
संदीप सैनी/हांसी. इतिहास के पन्नों में झांक कर देखेंगे तो हिसार के हांसी का नाम जरूर दिखेगा. खाने-पीने की मशहूर चीजों के अलावा ऐतिहासिक दृष्टि से हांसी की अपनी ही अलग पहचान है. हांसी पुराने समय में राजा-महाराजाओं, सूफी संतों का स्थल रहा है. ऐसे ही ऐतिहासिक और मशहूर स्थलों में से एक है दरगाह चार कुतुब. जिसका अपने आप में ही अलग इतिहास है.
दुनियाभर में 800 साल पुरानी दरगाहों की लिस्ट में हांसी का नाम चौथे स्थान पर आता है. दरगाह चार कुतुब का इतिहास भी करीब 800 साल पुराना है. इतिहास के पन्नों के मुताबिक मुगल बादशाह हुमांयू जब शेरशाह सूरी के हाथों पराजित होकर अपनी सल्तनत खो बैठा था. उस दौरान हुमांयू ने हिंदुस्तान से भागते समय दरगाह में आकर दुआ मांगी थी. पुन: बादशाह बनने के बाद हुमांयू ने दरगाह के लिए 5210 बीघा भूमि देते हुए कुछ निर्माण भी करवाया. मुगल शासन का अंत होने के बाद और विभाजन होने पर इस ऐतिहासिक दरगाह चारकुतुब की देखरेख गद्दीनशीन के हाथों में चली गई.
चार कुतुब दरगाह की खासियत
ऐतिहासिक दरगाह चार कुतुब का खासियत ये है कि दरगाह में एक ही परिवार के लगातार चार सूफी संतों को कुतुब की उपाधि से नवाजा गया था.इन सभी की मजारें एक ही छत के नीचे हैं. इसलिए इसका नाम दरगाह चार कुतुब है. दरगाह चार कुतुब के इतिहास में शेख क़ुतुब जमालुद्दीन पहले कुतुब थे. उसके बाद दूसरे कुतुब के रूप में हजरत कुतुब बुरहानुद्दीन आये. हजरत ख्वाजा कुतुबुद्दीन मुनव्वर तीसरे कुतुब रहे. 1325 से 1397 ई. तक हजरत कुतुब नूरुद्दीन साहेब नूरजहां मुगल कुश चौथे कुतुब के रूप में रहे. 1354 ई. में बदरुद्दीन सानी पांचवें कुतुब के रूप में विराजमान हुए और पांचवें कुतुब के साथ ही इस परिवार में कुतुब होने का सिलसिला भी समाप्त हो गया. इसके बाद केवल गद्दीनशीन होने की परम्परा चली या रही है.
दरगाह पर उर्स का होता है आयोजन
इन दिनों दरगाह के प्रति अन्य समुदाय के लोगों में भी अपार श्रद्धा देखी जा रही है. दरगाह के मुरीद राजस्थान, उत्तर प्रदेश, दिल्ली व मध्य प्रदेश में रहते हैं जो सालाना उर्स के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में भाग लेते हैं और पूरे शहर में अजमेर शरीफ दरगाह से लायी गई चादर को ले जाकर आपसी भाईचारे का संदेश देते हैं.
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FIRST PUBLISHED : June 17, 2023, 18:29 IST






