फतेहपुर मंदिर-मकबरा विवाद में मुस्लिम पक्ष को अदालत से बड़ा झटका, रेस्टोरेशन अर्जी खारिज; अब 13 सितंबर को होगी मूल वाद पर सुनवाई

 

 

फतेहपुर– उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के आबूनगर रेडइया स्थित बहुचर्चित मंदिर-मकबरा विवाद में गुरुवार को अदालत से अहम आदेश सामने आया। लंबे समय से दोनों समुदायों के दावों के बीच चल रहे इस संवेदनशील मामले में मुस्लिम पक्ष को बड़ा कानूनी झटका लगा है। अदालत ने मुस्लिम पक्ष द्वारा दाखिल रेस्टोरेशन (पुनर्बहाली) की अर्जी को खारिज कर दिया है। इसके साथ ही स्पष्ट कर दिया गया कि अब मामले की सुनवाई केवल मूल वाद (ओरिजिनल सूट) पर ही आगे बढ़ेगी। कोर्ट ने अगली सुनवाई के लिए 13 सितंबर की तारीख तय की है।
यह मामला सिविल जज (सीनियर डिवीजन) आकांक्षा मिश्रा की अदालत में विचाराधीन है। गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं ने अपनी-अपनी दलीलें रखीं। अदालत ने सभी पक्षों को सुनने के बाद मुस्लिम पक्ष की रेस्टोरेशन याचिका स्वीकार करने से इनकार कर दिया। अदालत के इस आदेश के बाद अब पूरा विवाद सीधे मूल वाद की सुनवाई के दायरे में रहेगा, जहां दोनों पक्षों को अपने दावों के समर्थन में साक्ष्य और दस्तावेज प्रस्तुत करने होंगे।
विवाद की जड़ क्या है?
आबूनगर रेडइया स्थित यह स्थल पिछले एक वर्ष से अधिक समय से कानूनी और सामाजिक चर्चा का विषय बना हुआ है। मुस्लिम पक्ष का कहना है कि संबंधित भूमि सरकारी अभिलेखों में ‘मकबरा मंगी’ के नाम दर्ज है। मुतावल्ली मोहम्मद अनीस का दावा है कि यहां लगभग 300 वर्ष पुराना ऐतिहासिक मकबरा मौजूद है, जो नवाब अब्दुल समद और उनके पुत्र अबू मोहम्मद से जुड़ा हुआ है।
दूसरी ओर, हिंदू पक्ष का दावा इससे बिल्कुल अलग है। हिंदू पक्ष के अधिवक्ता विजय प्रताप सिंह के अनुसार यह स्थान प्राचीन ठाकुरद्वारा मंदिर है, जिसका इतिहास सैकड़ों नहीं बल्कि हजारों वर्ष पुराना बताया जा रहा है। उनका कहना है कि भवन की संरचना, गुंबद पर बनी कमल की आकृतियां, घंटियों की कड़ियां तथा अन्य स्थापत्य विशेषताएं मंदिर होने की ओर संकेत करती हैं। साथ ही उनका यह भी दावा है कि पुराने सरकारी अभिलेखों में भी इसे मंदिर के रूप में दर्ज किया गया था।
अदालत के आदेश का क्या अर्थ है?
कानूनी जानकारों के अनुसार रेस्टोरेशन अर्जी खारिज होने का अर्थ यह नहीं है कि किसी एक पक्ष का दावा अंतिम रूप से स्वीकार या अस्वीकार कर दिया गया है। अदालत ने फिलहाल केवल यह तय किया है कि अब आगे की सुनवाई मूल मुकदमे के आधार पर होगी। यानी अंतिम निर्णय दोनों पक्षों द्वारा पेश किए जाने वाले दस्तावेजों, राजस्व अभिलेखों, ऐतिहासिक साक्ष्यों और कानूनी तर्कों के आधार पर ही होगा।
पिछले वर्ष विवाद ने लिया था उग्र रूप
यह विवाद 11 अगस्त 2025 को अचानक सुर्खियों में आ गया था। उस समय हिंदू पक्ष के लोगों ने इस स्थल को ठाकुरद्वारा मंदिर बताते हुए वहां पूजा-अर्चना की थी। इस दौरान भगवा ध्वज फहराने और परिसर में तोड़फोड़ के आरोप भी सामने आए थे। घटना के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद पूरे जिले में तनाव की स्थिति बन गई थी।
इसके बाद मुस्लिम पक्ष ने भी विरोध दर्ज कराया, जिससे माहौल और अधिक संवेदनशील हो गया। स्थिति बिगड़ने पर तत्कालीन जिला प्रशासन और पुलिस अधिकारियों को मौके पर पहुंचना पड़ा। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने हल्का बल प्रयोग किया था। एहतियात के तौर पर विवादित स्थल के आसपास बैरिकेडिंग कर अस्थायी पुलिस चौकी स्थापित की गई थी, ताकि किसी भी अप्रिय घटना को रोका जा सके।
अब सबकी निगाहें 13 सितंबर पर
अदालत के ताजा आदेश के बाद इस बहुचर्चित विवाद में अगला महत्वपूर्ण पड़ाव 13 सितंबर की सुनवाई होगी। उस दिन मूल वाद पर आगे की कार्यवाही होगी और दोनों पक्ष अपने-अपने दावों के समर्थन में साक्ष्य प्रस्तुत करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाएंगे।
फिलहाल अदालत ने किसी भी पक्ष के स्वामित्व या धार्मिक दावे पर अंतिम निर्णय नहीं दिया है। ऐसे में पूरे मामले पर जिले के साथ-साथ प्रदेशभर की नजरें टिकी हुई हैं। आने वाले समय में अदालत में पेश होने वाले साक्ष्य और कानूनी दलीलें ही इस ऐतिहासिक और संवेदनशील विवाद की दिशा तय करेंगी।

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Author: Up Head Line

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