
नई दिल्ली. चीन के लिए गहरे समुद्र और हाई ऑलटेट्यूड एरिया में भारत से डरने की एक और नई वजह आने वाली है. दुनिया के सबसे खतरनाक ड्रोन की खरीद के लिए आखिरी कदम भारत ने बढ़ा दिया है भारत और अमेरिका के बीच प्रीडेटर ड्रोन की डील का ऐलान हो गया है. पीएम मोदी और जो बाइडन के मुलाकात के बाद, जो साझा बयान जारी हुआ है, उसमें कहा गया कि MQ-9B हाई ऑलटेट्यूड लॉन्ग एंडोरेंस ड्रोन को भारत में ही असेंबल किया जाएगा और इस फैसले का दोनों देश के राष्ट्राध्यक्षों ने स्वागत किया है.
भारतीय नौसेना के लिए किसी वरदान से कम नहीं है ये अमेरिकी ड्रोन
बता दें कि इस प्रीडेटर ड्रोन के कई अलग-अलग वर्जन हैं और अलग नाम से भी जाना जाता है. जैसे की MQ-9 रीपर, सी गार्डियन और स्काई गार्डिय. ये डील पिछले काफी वक्त से ठंडे बस्ते में थी. भारत अमेरिका से 31 एमक्यू-9 रीपर ड्रोन यानी प्रिडेटर ड्रोन लेगा. इसमें से 15 ड्रोन भारतीय नौसेना को, 8 थल सेना और 8 वायुसेना को मिलेंगे.
सबसे ज़्यादा नौसेना को इसलिए क्योंकि उनकी निगरानी का इलाका तीनो सेना में सबसे ज़्यादा है. हिंद महासागर रीजन पर निगरानी रखना एक सबसे बड़ी चुनौती है. साल 2020 में भारतीय नौसेना ने अमेरिकी कंपनी जनरल एटोमिक से दो प्रीडेटर ड्रोन के नेवल वर्जन सी गार्डियन को एक साल की लीज पर लिया था. बाद में इस लीज़ को बढ़ाया गया और आज भी भारतीय नौसेना इसका इस्तेमाल कर रही है.
चीन और पाकिस्तान की डरने की वजह
चीन ताइवान स्ट्रेट पर अमेरिकी ड्रोन की मौजूदगी का डर लगातार झेल रहा है तो पाकिस्तान ने तो अफगानिस्तान में अमेरिकी ऑप्रेशन के लिए अपने इन ड्रोन को अपने एयर बेस से उड़ान भरते देखा है. अलकायदा को मारने में इस प्रीडेटर ड्रोन की सबसे बड़ी भूमिका है. हज़ारों किलोमीटर दूर बैठकर भी किसी भी टार्गेट पर नजर रखी जा सकती है और उसे नष्ट भी किया जा सकता है. चीन नीले समुद्र में फ़्रीडम ऑफ़ नेविगेशन का बेजा इस्तेमाल कर रहा है.
भारत के लिए निगरानी रखना होता है मुश्किल
भारतीय समुद्री इलाके मे साल 2008 के बाद से ही अपने वॉरशिप और सबमरीन के साथ मौजूद रहता है. उसके रिसर्च वेसेल आए दिन इंडियन ओशन रीजन में में आते रहते हैं जिन पर अब इन ड्रोन के ज़रिए आसानी सेनज़र रखी जा सकती है. अगर हम भारतीय समुद्री इलाके की बात करें तो ये ईस्ट कोस्ट से करीब 5000 किलोमीटर आगे तक तो वेस्ट कोस्ट से करीब 8000 किलोमीटर आगे तक फैला हुआ है और इस पर निगरानी रखना सबसे जटिल काम है.
थलसेना और एयरफोर्स को मिलेंगे 8-8 ड्रोन
ख़ास बात तो ये है कि नौसेना के 15 MQ-9 तो समुद्र के इलाके को संभालेगी लेकिन थलसेना और वायुसेना को मिलने वाले 16 ड्रोन चीन से लगते पूरे एलएसी और पाकिस्तान से लगती LOC और इंटरनेशनल बॉर्डर पर नजर रखेगी. पुलवामा हमले के बाद भारतीय वायुसेना के फाइटरों ने बालाकोट में घुसकर आतंकी शिविरों को नष्ट किया था अब इस ड्रोन के आने के बाद बस एक कंट्रोल रूम में बैठे बैठे ही किसी भी ऑप्रेशन को आसानी से अंजाम दिया जा सकेगा.
50 हजार फीट की ऊंचाई तक भर सकता है उड़ान
वहीं चीन के साथ पूर्वी लद्दाख में विवाद के दौरान भी इन सी गार्डियन का इस्तेमाल निगरानी के लिए किया गया था. चीन की सबसे बड़ी समस्या ये है कि उसका 80 फीसदी एनर्जी ट्रेड इंडियन ओशन रीजन से होकर गुजरता है और अगर भारत के पास ये अचूक रामबाण होगा तो उसका परेशान होना लाज़मी है. ड्रोन बनाने वाली कंपनी जनरल एटोमिक की मानें तो ये ड्रोन सिर्फ 2 ग्राउंड क्रू के जरिए आसानी से 50 हजार फिट की उंचाई पर 300 मील प्रति घंटे की अपनी अपनी अधिकतम रफ़्तार से 27 घंटे तक एक बार में 1900 किलोमीटर तक लगातार उड़ान भर सकता है.
1700 किलो से ज्यादा पेलोड के साथ ये ड्रोन भर सकता है उड़ान
अपने साथ 1700 किलो से ज़्यादा पेलोड, जिसमें एयर टू ग्राउंड हेलफायर मिसाइल, लेजर गाइडेड बम, एयर टू एयर स्ट्रिंगर मिसाइल पेलोड लेकर उड़ान भार सकता है. खास बात तो ये है कि इसे आसानी से एक जगह से दूसरी जगह C-130 सुपर हरक्यूलिस और अन्य बड़े ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ़्ट से मूव कराया जा सकता है और इस ड्रोन की ख़ासियत को पहले ही सेना बारीकी से अध्ययन कर रही थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिका जाने से ठीक पहला 15 जून को रक्षा मंत्रालय की रक्षा ख़रीद परिषद यानी DAC ने 3 बिलियन डॉलर से ज़्यादा कीमत के 31 ड्रोन ख़रीद पर मुहर लगा दी थी.
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FIRST PUBLISHED : June 23, 2023, 09:23 IST






