स्कूल से बचे समय में यह शिक्षक करते हैं किसानी, अमरूद के लगाए 6000 पौधे, अब आया मालामाल होने के दिन


नकुल कुमार/पूर्वी चम्पारण. कभी अंग्रेजों ने चंपारण की जमीन को बंजर बनाने का षड्यंत्र किया था. लेकिन किसानों ने खून पसीने से सींचकर जमीन को इस लायक बना लिया कि आज किसान अपनी खेत में लगे फसल की तुलना कामधेनु गाय से करने लगे हैं. पूर्वी चंपारण के पिपराकोठी प्रखंड अंतर्गत सूर्यपुर पंचायत के झखरा निवासी शिक्षक रवि भूषण शर्मा को खेती-किसानी का ऐसा शौक है कि वे स्कूल के बाद अपना पूरा समय खेती को देते हैं. बदले में खेत भी उन्हें पारिश्रमिक से कई गुना बढ़ाकर लौटाती भी है.

खेत में है 6000 अमरुद के पौधे
शिक्षक रवि भूषण कुमार शर्मा अमरुद के पौधे लगाने की पीछे की स्टोरी बताते हैं. वे बताते हैं कि कि उन्होंने देखा कि अमरूद काफी कम समय में ही कमर्शियल हो जाता है. इस कारण से उन्होंने अमरुद के पौधे लगाने के लिए कई शहरों की यात्रा की. पौधे से उत्पादित हो रहे अमरूद का स्वाद चखकर संतुष्ट हुए. तब जाकर उन्होंने विजयवाड़ा से थाई बीएनआर हाइब्रिड नस्ल के अमरूद का 3000 पौधा लगाया. वहीं उन्होंने अपने दूसरे प्लॉट में बीएनआर सूर्यकिरण का भी 3000 पौधा लगाया हुआ है. इस तरह से उन्होंने कुल 6000 अमरुद का पौधा लगाया हुआ है.

फ्रूट कीपिंग कैपेसिटी ज्यादा
उनका कहना है कि इस किस्म के अमरूद के पौधे का फ्रूट कीपिंग कैपेसिटी ज्यादा है. जिससे पके हुए फल भी पेड़ पर ज्यादा दिन तक टिक पाते हैं. बाजार में 10 दिनों तक रहने पर भी यह फल खराब नहीं होते हैं. यह अमरुद थाईलैंड की सीडलेस वैरायटी है. यही कारण है कि प्रति पौधा 350 रुपए की दर से 6000 पौधा खरीदा एवं भाड़ा अलग से देना पड़ा. उत्पादन की बात करें तो पौधा एक साल में फल देने लगता है और 3 साल में कमर्शियल हो जाता है. तब प्रति पौधा एक क्विंटल फल देने लगता है.

अमरूद का सीजन, रेट एवं मार्केट
वे बताते हैं कि मुख्य रूप से अमरूद के उत्पादन का तीन सीजन है. जून से अगस्त, अक्टूबर से दिसंबर एवं फरवरी से अप्रैल. स्थानीय मार्केट में 20 से लेकर 70 रुपए प्रति किलो तक का रेट मिल जाता है. जबकि व्यापारी उनके फार्म से 40 रुपए प्रति केजी के दर से ले जाते हैं. इस अमरूदकी खासियत यह है कि प्रति पौधा से कम से कम 100 किलो अमरूद होता है.

गरीबों का सेब है अमरूद
किसान का कहना है कि अमरूद किफायती दर पर बाजार में मिल जाता है. यही कारण है कि इसे गरीबों का सेब भी कहा जाता है. हमारे पूर्वज अमरूद खाने के लिए बढ़ावा भी देते थे. लेकिन आज हम अपने पूर्वजों की नसीहत भूल गए हैं यही कारण है कि आज डॉक्टर की सलाह से इसे खाते हैं.

Tags: Bihar News, Champaran news, Local18

Source link

Jagran Times
Author: Jagran Times

Leave a Comment

Read More