संसद भवन का विरोध क्यों?
नये संसद भवन के उद्घाटन के अवसर पर आज प्रश्न यह उठ खड़ा हुआ है कि कांग्रेस, सपा, जदयू जैसे राजनीतिक दल विपक्षी दल हैं या विरोधी दल। यदि हम इनके कार्यकलाप एवं वक्तव्यों को देखें तो ऐसा प्रतीत होता है कि यह दल अब विपक्ष कम और विरोधी अधिक हो गये हैं। हालात यहाँ तक पहुँच गये हैं कि इन दलों को अब यह ज्ञात नहीं है कि किस मुद्दे का विरोध करना है और किसका नहीं। मोदी जी का विरोध करते करते अब यह दल देश विरोधी हरकतें कर रहे हैं।
वैसे तो इनकी देश विरोधी हरकतों के अनेक उदाहरण हैं परंतु यदि मैं उन सभी को गिनाने चलूँ तो यहाँ जगह कम पड़ जाएगी। फिर भी उनमें से कुछ मुद्दों का उल्लेख करना अनुचित नहीं होगा। इनमें सबसे प्रमुख है कांग्रेस का कश्मीर से धारा 370 हटाने का विरोध। इस अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दे के विरोध में कांग्रेस सर्वोच्च न्यायालय तक गई थी जिसने इनकी दलील को निरस्त कर दिया था। दूसरा मुद्दा जिसपर कांग्रेस ने अनुचित विरोध किया वह राफेल विमानों को लेकर था। इस राष्ट्रीय सुरक्षा के अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दे का भी कांग्रेस ने ऐसे समय में विरोध किया जब चीन हमारी सेना को सीमा पर आँखें दिखाने का प्रयत्न कर रहा था।
यदि हम नये संसद भवन की बात करें तो यह जानना आवश्यक है कि इस भवन का निर्माण दिल्ली में चल रहे सेंट्रल विस्टा परियोजना के अंतर्गत किया गया है। इन विपक्षी दलों ने तो इस परियोजना का विरोध यह कहकर किया था कि यह पैसे की बर्बादी है। इनकी सोच के अनुसार, जब ये दल इस परियोजना के ही विरुद्ध हैं तो उसी परियोजना के अंतर्गत निर्मित संसद भवन का स्वागत कैसे कर सकते हैं? संसद भवन के उद्घाटन को लेकर इनके द्वारा उठाए गये प्रश्न इनकी इसी विकृत मानसिकता को दर्शाता है।
कदाचित हर देश की राह में ऐसे पड़ाव आते हैं जहाँ देश की दिशा बदल जाती है। हमें यह मानना होगा कि भारत में यह पड़ाव 2014 में आया था। 2014 के पश्चात भारत उस राह पर चल रहा है जहाँ उसे स्वाधीनता प्राप्त करने के तुरंत बाद चलना चाहिए था। यह नया संसद भवन उस नये भारत का प्रतिबिंब जो आज एक नई उम्मीद एवं नई उमंग के साथ अपनी प्रगति की नई राह पर मोदी जी के नेत्रत्व में तेजी से अग्रसर है। यदि मोदी जी न होते तो ना तो भारत इतनी तीव्र गति से प्रगतिशील होता और ना ही नये संसद भवन का निर्माण होता। यह सारा प्रकरण मोदी जी की सोच और परिश्रम का ही फल है। इसमें दो राय नहीं होनी चाहिए कि जिसने नेत्रत्व किया है वही इस सदन का उद्घाटन भी करेगा। यह उचित ही नहीं अपितु स्वाभाविक है।
जहाँ तक सेंगोल का प्रश्न है तो उसका उचित स्थान लोक सभा अध्यक्ष के सानिध्य में ही है। सेंगोल का और कोई स्थान हो ही नहीं सकता। कांग्रेस की माने तो इसे प्रयागराज में गांधी परिवार के निजी संग्रहालय में रखा जाना चाहिए जहाँ इसकी पवित्रता को नकारते हुए इसे पंडित नेहरू की छड़ी की संज्ञा देकर दशकों से अपमानित किया जा रहा था। यहाँ पर यह बताना आवश्यक हो जाता है कि सेंगोल को 1947 में राजाजी राजगोपालाचारी जी की सलाह पर पंडित नेहरू को राज्य के एक पवित्र आभूषण के रूप में भेंट किया गया था। यह आभूषण एक ऐसी कड़ी है जो हमें हजार साल की गुलामी की बेड़ियाँ तोड़कर स्वतंत्र भारत को अपनी पुरातन सभ्यता से जोड़ता है। साथ ही यह आभूषण हमारी संस्कृति का प्रतीक भी है जो हमें न्याय और धर्म के मार्ग पर अग्रसर होने के लिए प्रोत्साहित करता है। आज सेंगोल को सम्पूर्ण सनातन रीतियों के साथ मोदी जी ने उसे वहाँ स्थापित किया जहाँ उसे 1947 में होना चाहिए था। आज मोदी जी ने सेंगोल को लोक सभा में स्थापित कर इसे वह सम्मान दिया है जो इसे पंडित नेहरू को देना चाहिए था।
इन विपक्षी दलों के मन में एक कारण और है जिसके चलते इन्होंने उद्घाटन समारोह का बहिष्कार किया है। इनको लगता है कि यदि वे इस समारोह में सम्मिलित हो गये होते तो इससे जनता को यह प्रतीत होगा कि जो मोदी जी कर रहे हैं वह सही है। और ये दल देश की जनता को कभी यह नहीं जताना चाहेंगे कि वे मोदी जी के किसी भी काम से सहमत हैं। इसीलिए नये संसद भवन का विरोध करना इनकी मजबूरी हो गई है। जो कारण इन्होंने ढूँढे हैं वह तो केवल बहाना हैं। यदि सेंगोल या कौन उद्घाटन कर रहा है जैसे बहाने न होते तो इन विरोधी दलों ने कोई और बहाना ढूंढ लिया होता।
जो भी हो भाजपा इन विरोधी दलों की हर चाल को नाकाम करने के लिए न सिर्फ तैयार है अपितु प्रतिबद्ध है।









