में हां मिलाते हुए) हां अम्मा जी, हम तो बस यूं कह रहे थे.
[केशव और श्याम एक-दूसरे को देखते हैं और इशारा करते हैं कि अब क्या किया जाए.]
केशव – अम्मा जी, आपने रसोई में देखा?
अम्मा – क्या?
केशव – रसोईघर में बगलू ने सब्जियां ऐसे ही रख दी हैं. वहां एक बड़ा सा चूहा घूम रहा है.
श्यामा – हां अम्मा जी, बहुत मोटा चूहा है.
अम्मा – (उठते हुए) हाय राम! सत्यानाश हो उस चूहे का. मैं देखती हूं कहीं सब्जी ना कुतर जाए.

[अम्मा जी उठकर अन्दर की तरफ रसोईघर के लिए चली जाती हैं]

केशव – शुक्र है, अम्मा जी गईं तो.
श्यामा – अब क्या करें भैया?
केशव – श्यामा तू जा और रसोईघर में से, मटके से चावल ले आ.
श्यामा – लेकिन वहां तो अम्मा जी हैं, कैसे लाऊं?
केशव – वो तू देख, कैसे लाएगी, चिड़ियों को दाना डालना है ना?
श्यामा – ठीक है लाती हूं.

[श्यामा रसोईघर की तरफ चली जाती है]

केशव – चावल तो श्यामा ले आएगी, लेकिन पानी का भी तो इंतज़ाम करना होगा. क्या करूं? हां, एक काम करता हूं, एक प्याली में पानी ले आता हूं.
[केशव चला जाता है. श्यामा एक कटोरी में चावल लिए आती है]

श्यामा – भैया.. भैया, कहां चले गए?

[केशव आता है. उसके हाथ में एक प्याली है जिसमें पानी भरा है]

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श्यामा – भैया कहां चले गए थे?
केशव – मैं पानी लेने गया था, ये देख!
श्यामा – ये प्याली कहां से मिली?
केशव – वो अम्मा जी ने गुसलखाने में रखी थी ना, जिसमें तेल भरा हुआ था, वही है.
श्यामा – लेकिन तेल कहां गया?
केशव – वो तो मैंने जमीन पर गिरा दिया. देख कैसे प्याली चमका कर, पानी भरकर लाया हूं.
श्यामा – (प्याली को देखते हुए) वाह भैया!
केशव – अब देख, दाने और पानी का इंतज़ाम तो गया. अब चांदनी के लिए कपड़ा कहां से लाएं?
श्यामा – भैया अगर कपड़ा मिल भी गया तो, ऊपर बगैर छड़ियों के कपड़ा ठहरेगा कैसे? छड़ियां कैसे खड़ी होंगी?
केशव – वही तो सोच रहा हूं.

[दोनों इधर से उधर घूमते हुए सोचते हैं]

केशव – श्यामा मिल गया तरीका. तू जाकर कूड़ा फैंकने वाली टोकरी उठा ला. अम्मा जी को मत दिखाना.
श्यामा – पर वो तो बीच में से फटी हुई है. उसमें से धूप न जाएगी?
केशव – तू टोकरी तो ला, मैं उसका सुराख बंद करने की कोई तरकीब निकालूंगा.
श्यामा – जाती हूं, गुस्सा क्यूं करते हो.

[श्यामा टोकरी लेने चली जाती है]

केशव – श्यामा जब तक टोकरी लाती है, तब तक मैं कागज लेकर आता हूं.
[केशव कागज लाने जाता चला जाता है.] [श्यामा टोकरी लिए आती है]

श्यामा – (हांफते हुए) भैया .. भैया लो फिर चले गए. मेरे जाते ही पता नहीं कहां चले जाते हैं?

[केशव कागज लेकर आता है]
श्यामा – भैया मुझे काम पर लगाकर खुद कहां चले जाते हो?
केशव – कपड़ा तो मिला नहीं, ये कागज लेकर आया हूं.
श्यामा – कागज का क्या करोगे?
केशव – अभी बताता हूं.
[केशव टोकरी के छेदों में कागज़ ठूंस-ठूंस कर भरता है और उसे थोड़ा आड़ा करके श्यामा की दिखाता है.]

केशव – देख! ऐसे ही घोंसले पर उसकी आड़ में रख दूंगा. फिर कैसे धूप जाएगी?
श्यामा – वाह! भैया आप तो बहुत चालाक हो.
केशव – अब चल, ये टोकरी रख आयें.
श्यामा – हाँ भैया जल्दी चलो, अगर अम्मा जी आ गयी तो शामत आ जाएगी.
केशव – हाँ ठीक, चल जल्दी चल

[तभी अन्दर से अम्मा की आवाज़ आती है ]

आवाज़ – केशव, श्यामा, इधर आओ.

केशव – अम्मा जी बुला रही हैं, चल अन्दर.
श्यामा – लेकिन इसका क्या करें?
केशव – इनको कहीं छुपा देते हैं, कहीं अम्मा जी ने देख लिया तो मार पड़ेगी.
श्याम – ठीक है चलो छुपा देते हैं.
[दोनों बच्चे मंच के बाईं ओर जाते हैं और मंच पर प्रकाश धीरे-धीरे कम हो जाता है]

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दृश्य – पांच

[ मंच पर धीरे-धीरे प्रकाश आता है. अम्मा जी कपडे तय कर रही हैं.]

अम्मा जी – दोपहर चढ़ आई है. घर के काम तो जैसे खत्म होने का नाम ही नहीं लेते. सारा काम करते-करते कमर दुखने लगी है. बगलू ओ बगलू.

[बगलू आता है]

बगलू – आपने बुलाया अम्मा जी!
अम्मा – हां देख बच्चे खा-पीकर सो गए हैं. तेरे साहब को दफ़्तर से आने में तो बहुत देर है. मैं भी जरा कमर सीधी कर लूं. तू सोना मत, इधर ध्यान रखना. समझे.
बगालू – जी अम्मा जी!

[अम्मा जी चली जाती हैं]

बगलू – अम्मा जी और बच्चे तो सोने चले गए. मैं भी तो सारा दिन काम करता हूं. फिर भला मैं क्यूं न आराम करू? मैं भी एक नींद ले लेता हूं. अम्मा जी के जागने से पहले ही उठ जाऊंगा.

[बगलू भी चला जाता है. केशव और श्यामा आते हैं]

श्यामा – भैया चुपचाप चलो. अम्मा जी ने सुन लिया तो जाग जाएंगी, फिर मार पड़ेगी.
केशव – हां पता है. इसीलिए तो मैंने बड़े हौले से दरवाजे की सिटकनी खोली थी.
श्यामा – अब क्या करना है भैया?
केशव – तू यहीं रुक. मैं अन्दर कमरे से स्टूल लेकर आता हूं.
[केशव स्टूल लेने चला जाता है]

श्यामा – आज तो मैं भी ऊपर चढ़कर देखूंगी कि चिड़ियां के बच्चे कैसे हैं?

[केशव हाथ में एक स्टूल लेकर आता है]

केशव – चल श्यामा, कार्निस के पास चल.
[मंच के दाहिनी ओर केशव स्टूल लगता है. मंच पर सिर्फ एक स्पॉट लाइट आ रही है. जो बच्चों पर पड़ रही है]

केशव – श्यामा इससे तो काम न चलेगा. कुछ और करना होगा.
श्यामा – क्या भैया?
केशव – (थोड़ा सोचकर) ऐसा कर तू गुसलखाने से, नहाने वाली चौकी ले आ.
श्यामा – अभी लाई भैया.

[श्यामा दौड़कर चली जाती है]

केशव – चौकी के ऊपर अगर स्टूल रखूंगा, तो आसानी से पहुंच जाऊंगा. ये श्यामा भी ना कितनी देर करती है.

[श्यामा हाथ में चौकी लिए आती है]
श्यामा – (हांफते हुए) ये लो भैया. बड़ी भारी चौकी है.
केशव – अम्मा जी तो नहीं जागी न?
श्यामा – नहीं भैया, मैं बड़ी ही होशियारी से लाई हूं.
केशव – शाबाश! अब देख मैं चौकी के ऊपर स्टूल को रखता हूं, फिर चढूंगा, ठीक से पकड़ना.
श्यामा – ठीक है भैया.
[केशव पहले चौकी रखता है फिर उसके ऊपर स्टूल रखता है. फिर धीरे से उस पर चढ़ता है. श्यामा नीचे स्टूल को पकडे़ खड़ी है. स्पॉट लाइट सिर्फ श्याम और केशव के कमर और पैरों पर पड़ रही है. केशव का चेहरा नहीं दिखाई दे रहा है.]

केशव – श्यामा स्टूल को अच्छे से पकड़, गीर गया तो मेरे हाथ-पांव टूट जाएंगे.
श्यामा – पकड़ तो रही हूं भैया.
केशव – अच्छी तरह से पकड़, वरना उतारकर बहुत मारूंगा.
श्यामा – पकड़ा तो है.

[श्यामा का ध्यान ऊपर की ओर है. तभी चिड़िया के पंख फड़-फड़ाने की आवाज आती है]
श्यामा – क्या हुआ भैया?
केशव – कुछ नहीं! मेरे कार्निस पर हाथ रखते ही, दोनों चिड़ियां उड़ गई.
श्याम – ऊपर क्या है भैया?
केशव – यहाँ पर कुछ घास के तिनके पड़े हैं ये वैसा घोंसला नहीं है श्यामा, जैसा पेड़ों पर होता है.
श्यामा – अच्छा! बच्चे कितने हैं भैया?
केशव – तीन अंडे हैं बस, बच्चे अभी नहीं निकले.
श्यामा – ज़रा हमें भी दिखा दो भैया, कितने बड़े हैं?
केशव – दिखा दुंगा, पहले जरा चिथड़े ले आ, नीचे बिछा दूँ. बेचारे अंडे तिनकों पर पड़े हैं.
श्यामा – अभी लाई, तुम संभलकर खड़े रहना.

[श्यामा चीथड़े लेने चली जाती है.]
केशव – अरे मुझे ऊपर ही टंगा छोड़ गई अगर मैं गिर गया तो.
[श्यामा हाथ में कपडे़ के कुछ कतरन लेकर आती है]

श्यामा – (ऊपर की ओर हाथ उठाकर) ये लो भैया.
केशव – (हाथ से लेते हुए) ला. देख मैं इन कपड़ों को इकठ्ठा करके एक गद्दी की तरह बना रहा हूं.
श्यामा – वो क्यों?
केशव – गद्दी पर अंडे अच्छे से रखे रहेंगे.
श्यामा – (रुआंसे स्वर में) हमें भी तो दिखाओ भैया.
केशव – दिखा दूंगा, पहले वो टोकरी तो लाकर दे, ऊपर छाया कर दूं.
[श्यामा दौड़कर जाती है, फिर हाथ में टोकरी लेकर आती है]
श्यामा – (हांफते हुए) ये ..ये लो भैया. अब तुम नीचे उतर आओ, मैं भी तो देखूं.
केशव – देख लेना. पहले जा, दाना और पानी की प्याली तो ले आ,मैं उतर आऊं तो दिखा दूंगा.

[ श्यामा फिर भागकर जाती है और प्याली और चावल लाती है. केशव को नीचे से दोनों चीजें देती है]
श्यामा – (जोर से हांफते हुए) भ..भ…भैया..लो..

[केशव दाना-पानी रखकर, धीरे से नीचे उतरता है]

श्यामा – अब हमको भी चढ़ा दो भैया.
केशव – तू गिर पड़ेगी.
श्यामा – न गिरूंगी भैया, तुम नीचे से पकड़े रहना.
केशव – न तू गिर जाएगी. कहीं तू गिर-गिरा पड़ी तो, अम्मा जी मेरी चटनी ही कर डालेंगी. कहेंगी कि तूने ही चढ़ाया था. क्या करेगी देखकर? अब अंडे बड़े आराम से हैं, जब बच्चे निकलेंगे, तो उनको पालेंगे.
श्यामा – भैया, सारी भागदौड़ मुझसे कराई और अब दिखाते भी नहीं.
[तभी चिड़ियों की आवाज़ होती है ]

केशव – देख चिड़ियां आ गईं.

[चिड़ियां के पंखों की आवाज़ फिर होती है]
श्यामा – पर चिड़ियां अपने घोंसले पर बैठ क्यूं नहीं रहीं?
केशव – लगता है हम दोनों से डर रही हैं. चल स्टूल उठाकर रख आते हैं.
श्यामा – मैं नहीं जाऊंगी, तुम ही रखो.

[केशव एक बार स्टूल लेकर जाता है. फिर दोबारा चौकी लेकर जाता है]

श्यामा – (उचकते हुए) अब कैसे देखूंगी? अब तो स्टूल भी हटा दिया. खुद तो देख लिया, मुझे न दिखाया.

[केशव आता है]

केशव – क्या बोल रही है?
श्यामा – (रोते हुए) तुमने मुझे नहीं दिखाया, मैं अम्मा जी से कह दूंगी.
केशव – अम्मा जी से कहेगी, तो बहुत मारूंगा कहे देता हूं.
श्यामा – तो तुमने मुझे दिखाया क्यूं नहीं?
केशव – तू कहीं गिर जाती तो चार सर न हो जाते.

श्याम – हो जाते, तो हो जाते. देख लेना, मैं तो कह दूंगी.
केशव – तू कहकर देख, फिर बताता हूं.

[तभी अम्मा जी आ जाती हैं.]

अम्मा – तुम दोनों बाहर कब निकल आये? मैंने कहा था न कि दोपहर को न निकलना.
किसने किवाड़ खोला?
केशव – अम्मा जी वो..वो
अम्मा – (श्यामा से) तू बता.
श्यामा – वो…वो
अम्मा – अब दोनों की जुबान नहीं खुलेगी. चलो चुपचाप अन्दर चलो. दोपहर के दो बजे, इतनी गर्मी में भी धमाचौकड़ी मचाने पर तुले हैं. देखते नहीं कि बाहर लू चल रही है. चलो अन्दर.
[दोनों बच्चे अम्मा जी के साथ अन्दर चले जाते हैं. मंच पर प्रकाश कम हो जाता है]

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दृश्य – छह

[मंच पर धीरे-धीरे प्रकाश आता है. अन्दर से श्यामा अपनी आंखें मलते हुए आ रही है.]

श्यामा – (जम्हाई लेते हुए) हम्म! भैया ने अंडे दिखाए नहीं. क्यूं न एक बार खुद ही जाकर देख लूं.
[श्यामा मंच के दाहिनी ओर जाती है. वहां जमीन पर तीन अंडे फूटे हुए पड़े हैं.]

श्यामा – (ऊपर देखकर) अरे टोकरी कहां गई? (फिर नीचे देखकर) ये अंडे तो नीचे पड़े हैं. भैया को बुलाती हूं.

[दौड़कर मंच के बाईं ओर आती है]
श्यामा – भैया.. भैया अंडे तो नीचे पड़े हैं, बच्चे उड़ गए.
[श्यामा की आवाज सुनकर केशव बाहर आता है]

केशव – (ऊंघते हुए) क्यूं चिल्ला रही है?
श्यामा – भैया, तीनों अंडे नीचे टूटे हुए पड़े हैं. उनमें से कुछ चूने जैसी चीज़ बाहर आ रही है. पानी की प्याली भी एक तरफ टूटी पड़ी है.

[श्यामा की बात सुनकर, केशव घबराकर अंडों को देखने जाता है. दोनों मंच के दाहिनी ओर जाकर अंडों को देखते हैं]

श्यामा – बच्चे कहां उड़ गए भैया?
केशव – (रुआंसे स्वर में) अंडे तो फूट गए श्यामा.
श्यामा – (मासूमियत से) और बच्चे कहां गए भैया?
केशव – (झल्लाकर) तेरे सर में. देखती नहीं है, अंडों से उजला-उजला पानी निकल आया है. वही दो-चार दिन में बच्चे बन जाते.
श्यामा – अब क्या होगा भैया?
केशव – पता नहीं.

[तभी अम्मा जी हाथ में सोटा (डंडा) लिए आती हैं]

अम्मा – तुम दोनों वहां धूप में क्या कर रहे हो?
श्यामा – (घबराकर) अम्मा जी! चिड़िया के अंडे टूटे हुए पड़े हैं.
[अम्मा जी आगे आकर अंडों को देखती हैं]
अम्मा – (गुस्से से) तुम लोगों ने अंडों को छूआ होगा?
[श्यामा, अम्मा की बात सुनकर घबरा जाती है]
श्यामा – (डरते हुए) अम्मा जी, भैया ने अंडों को छेड़ा था.
(केशव, श्यामा को गुस्से से देखता है)

अम्मा – (डांटते हुए) क्यूं रे! ये सच है?
केशव – (डरकर) वो अम्मा जी वो.
अम्मा – तू वहां पहुंचा कैसे?
श्यामा – चौके पर स्टूल रखकर चढ़े, अम्मा जी
केशव – (चिढ़कर) अच्छा सारा इल्जाम मुझ पर. तू स्टूल थामे नहीं खड़ी थी?
श्यामा – (जोर से) तो तुम्हीं ने तो कहा था.
अम्मा – (केशव को डांटते हुए) तू इतना बड़ा हुआ, तुझे अभी इतना भी नहीं मालूम कि छूने से चिड़ियों के अंडे गंदे हो जाते हैं. चिड़िया फिर उन्हें नहीं सेती.
श्यामा – (डरते हुए) तो क्या चिड़िया ने अंडे गिरा दिए हैं, अम्मा जी?

अम्मा – और क्या करती. केशव के सर पर इसका पाप पड़ेगा. हाय हाय, जानें ले ली दुष्टों ने!
केशव – (रोते हुए) मैंने तो सिर्फ अंडों को गद्दी पर रख दिया था, अम्मा जी.
[केशव की मासूमियत देखकर, अम्मा जी को हंसी आ जाती है]

अम्मा – (केशव के सर पर प्यार से हाथ फेरते हुए) देखो अब कभी ऐसा न करना, समझे!
केशव – जी अम्मा जी.

[अम्मा अन्दर चली जाती हैं]
केशव – श्यामा, अब तो ये पाप मुझ पर हमेशा रहेगा.
श्यामा – हां भैया सो तो है.

[मंच पर अंधेरा हो जाता है]

[समाप्त]

किताब- प्रेमचंद मंच पर
लेखक- रिंकल शर्मा
प्रकाशन- प्रभाकर प्रकाशन
मूल्य- 125 रुपये

Tags: Books, Hindi Literature, Hindi Writer, Literature, Theater

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Author: Jagran Times

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