
नई दिल्ली: मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) को लेकर दिन-प्रतिदिन लोगों में जागरूकता बढ़ती जा रही है. मानसिक स्वास्थ्य की बेहतरी के लिए सरकार मुफ्त और चौबीसों घंटे मानसिक स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराने के लिए हेल्पलाइन चलाती है. खबर है कि इस हेल्पलाइन को आठ महीने पहले अपनी स्थापना के बाद से 1.5 लाख से अधिक कॉल प्राप्त हुए हैं. इनमें सबसे अधिक 18 से 45 आयु वर्ग के लोग कॉल कर रहे हैं. कुल मिलाकर, दो-तिहाई कॉल करने वाले पुरुष हैं.
इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित खबर के अनुसार हेल्पलाइन टेली-मानस (Tele-MANAS Helpline) स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा पिछले साल 10 अक्टूबर (विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस) पर शुरू की गई थी. मंत्रालय ने कहा कि यह कोविड-19 महामारी के मद्देनजर ‘मानसिक स्वास्थ्य संकट’ को दूर करने के सरकार के प्रयासों का हिस्सा था. 1,600 से अधिक प्रशिक्षित परामर्शदाताओं के साथ, जो 20 से अधिक भाषाओं में सहायता प्रदान कर सकते हैं, वर्तमान में देश में 42 टेली-मानस सेल हैं. इन्हें टोल फ्री नंबर (14416 या 1800-89-14416) के माध्यम से एक्सेस किया जा सकता है.
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‘प्राथमिकता लोगों की जान बचाना’
हेल्पलाइन नेटवर्क के लिए नोडल सेंटर के रूप में काम करने वाले निम्हान्स में मनोचिकित्सा की सहायक प्रोफेसर डॉ. स्वाति रवींद्रन ने कहा ‘हमारी प्राथमिकता लोगों की जान बचाना है. या इस समय लोगों के तनाव को कम करना है.’ स्वाति रवींद्रन टेली-मानस टीम में शामिल होने वाली पहली महिलाओं में से एक थीं. उन्होंने आगे कहा ‘आपातकालीन कॉल में, हमारे काउंसलर मरीजों के साथ तब तक कॉल पर रहते हैं जब तक कि वे अस्पताल नहीं पहुंच जाते.’
ज्यादातर कॉल 18 से 45 साल की उम्र के लोगों के
कॉल डेटा के विश्लेषण से पता चलता है कि ज्यादातर कॉल 18 से 45 साल की उम्र के लोगों के थे. कुल कॉलों में से लगभग 6.22 प्रतिशत आपातकालीन मामले थे जहां परामर्शदाताओं ने सुनिश्चित किया कि पर्याप्त सहायता प्रदान की जाए, जबकि 90 प्रतिशत नियमित थे. वहीं 4 प्रतिशत कॉल प्रैंक था. उदासी, नींद में खलल, तनाव, चिंता, और संबंध या पारिवारिक संघर्ष सबसे आम शिकायतों में से थे.
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दो-तिहाई कॉल पुरुषों के
डॉ रवींद्रन ने आगे कहा ‘हम कॉल को उन शिकायतों के आधार पर वर्गीकृत करते हैं जो लोग हमारे पास पहुंचते हैं, निदान नहीं. निदान हमारा उद्देश्य नहीं है, जब मानसिक स्वास्थ्य की बात आती है तो पहले से ही बहुत भ्रांतियां हैं, लोग इस पर बात करना कलंक मानते हैं.’ गौरतलब है कि हेल्पलाइन में आने वाले दो-तिहाई कॉल पुरुषों के थे. डॉ रवींद्रन ने कहा ‘ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि अधिक पुरुषों के पास फोन तक पहुंच है और वे अपने घरों से बाहर निकलकर गोपनीयता का फायदा ले सकते हैं.’
डॉ. स्वाति ने आगे कहा ‘नियमित कॉल के लिए, हस्तक्षेप कॉल करने वाले की जरूरतों पर निर्भर करता है और वे क्या करने में सक्षम हैं इस पर भी निर्भर करता है. उदाहरण के लिए, हम काउंसलर से एक मनोचिकित्सक के पास एक ही कॉल बढ़ा सकते हैं, हम जिला केंद्रों में नियमित परामर्श की व्यवस्था कर सकते हैं, जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के काउंसलर व्यक्ति से मिल सकते हैं, या हम उनके लिए कॉल प्राप्त करने की व्यवस्था कर सकते हैं.’
हालांकि परामर्शदाताओं का एक नियम है – गोपनीयता सर्वोपरि है. डॉ. स्वाति ने कहा कि काउंसलर पहले समय तय किए बिना कभी भी कॉल बैक नहीं करते हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि हम नहीं चाहते कि परिवार में किसी और को पता चले कि उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन पर कॉल किया है.









