
हाइलाइट्स
जमीन से निकले पानी के कारण पृथ्वी के अंदर के भार का वितरण बिगड़ा है.
इस वजह से पृथ्वी की धुरी के झुकाव में बदलाव तेजी से देखने को मिला है.
पहले इसके कई कारण बताए जा रहे थे, लेकिन अब प्रमुख कारक जमीनी पानी पाया गया है.
जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों के भीषण नतीजे देखने को मिल रहे हैं. जाहिर है कुछ नतीजे ऐसे भी हैं जिनका असर जलवायु पर पड़ेगा जिससे जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा मिल रहा है या फिर पारिस्थितिकी तंत्र बिगड़ रहा है. ऐसा ही एक कारक जिस पर पिछले कई समय से अध्ययन हो रहा है, वह है पृथ्वी की धुरी जिसमें बदलाव देखने को मिल रहा है. रोचक बात यह है कि इसके कई कारण भी बताए गए हैं. लेकिन नए अध्ययन में पाया गया है कि पृथ्वी की धुरी में झुकाव की सबसे बड़ी वजह जमीन के अंदर का पानी बहुत ही ज्यादा मात्रा में निकालना है.
दो दशकों में ज्यादा ही बदलाव
जियोफिजिकल रिसर्च लैटर्स में प्रकाशित अध्ययन में यह भी पाया गया है कि पृथ्वी के घूर्णन की धुरी में यह बड़ा बदलाव पृथ्वी की जलवायु पर अच्छा खासा असर डाल सकता है. देखा जा रहा है कि धुरी में यह बदलाव हाल के दो दशक में बहुत ज्यादा मात्रा में देखने को मिला है. जबकि जमीन के अंदर से पानी निकालने की गतिविधि ने अकेले ही 1993 से 2010 के बीच धुरी को 80 सेमी पूर्व की ओर धकेल दिया है.
पृथ्वी के पानी का संचारण और वितरण
पृथ्वी में संचारित होने वाला पानी यह तय करता है कि सतह पर भार किस तरह से वितरित होगा. वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया था कि 1993 से 2010 में लोगों ने 2150 गीगा टन का जमीनी पानी निकाला है जो कि समुद्र तल में 6 मिली मीटर के इजाफे के बराबर है. लेकिन इस अनुमान की पुष्टि करना बहुत मुश्किल है. लेकिन इतना तय है कि पानी की यह मात्रा इतनी ज्यादा है जिससे पृथ्वी की सतह का भार वितरण प्रभावित जरूर हुआ होगा.
बदलते रहते हैं ध्रुव
ग्रह के भौगोलिक उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव वे स्थान होते हैं जहां पृथ्वी की धुरी उसकी सतह को काटती है. लेकिन ये बिंदु स्थायी नहीं होते हैं. पृथ्वी के भार वितरण में विविधता के कारण धुरी और इसलिए ध्रुव भी अस्थिर होते हैं, बदलते रहते हैं. पहले ध्रुवों में बदलाव केवल महासागरों की धाराएं औरपृथ्वी की सतह के नीचे की गर्म चट्टानों के संवहन जैसे प्राकृतिक कारणों से ही होता था.
जमीन पानी के वितरण में बदलाव
लेकिन नए शोध के नतीजे कुछ और ही कहानी बता रहे हैं. इसके मुताबिक इस खिसकाव या बदलाव की सबसे बड़ी वजह जमीन के अंदर के पानी का पुनर्वितरण है. सियोल नेशनल यूनिवर्सटी के भूभौतिकविद और इस अध्ययन की अगुआई करने वाले की वेऑन सेओ बताते हैं कि पृथ्वी के घूर्णन ध्रुव असल में बहुत स्थान बदलते हैं. वहीं इस अध्ययन में शामिल नहीं रहे नासा जेट प्रोपल्शन लैबोरेटीर के शोधकर्ता वैज्ञानिक सुरेद्र अधिकारी भी सेओ से सहमत हैं.
लंबे समय में होता है असर
अधिकारी का कहना है कि धूर्णन ध्रुव समान्यतः करीब एक साल में कई मीटर तक खिसकते हैं, इसलिए जमीन पानी को पम्प से निकलने से मौसम में बदलाव जैसे जोखिम पैदा नहीं करता है. लेकिन भूगर्भीय कालरेखा में ध्रुवों में खिसकाव का जलवायु पर असर देखने को मिल सकता है. सेओ कहते हैं कि उनका अध्ययन बताता है कि की जलवायु संबंधी कारणों में जमीनी पानी के पुनर्वितरण ने वास्तव में घूर्णन ध्रुवों के बदलाव पर सबसे ज्यादा असर डाला है.
अमेरिका और भारत में खास तौर पर
मध्य अक्षांश में पानी के पुनर्वितरण ने ध्रुवीय खिसकाव को खासा प्रभावित किया है. इसलिए पुनर्वितरण का स्थान इस खिसकाव को निर्धारित करता है. अध्ययन के दौरान अधिकांश पुनर्वितरण पश्चिमी उत्तर अमेरिका और उत्तर पश्चिमी भारत में हुआ. दोनों ही मध्य अक्षांशों पर स्थित हैं. सेओ का कहना है कि जमीन से पानी खत्म होने की दर को धीमे करने के प्रयास खिसकाव में बदलाव तो कर सकता है,लेकिन ऐसे प्रयासों को दशकों तक कायम रखना होगा.
पृथ्वी के घूर्णन में बदलाव में पानी की भूमिका की खोज साल 2016 में हुआ था लेकिन अब तक इसमें जमीन के पानी की भूमिका पर अध्ययन विश्लेषण नहीं किया गया था. नए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने इन दोनों कारकों पर शोध किया जिसमें पहले केवल बर्फ की चादरों और ग्लेशियर को, फिर बाद में जमीनी पानी के वितरण को अध्ययन में शामिल किया. दो साल पहले अध्ययन मे पाया गया था कि 1995 में ध्रुवों में खिसकाव दक्षिण से पूर्व की ओर गया और 1995 से 2020 सके बीच खिसकाव की गति उसके पिछले 20 सालों की तुलना में 17 गुना तेज हो गई थी.
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Tags: Climate Change, Earth, Environment, Research
FIRST PUBLISHED : June 17, 2023, 08:37 IST






