पांच साल तक बीजेपी की पहली पूर्ण बहुमत वाली केंद्र सरकार चलाने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बार फिर जनता की अदालत में हैं नये सिरे से विश्वास मत हासिल करने के लिए. तमाम चुनावी सर्वे ये बता रहे हैं कि 2019 के इस चुनावी समर में प्रधानमंत्री के पद के लिए अगर कोई सबसे अधिक लोकप्रिय है, तो वो नरेंद्र मोदी ही है. यूं तो चुनाव सीधे प्रधानमंत्री का नहीं होता, लेकिन माहौल ऐसा है कि या तो मोदी के नाम पर वोट मांगे जा रहे हैं या फिर मोदी विरोध के नाम पर यानी चुनाव के केंद्र में खुद मोदी ही हैं.
मोदी के सियासी जीवन का ये छठा चुनाव होगा, जिसमें वो खुद चुनाव मैदान में होंगे. चार बार विधानसभा चुनाव लड़ने और जीतने के बाद दूसरी बार लोकसभा का चुनाव लड़ेंगे मोदी. इससे पहले 2014 में ही पहली बार उन्होंने लोकसभा का चुनाव लड़ा था, वाराणसी और वडोदरा दो जगहों से. दोनों जगह वे भारी मार्जिन से जीते, लेकिन आखिर में देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश, जिसने 80 में से 71 सीटें बीजेपी की झोली में और दो सीटें सहयोगी अपना दल के खाते में डाल दी थी, उसी का प्रतिनिधित्व करने की सोची और अपने गृह राज्य गुजरात की वडोदरा सीट छोड़ दी. इस बार भी मोदी वाराणसी से ही उम्मीदवार होंगे, पार्टी इसका ऐलान कर चुकी है.
लेकिन मोदी के जीवन का पहला चुनाव आम चुनाव न होकर फरवरी 2002 का उपचुनाव था, जहां से जन प्रतिनिधि के तौर पर उनकी औपचारिक यात्रा शुरु हुई. हालांकि पांच महीने पहले वो मुख्यमंत्री बन चुके थे, लेकिन कोई चुनाव नहीं लड़ा था. इससे पहले वो अपनी पार्टी और नेताओं के लिए वोट मांगने और उसके लिए जरूरी कैंपेन को दिशा देने में डेढ़ दशक से लगे थे, लेकिन जनता की अदालत में खुद के लिए वोट मांगने का ये पहला मौका था.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फाइल फोटो- भरत बराई)
दरअसल, इसकी नींव पड़ी अक्टूबर 2001 में, जब सात तारीख को उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. तत्कालीन मुख्यमंत्री और बीजेपी के राज्य में सबसे वरिष्ट नेता रहे केशुभाई पटेल को हटाकर उन्हें गुजरात की कमान सौंपी गई थी. कारण ये था कि जनवरी 2001 में गणतंत्र दिवस के दिन ही राज्य में आये भयावह भूकंप के बाद राहत कार्यों में ढिलाई को लेकर केशुभाई पटेल सरकार की काफी आलोचना हो रही थी और इसी दौरान हुए दो उपचुनावों में बीजेपी की हार हुई थी.
यहां तक कि खुद लालकृष्ण आडवाणी, जो अटल बिहारी वाजपेयी की तत्कालीन सरकार में नंबर 2 और डिप्टी प्राइम मिनिस्टर थे, उनकी अपनी लोकसभा सीट गांधीनगर का हिस्सा रही साबरमती विधानसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में बीजेपी की हार हुई थी. यही नहीं, साबरकांठा लोकसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में भी बीजेपी की हार हुई थी. ऐसे माहौल में गुजरात में बीजेपी की बिगड़ती किस्मत को संवारने के लिए नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री के तौर पर दिल्ली से वापस भेजा गया था, जो 1995 में शंकरसिंह वाघेला के मशहूर खजुराहो विद्रोह के बाद समझौते के फार्मूले के तहत दिल्ली में बीजेपी की केंद्रीय इकाई में चले गये थे और महामंत्री के तौर पर संगठन की जिम्मेदारी संभाल रहे थे.
सात अक्टूबर 2001 को मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर गांधीनगर के हैलीपैड ग्राउंड में शपथ ली थी. उनके सामने प्राथमिकता बीजेपी के संगठन में जान फूंकने की थी, कार्यकर्ताओं के मनोबल को बढ़ाना था और सरकार को असरदार ढंग से चलाने की थी, वो भी तब जब किसी पंचायत को चलाने तक का अनुभव भी उनके पास नहीं था. सीधे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर सवार हुए थे मोदी, जो आरएसएस से 1986 में बीजेपी में आए थे. बीजेपी के नेता के तौर पर 1987 में पहली बार मोदी ने अहमदाबाद नगर निगम में पार्टी को जीत दिलाई थी और फिर संगठन महामंत्री के तौर पर 1995 में राज्य में पहली बीजेपी सरकार बनने के आर्किटेक्ट बने थे.

लेकिन बतौर मुख्यमंत्री अब उनके सामने चुनौती थी छह महीने के अंदर संवैधानिक मर्यादा के तहत खुद विधायक बनने की. हालात अनुकूल भी नहीं थे. काफी हील-हुज्जत के बाद केशुभाई पटेल ने मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ी थी और राज्य में बीजेपी के अंदर एक बड़ा वर्ग ऐसा था, जो केशुभाई के साथ था या फिर यूं कहें कि मोदी के विरोध में था. केशुभाई पटेल खुद राज्य के ताकतवर पाटीदार समुदाय से थे और राज्य के अलग-अलग हिस्सों में जाकर क्रंदन कर रहे थे- मारो वांक शुं यानी मेरी क्या गलती, जो मुझे मुख्यमंत्री पद से हटाया गया.
खुद संघ और वीएचपी के अंदर भी एक धड़ा ऐसा था, जो मोदी से खुन्नस खा रहा था. केशुभाई पटेल के मुख्यमंत्री रहते हुए सत्ता और सरकार में इन दोनों संगठनों की काफी दखलंदाजी थी और खुद केशुभाई पटेल हर बड़ा फैसला इनसे पूछकर करते थे. मोदी ने इस प्रवृति पर थोड़ी अंकुश लगाई, क्योंकि वो राज्य में टेस्ट मैच नहीं, बल्कि वनडे मैच खेलने आए थे, ट्वेंटी-ट्वेंटी का दौर अभी शुरु नहीं हुआ था. तुरंत सरकार के प्रदर्शन की अच्छी छाप छोड़नी थी, और इसमें वो किसी किस्म की बाधा स्वीकार करने को तैयार नहीं थे, चाहे संघ या फिर संघ परिवार से जुड़े संगठन ही क्यों न हों.
ऐसे माहौल के बीच मोदी ने अहमदाबाद की एलिस ब्रिज सीट से चुनाव लड़ने का मन बनाया, जिसका प्रतिनिधित्व केशुभाई की सरकार में काफी प्रभावशाली रहे हरेन पंड्या कर रहे थे. केशुभाई की सरकार में गृह राज्य मंत्री के तौर पर हरेन पंड्या का अपना जलवा था और वो अपने को भावी मुख्यमंत्री के तौर पर भी देख रहे थे. ऐसे में जब मोदी ने हरेन पंड्या को एलिस ब्रिज की सीट खाली करने का संकेत दिया, तो पंड्या बिदक गए और सार्जजनिक तौर पर सीट खाली करने से मना कर दिया. मोदी के लिए ये किसी झटके से कम नहीं था, क्योंकि पंड्या को बीजेपी की राजनीति में लेकर वही आए थे और पहली दफा विधानसभा का चुनाव भी लड़ाया था. जब बाबूभाई वासणवाला के देहांत के कारण एलिसब्रिज की सीट खाली हुई थी.
हरेन पंड्या के इंकार के बाद मोदी दुखी तो हुए, लेकिन दूसरी सीट की तलाश शुरु हुई. उत्तर गुजरात या फिर सौराष्ट्र, किस इलाके से चुनाव लड़ा जाए, किस विधायक की सीट खाली कराई जाए, विचार होने लगा. इसी दौरान सौराष्ट्र की सियासत के केंद्र राजकोट में कुछ ऐसा हुआ, जो मोदी के लिए अनुकूल साबित हुआ. भूकंप के बाद राहत और बचाव कार्यों को लेकर केशुभाई की आलोचना तो हुई ही थी, उनकी सरकार में नंबर दो रहे वजूभाई वाला की भी आलोचना हुई थी. यही नहीं, वजूभाई पर राज्य की बिल्डर लॉबी के काफी करीब होने का आरोप भी लग रहा था. इस तरह की परिस्थिति के बीच वजूभाई ने सामने से चलकर राजकोट-2 की सीट मोदी के लिए खाली करने का फैसला किया, जो सीट वो 1984 से लगातार जीत रहे थे और ये राज्य में बीजेपी की सबसे मजबूत सीट में से एक थी. राजकोट-2 से पहले चिमन शुक्ल और अरविंद मणियार जैसे पार्टी के दिग्गज जनसंघ के जमाने में चुनाव जीत चुके थे.
वजूभाई ने सीट खाली करने की सूचना भावनगर जाकर तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष राजेंद्रसिंह राणा को दी, जो खुद संघ पृष्ठभूमि से बीजेपी में आए थे और जिनके अपने दादा सरदार सिंह राणा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के मशहूर क्रांतिकारियों में से एक थे. राणा से मिलने के बाद वजूभाई राजधानी गांधीनगर पहुंचे और मोदी के सामने भी ये बात की. ये चर्चा करते-करते दोनों की आंखों में आंसू आ गये. मोदी के लिए भी ये भावुक पल था, चुनौतीपूर्ण परिस्थिति में पार्टी का इतना वरिष्ठ नेता उनके लिए अपनी सीट खाली कर रहा था.
वजूभाई वाला ने अपना इस्तीफा विधानसभा अध्यक्ष को सौंपा और फिर उपचुनाव की अधिसूचना जारी हुई. इसके तहत 21 फरवरी 2002 को वोट डाले जाने थे और 24 फरवरी को मतगणना होनी थी. लेकिन चुनाव अकेले राजकोट-2 पर ही नहीं होने जा रहा था. राज्य की दो और सीटों – सयाजीगंज और महुआ पर भी चुनाव होने जा रहा था, जो सीटें बीजेपी के पास रही थीं. वडोदरा की सयाजीगंज सीट तो इसलिए खाली हुई थी क्योंकि पुलिस अधिकारी से नेता और फिर मंत्री बने जसपाल सिंह ने बगावती तेवर अपनाते हुए पार्टी से इस्तीफा दे दिया था.

स्वाभाविक तौर पर फोकस इन तीन सीटों में से राजकोट-2 पर ही था, क्योंकि मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी यहां से चुनाव लड़ रहे थे. 2001 में साबरमती विधानसभा सीट और साबरकांठा की लोकसभा सीट जीतने के बाद विपक्षी पार्टी कांग्रेस का उत्साह भी चरम पर था. कांग्रेस को लग रहा था कि अगर वो बीजेपी के अंदर मचे घमासान के बीच मोदी को पटखनी दे देती है, तो इससे गुजरात में सत्ता में वापसी की राह आसान हो जाएगी, माहौल पार्टी के हक में बनना शुरु हो जाएगा. इसी वजह से आम तौर पर भीतरघाट से ग्रस्त रहने वाली कांग्रेस एकजुट होकर इन उपचुनावों के लिए गई. इसके संकेत तब बहुत साफ तौर पर दिखे, जब कांग्रेस प्रत्याशी अश्विन मेहता के पर्चा भरने का वक्त आया. कांग्रेस के सभी धड़ों के बड़े नेता एक साथ नजर आए, दो पूर्व मुख्यमंत्री अमरसिंह चौधरी और शंकरसिंह वाघेला तो थे ही, पूर्व मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल की पत्नी और खुद संयुक्त मोर्चा की सरकार में मंत्री रही उर्मिलाबेन पटेल भी मौजूद थीं.
अहमद पटेल के खास नरेश रावल भी मौजूद थे, जो राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता थे. वाघेला को तो अपनी निजी खुन्नस भी साधनी थी, उन्हें ये लगता था कि बीजेपी से उनके बाहर जाने की बुनियाद मोदी ने ही बनाई थी पार्टी में उन्हें अलग-थलग करके. विद्रोह के बाद उन्होंने कांग्रेस की मदद से 1996 में सरकार तो बना ली थी, लेकिन 1998 के विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी राजपा को भयानक हार का सामना करना पड़ा था और उनकी पार्टी के सिर्फ चार विधायक जीत पाए थे. ऐसे में चुनाव बाद अपनी पार्टी का वो कांग्रेस में विलय कर चुके थे और अब गुजरात की राजनीति में अपने रसूख को फिर से स्थापित करने के लिए बेचैन थे.
विपक्ष की ऐसी तैयारी के बीच मोदी को अपने सियासी जीवन का पहला चुनाव जीतना था. पिछले डेढ़ दशक से उनके विश्वस्त सहयोगी रहे अमित शाह को भी अपने चुनावी हुनर को साबित करने का मौका था, जो अब तक खुद दो बार विधानसभा का चुनाव जीत चुके थे और पार्टी की राज्य इकाई में उपाध्यक्ष की भूमिका निभा रहे थे. उनके साथ सुनील ओझा भी थे, जो मोदी के करीबी थे और सौराष्ट्र के भावनगर इलाके से आते थे. खुद वजूभाई वाला के लिए भी ये प्रतिष्ठा का प्रश्न था, जिन्हें मोदी को चुनाव जीताकर राजकोट-2 पर अपनी मजबूत पकड़ का सबूत देना था, जहां से 1998 में उन्होंने 28 हजार मतों के मार्जिन से जीत हासिल की थी शंकरसिंह वाघेला की पार्टी राजपा की प्रत्याशी कश्मीरा नथवाणी को हराकर।
उधर बीजेपी के वरिष्ठ नेता की भूमिका में औपचारिक तौर पर केशुभाई पटेल एक-दो सभाओं में तो आए, लेकिन मोदी से उनकी नाराजगी सबको पता थी. केशुभाई पटेल चूंकि खुद पटेल समुदाय से थे, इसलिए पटेलों की नाराजगी की आशंका भी सता रही थी. राजकोट-2 विधानसभा सीट के अंदर ब्राह्मण मतदाताओं की तादाद भी काफी बड़ी थी, इसी को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार के तौर पर अश्विन मेहता को उतारा था, जो ब्राह्मण समुदाय से आते थे.

जब चुनाव प्रचार का सिलसिला शुरु हुआ, तो कांग्रेस ने मोदी के सामने कई तरह से हमले किये. एक तो उनकी जाति को लेकर माहौल खड़ा करने की कोशिश की गई. चूंकि राजकोट-2 सीट के अंदर सवर्ण मतदाताओं की तादाद अच्छी खासी थी, इसलिए मोदी की जाति को लेकर हमले शुरु किये गये. राजकोट में जगह-जगह पोस्टर लगाये गये- घांची समाज के गौरव, मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी राजकोट-2 से चुनाव लड़ रहे हैं. पहली बार मोदी की जाति इस तरह से चर्चा में आई और राजकोट ही नहीं, देश में भी पहली बार लोगों को पता चला कि मोदी ओबीसी समाज से हैं और घांची जाति से आते हैं. बात यहीं खत्म नहीं हुई, मोदी को बाहरी उम्मीदवार बताकर भी उनपर हमले किये गये और अश्विन मेहता के स्थानीय होने की बात की गई. हालांकि मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान इसका अपने ढंग से जवाब दिया, कांग्रेस के नेता इटली में जन्मी महिला को तो अपना मान सकते हैं, लेकिन धरतीपुत्र नरेंद्र मोदी को बाहरी मानते हैं.
बड़े पैमाने पर मोदी के सामने पैंपलेट भी जारी किये गये. बेनामी पर्चों के जरिये मोदी पर निजी हमले किये गये. हालात ऐसे बन गये कि राजकोट पुलिस को ऐसे बेनामी पर्चों को रोकने और हालात को बिगड़ने से बचाने के लिए बॉम्बे पुलिस एक्ट की उस धारा का इस्तेमाल करना पड़ा, जिसमें इस तरह के भड़काउ पर्चों को बांटने पर पाबंदी है.
इस तरह के माहौल के बीच मोदी और उनके विश्वस्त सहयोगियों की टीम ने चुनाव जीतने की अपनी रणनीति पर सधे ढंग से काम करना शुरु किया. वजूभाई वाला औपचारिक तौर पर चुनाव प्रभारी थे, लेकिन असल में अमित शाह पूरे चुनाव को देख रहे थे, उनका पूरा साथ विजय रुपाणी निभा रहे थे, जो तब तक खुद विधानसभा का चुनाव भी नहीं लड़े थे और राज्य की संकल्पपात्र अमलीकरण समिति के अध्यक्ष थे. अमित शाह ने राजकोट में डेरा ही डाल दिया. खुद नरेंद्र मोदी चुनाव प्रचार के दौरान राजकोट आने के दौरान आचार संहिता लागू होने के कारण सर्किट हाउस में न रुककर अपनी ही पार्टी के नेता अरविंद मणियार के बेटे कल्पक मणियार के घर पर रुकते थे. अरविंदभाई खुद न सिर्फ राजकोट के मेयर रह चुके थे, बल्कि राजकोट-2 से विधायक भी रह चुके थे. लेकिन मोदी के राजकोट से चुनाव लड़ने के पंद्रह साल पहले उनका देहांत हो चुका था.
चुनावी रणनीति के तहत घर-घर जनसंपर्क का लक्ष्य रखा गया. बड़ी सभाएं तो की ही गई, साधु-संतों से भी संपर्क किया गया, जिन्होंने मोदी को जीताने के लिए अपील की. मोदी खुद कई संस्थाओं में गए, राजकोट में महात्मा गांधी विद्यालय और काठियावाड़ बाल आश्रम से लेकर रामकृष्ण आश्रम भी गये, जहां अपनी किशोरावस्था में कभी वो संन्यासी बनने के लिए पहुंचे थे. आज मीडिया से दूरी रखने का आरोप मोदी पर भले ही लगता है, लेकिन 2002 के फरवरी महीने में वो राजकोट के हर बड़े अखबार, गुजरात समाचार, संदेश, फूलछाब, अकिला और सांध्य समाचार के दफ्तर तक गये और उनके संपादकों से शिष्टाचार मुलाकात की. मोदी के साथ इस तरह के दौरे में विजय रुपाणी और मीडिया संयोजक राजु ध्रुव रहा करते थे. याज्ञ्निक रोड पर चुनाव कार्यालय के ठीक सामने सिटी शौपिंग सेंटर में डेढ़ कमरे का मीडिया सेंटर भी स्थापित किया गया.
जमकर हुए चुनाव प्रचार के बाद आखिरकार 21 फरवरी को मतदान हुए। बीजेपी जहां करीब पैंतीस हजार मतों से जीत की उम्मीद लगा रही थी, वही कांग्रेस को अपने परंपरागत मतदाताओं के अलावा पाटीदारों की नाराजगी और अश्विन मेहता की वजह से ब्राह्मणों का वोट मिलने से जीत की उम्मीद लग रही थी. दोनों ही पार्टियों ने घर-घर से मतदाताओं को बूथ तक पहुंचाया. करीब 79 हजार वोट पड़े. कुल इक्कीस उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे. ऐसे में जब 24 फरवरी की सुबह मतगणना का सिलसिला शुरु हुआ, तो सबकी सांसे तेज थी.
दिल्ली में प्रधानमंत्री वाजपेयी और गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी भी बेचैन थे कि आखिर जिस नरेंद्र मोदी पर भरोसा कर उन्होंने गुजरात की बागडोर उन्हें सौंपने का फैसला किया, वो अपने जीवन का पहला चुनाव जीत पाएंगे या नहीं या फिर जीतेंगे भी तो मजबूती से या फिर मामूली अंतर से. दोपहर बाद नतीजे साफ हो गये. मोदी को कुल 45298 वोट मिले और उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के अश्विन मेहता पर 14728 मतों के अंतर से जीत हासिल कर ली. परिणामों की घोषणा होते ही मोदी राजकोट आए और मतदाताओं का आभार जताकर गांधीनगर वापस लौट आए.
हालांकि बीजेपी और मोदी के लिए वो दिन पूरी तरह खुशी का नहीं रहा. मोदी तो राजकोट-2 से चुनाव जीत गये थे, लेकिन कांग्रेस ने सयाजीगंज और महुआ में बड़े अंदर से बीजेपी पर जीत हासिल कर ली थी यानी उपचुनावों का मुकाबला 2-1 से कांग्रेस जीत गई थी. निजी तौर पर मोदी के लिए अपनी जीत का संतोष तो था, लेकिन भविष्य की चुनौती गंभीर लग रही थी. इसी पर मंथन का सिलसिला चल ही रहा था कि 27 फरवरी की सुबह गुजरात के गोधरा रेलवे स्टेशन के ठीक बाहर मुस्लिमों के एक समूह ने अयोध्या से लौटकर आ रहे कारसेवकों से भरी साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 डिब्बे में आग लगा दी, जिसमें कुल 59 लोगों की मौत हुई.
उसके अगले दिन गुजरात में दंगे भड़क उठे और उसके साथ ही गुजरात और देश की राजनीति भी एक बड़ी करवट ले बैठी. 2002 के दंगों के लिए दशक भर तक आरोप झेलते रहे मोदी. लेकिन इन आरोपों के बीच गुजरात के विकास मॉडल का खाका खीचते हुए मोदी लगातार तीन बार अपनी पार्टी को गुजरात में जीत दिलाने में कामयाब रहे और रिकॉर्ड साढे तेरह साल तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के बाद 2014 में अकेले अपने दम पर बीजेपी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनाकर उसके पांच वर्ष भी पूरे कर लिए और अब 2019 के चुनावी मैदान में हैं.
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पहले चुनाव और 17 साल बाद के इस चुनाव में बड़ा फर्क ये है कि उस वक्त मोदी अपने लिए वोट मांग रहे थे और आज उनकी पूरी पार्टी और सहयोगी दल उनके नाम पर वोट मांग रहे हैं, तो विपक्ष भी उनके विरोध के नाम पर ही वोट मांग रहा है. जहां तक जनता का सवाल है, वो भी मोदी को तौल कर ही अपने हिसाब से वोट करने की तैयारी कर रही है, जिसका इशारा तमाम सर्वे कर रहे हैं.
पोस्ट स्क्रिप्ट – मोदी के लिए जिन्होंने सीट खाली की, वो वजूभाई वाला 2002 के दिसंबर में हुए नियमित चुनाव में फिर राजकोट-2 से चुनाव जीते और सात दफा वहां से चुनाव जीतने के साथ ही राज्य में रिकॉर्ड 18 बार बजट पेश करने का रिकॉर्ड बनाने के बाद 2014 में मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद कर्नाटक के राज्यपाल बनाये गये. उनके इस्तीफे के बाद विजय रुपाणी ने उस सीट से चुनाव लड़ा, जो सीट अब राजकोट पश्चिम के तौर पर जानी जाती है. विधायक बनने के साथ ही रुपाणी मंत्री भी बने और फिर आनंदीबेन के हटने के बाद मुख्यमंत्री. 2017 में भी इसी सीट से जीते रुपाणी और राज्य के मुख्यमंत्री बने हुए हैं.
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मोदी के चुनाव की जिम्मेदारी संभालने वाले अमित शाह 2014 में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गये और अब खुद पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़े रहे हैं, गांधीनगर की सीट से, जिससे पहले वाजपेयी और आडवाणी चुनाव लड़ते रहे और वो उनके चुनाव प्रबंधक की भूमिका में रहे. सुनील ओझा 2014 में हुए लोकसभा चुनावों के दौरान उत्तर प्रदेश में बीजेपी के सह प्रभारी रहे और अब भी पीएम की सीट वाराणसी का ध्यान रखते हैं. मोदी खुद राजकोट-2 के बाद अहमदाबाद की मणिनगर सीट से लगातार तीन बार विधानसभा चुनाव जीते और अब दूसरी बार लोकसभा का चुनाव लड़ने जा रहे हैं बाबा विश्वनाथ की नगरी वाराणसी से.
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Tags: Amit shah, BJP, General Election 2019, Gujarat, Pm narendra modi, Politics, RSS
FIRST PUBLISHED : April 06, 2019, 19:00 IST






