
आईपीएल के दौरान तमाम पूर्व क्रिकेटर्स के बीच में एक ग़ैर- क्रिकेटर सबसे ज़्यादा सुर्खियां बटोर जाता है और वो हैं हर्षा भोगले. इस आईपीएल के दौरान महेंद्र सिंह धोनी से उन्होंने रिटायरमेंट को लेकर हंसते-हंसते कई पेचीदा सवाल भी पूछे जिसके धोनी ने अपने चिर-परिचित अंदाज़ में जवाब भी दिये. युवा पीढ़ी में बहुत सारी प्रतिभाएं भोगले की राह पर चलना चाहती हैं जिनके पास क्रिकेट खेलने का अनुभव भले ही ना रहा हो लेकिन क्रिकेट को लेकर उनकी समझ और उसे बयां करने का तरीका भी किसी से कम नहीं है. कुछ वक्त पहले मैंने मशहूर कामेंटेटर भोगले से ख़ास की थी. पेश है उसके कुछ मुख्य अंश
आप यूट्यूब पर क्यों नहीं है ?
समय का अभाव है, हमारी जिंदगी में 24 घंटे ही होते हैं, हम क्या-क्या करें. मैं जहां काम करता हूँ, वहाँ मुझे काफी अधिक मेहनत करनी होती है, जो प्रयास होता है वह कभी कम नहीं हो पाए, क्योंकि वहां मेरा रहना ही एक बड़ी बात होती है. मैं वहां रहूं, सोशल मीडिया पर रहूं, कॉर्पोरेट प्रोग्राम करूं, थोड़ा आराम करूं, फिर मुझे लगा की एक नई चीज में जाना क्या मेरे लिए ठीक है या नहीं क्योंकि अगर मुझे कुछ करना है तो पूरी मेहनत से करना है. अगर मैं नहीं कर पाऊं तो करने का क्या मतलब है. मैंने अक्सर लोगों को यह कहानी सुनाई है, मेरे बचपन में प्रिंसपल ने कहा था कि अगर करना है तो 100% करो नहीं तो ना करो और मुझे नहीं लगा कि मेरे पास करियर के इस स्टेज पर उतना वक्त है कि मैं शुरू करू. क्योंकि आपके अंदर जो एक जुनून होता है वो धीरे-धीरे कम होता जाता है. फिलहाल मेरी जिंदगी में यूट्यूब के लिए शायद समय ना हो, लेकिन मैं बाकी लोगों के जरिए यूट्यूब पर पहुंच जाऊंगा.
ब्रॉडकास्टिंग में आपने रेडियो किया, प्रिन्ट किया, वेब किया और अब आप डिजिटल कर रहें हैं, इतने सारे बदलाव आपमें हुए, उसके बारे में आप बताइये?
अगर यह कहानी लोग सुनेंगे तो उन्हें लगेगा की मैं 150 साल का हूँ. मेरी शुरुआत हुई मैनुअल टाइपराइटर के साथ, जो कि हम रिपोर्ट Telx को भेजा करते थे. मैं बहुत पुरानी बात नहीं कर रहा, मैं 1990 की बात कर रहा हूँ, मैं मैनुअल टाइपराइटर लेकर घूमता था. मेरी शुरुआत साल 1990 के दौरान हुई. मैंने एक रिपोर्टर के तौर पर शारजाह में एक सीरीज की थी. जिंदगी में जब जल्दी चुनौतियां आ जाएं तो एक तरह से अच्छा होता है. मुझे रेडियो में जल्दी मौके मिले, मैं 19-20 साल का था तब लाइव रेडियो कॉमेंट्री कर रहा था. कभी-कभी मुश्किल परिस्थति में डाला गया मुझे, जहां मुझे नहीं रहना चाहिए था, लेकिन मुझे डाला गया उस परिस्थति में, कहते हैं ना की बच्चे को पानी में डाल दो तो वह तैरना सीख जाता है. जब मैं प्रिन्ट में मिड डे अख़बार में लिख रहा था उसी दौरान हमारे दिग्गज रिपोर्टर लिख रहे थे, उनकी कॉपी पढ़ी जा रही है अखबारों में सुबह 6-6:30 बजे, मेरी पढ़ी जा रही है 12 बजे. अब मैं ऐसा क्या लिखूँ कि जो सुबह के अखबार पढ़ता है वह दोबारा दोपहर में भी पढ़े क्योंकि मैच सभी ने एक ही देखा है और लिख एक ही समय में रहे हैं. खुशकिस्मती से मेरा बैकग्राउंड पत्रकारिता का नहीं है, मेरा बैकग्राउंड एडवरटाइजिंग से था, जहां पर आपको अगर कुछ बेचना है तो पहली लाइन खींचनी चाहिए लोगों को. तो वह मेरे लिए एक ट्रेनिंग सा था, मैंने सोचा की चलो मैं स्टाइल अलग लिखता हूँ, मैं सोचता हूँ कि लोगों ने मैच देखा भी है. मैं मैच रिपोर्ट नहीं लिखूंगा, मैं मैच को रिव्यू करूंगा. जैसे आप फिल्म देखने जाते हैं तो यह नहीं बोलते की 3 मिनट 12 सेकेंड के बाद यह हुआ, 4 मिनट 24 सेकेंड के बाद यह हुआ, 6 मिनट 26 सेकेंड के बाद यह हुआ. आप फिल्म का रिव्यू लिखते हैं, तो मैंने कहा कि पूरे दिन का मैं रिव्यू करूंगा, लेकिन ऐसे अंदाज से लिखूंगा लोग पढ़ना चाहे. जैसे – पहले टेस्ट में अजहरुद्दीन ने टॉस जीता, इंग्लैंड ने बल्लेबाजी की और 650 रन किए. तो मैंने कहा अजहरुद्दीन ने टॉस जीता और अपने शहर के तहजीब के मुताबिक उन्होंने कहा जी हुजूर पहले आप. ऐसा करना पड़ा मुझे, लेकिन मुझे फायदा था की मैं एडवरटाइजिंग से आया था, मैंने बड़े-बड़े लोगों के लाइंस पढ़े थे.
समय के साथ आपने जो भारत में इज्जत कमाई, लोग काफी इज्जत करते हैं आपकी, खासकर ब्रॉडकास्टिंग में और क्रिकेट कमेट्री में. पीटर रोबक हमारी जनरेशन के बेस्ट राइटर थे, जैसा की आप भी मान रहें हैं कि वह बेस्ट थे, हालांकि अब वह इस दुनिया में नहीं हैं. पीटर रोबक आपके काफी अच्छे दोस्त भी थे, उन्होंने जो अपनी आटोबायोग्राफी लिखी, जो उनकी आखिरी किताब है, “Sometimes I Forgot to Laugh” और उसका जो फॉरवर्ड है, वह आपका है, वह कितनी बड़ी चीज थी कि इतना बड़ा लेखक बोल रहे हैं कि मेरी किताब का फॉरवर्ड हर्षा भोगले लिखेंगे.
पता नहीं उन्होंने क्यों पूछा, लेकिन जब उन्होंने पूछा मुझे, तब लगा की एक ऐसे आदमी जो इस तरह से लिखता है कि मैं वैसा नहीं लिख पाऊं. मैं कोशिश कर सकता हूँ उनकी तरह लिखने की, लेकिन शायद वह मुकाम हासिल नहीं कर पाऊं मैं. तो मुझे तो कुछ अच्छा लिखना ही पड़ेगा, लेकिन मैं उनको काफी पसंद करता था, उनको काफी करीब से देखा था मैंने, इसलिए ज्यादा मुश्किल नहीं लगा. बहुत अच्छा लगा. उसके कई सालों के बाद 2018-19 में एक युवा लड़के ने मुझे कहा कि मैं Cricket 2.0 नाम की किताब लिख रहा हूँ, जहां क्रिकेट पूरी तरह से बदल रहा है, और यह किताब इंग्लैंड में छपेगी. आप उसका फॉरवर्ड लिखोगे, इस दौरान दूसरे व्यक्ति माइकल वॉन भी थे. वह मुझे काफी अच्छा लगा कि इस उम्र में इस तरह के दर्शकों से मेरे ताल्लुकात हैं. यह होना जरूरी है, जब आपकी उम्र बढ़ती है, अनुभव बढ़ता है तो एक तरह से अच्छा होता है और एक तरह से खराब. ऐसे में प्रासंगिक रहना काफी जरूरी है, हमको अनुकूल बनना पढ़ता है, जब मैंने शुरुआत की थी तब मैच रिपोर्ट 1000-1200 शब्दों में लिखी जाती थी, फीचर्स आर्टिकल 2000-2500 वर्ड के होते थे, फिर लोग कहने लगे कि भाई 600-700 शब्दों में लिखो, फिर कहने लगे, 300-350 शब्दों में लिखो, फिर कहने लगे 280 शब्दों में लिखो. क्या वही बात सबमे की जा सकती है. मेरी जिंदगी में मुझे बहुत अच्छे-अच्छे लोग मिले, पीटर रोबक भी उन्हीं में से एक थे.
हर कोई हर्षा भोगले बनना चाहता है, ईएसपीएन ने “हर्षा की खोज” एक प्रोग्राम बनाया, मेरे कई साथी उसमें आए, अब आप उनको देखते हैं कि वह अलग–अलग चैनल में मुख्य एंकर बन चुके हैं, तब आपको कैसा लगता है?
ऐसा ही होना चाहिए, जैसे समुद्र में लहरें आती रहती हैं. आप यह नहीं कह सकते हैं कि यह बीच हमारा है. अगर तेंदुलकर और कपिल देव गए तो हम किस गिनती में हैं, तो उनका आना अच्छा है. मुझे बहुत खुशी होती है लोगों का टैलेंट देखते हुए, कि जिन लोगों को मैंने एक स्तर पर देखा वह अब कितना बेहतर हो चुके हैं. जैसे आप प्लेयर्स को देखते हैं, 14 साल की उम्र में सचिन को देखा, 18-19 साल में विराट कोहली को देखा, फिर आपने देखा कि कहा से कहाँ चले गए, फिर अपने आप से सवाल करते हैं कि क्या मुझे लगा कि यह यहाँ से यहाँ चले जाएंगे. वैसे ही जब मैं युवा एंकर्स और पत्रकारों को देखता हूँ, तो मैं देखता हूँ कि यह कहां तक जा पाएंगे, क्योंकि हुनर ढूँढना मुश्किल नहीं है. मैं देखता हूँ कि जो नई पीढ़ी आ रही है वह काफी प्रतिभाशाली है, जो कि हम नहीं कर पाए, यह वैसा कर रहें हैं. हमको जो सीखने में 5 साल लगे, वह तैयार बनके आ रहें हैं. कितनी अच्छी बात है, इसका मतलब हमारी पीढ़ी ने कुछ दिया है दूसरी पीढ़ी को, हमारी छोटी ही सही लेकिन भूमिका रही है कि वह तैयार आ रहें हैं. मैं देखता हूँ कि नए एंकर ऐसे आ रहें हैं जैसा बनने में हमे 5-6-7 साल लगे.
मैंने दुनियाभर में मैदानों में देखा है, जो खिलाड़ियों की लोकप्रियता है, वैसे ही आपको भी लोग मानते हैं, आपसे अक्सर लोग आटोग्राफ, फोटोग्राफ लेने आते हैं, यह एक ग्राउंड या एक जगह की बात नहीं है, यह पूरी दुनिया में देखा गया है. आप इसको कैसे देखते हैं?
इतने सालों से जिस व्यक्ति की तस्वीर आपके घरों में आती है, अच्छी या बुरी पहचान तो हो ही जाती है. मुझे खुशी इस बात कि है कि इतने साल तक उपयुक्त रहें हैं. फैंस शब्द से मैं थोड़ा असहज महसूस करता हूँ क्योंकि उस शब्द में एक असमानता होती है, यह जिंदगी की सच्चाई नहीं है. फैन जो शब्द होता है वह मैंने कभी इस्तेमाल नहीं किया. क्योंकि मुझे लगता है कि आप में और उनमें क्या फरक है. आप अपने एरिया में बहुत अच्छे हो मैंने अपने एरिया में थोड़ा बहुत अच्छा कर लिया है. तो अच्छा तो लगता है, जब लोग पहचानते हैं तस्वीर मांगते हैं तो मैं ना नहीं कहूँगा, अच्छा लगता है. कभी-कभी ज्यादा मांग लेते हैं, समझते नहीं हैं कि मैं काम करने जा रहा हूँ. अगर आप उसके बारे में ही सोचो तो अलग दुनिया में जीने लगते हैं, आपको लगता है कि मैं कोई हूँ. इसके बाद जमीन से पैर उठने लगते हैं. हालांकि जो लोग मेरी आलोचना करते हैं वह याद रहते हैं.
जब भी बात होती है ब्रॉडकास्टिंग में कोई आता है, खासकर स्पोर्ट्स जर्नीलिज़्म में, एक जगह सभी हर्षा भोगले से प्रेरित होते हैं, वहीं दूसरी तरफ, सबको बताया जाता है कि तुम हर्षा भोगले नहीं बन सकते, हर्षा भोगले एक ही हैं.
हाँ एक ही हो सकता है, क्योंकि सबका नाम अलग है, मैं अलग हूँ. लेकिन एक ही क्यों होना चाहिए, आपकी निगाहें ऐसी होनी चाहिए कि मैं उनसे आगे चला जाऊं. मुझे लगा कि जब मेरा करियर खत्म हो जाएगा तो लोग यह कहें कि हिंदुस्तान का सबसे अच्छा कमेंटेटर यह था, मैं उस मुकाम पर पहुंचा हूँ कि नहीं यह मैं नहीं बात सकता. बचपन से मैंने टोनी कोज़ियर को सुना था, उन्हे Voice Of west Indies कहा जाता था, मैंने सोचा कि कभी Voice of Indian Cricket कहेंगे मुझे, तो यह एक बात थी. लेकिन हर पीढ़ी को पिछली पीढ़ी से अच्छा होना चाहिए, जैसे 2.0 3.0 4.0 सॉफ्टवेयर आता है. जो आज का सॉफ्टवेयर है वह कल के सॉफ्टवेयर से ज्यादा है. जो आज के पॉवर हीटर हैं वह कल के पावर हीटर से अच्छे थे. लेकिन उनके मन में ख्याल होना चाहिए कि मैं उनसे बेहतर बनू लेकिन इसके लिए जितनी मेहनत मैंने कि उससे ज्यादा मेहनत करनी पड़ेगी.
धोनी का एक ट्वीट बहुत प्रचलित है आपके बारे में, और हाल ही में आपने धोनी से उनके रिटायरमेंट के बारे में पूछा, क्या कभी ऐसी चीज रही है जो आपको बुरी लगी हो, या धोनी को बुरी लगी, या किसी और क्रिकेटर को बुरी लगी हो ?
मैंने कभी धोनी से बात ही नहीं कि अब तक क्योंकि उनके तक पहुंचना ही मुश्किल है, और अगर मैं उस बात को अपने दिमाग में रखूंगा तो मेरे अंदर एक नकारात्मकता आएगी. उस बात से एक आग लग गई, और 2016 से मेरी जिंदगी बदल दी. मेरी जिंदगी में सबसे अच्छी चीज उसमें से निकली, कि उस वजह से मैं टेलीविजन से डिजिटल में आ पाया. एक बार धोनी ने मुझे मैसेज भेजवाया कि मैं उस बारे में बात नहीं कर सकता. मैंने भी नहीं पूछा. जब हर आदमी आपको अलग बात सुनाता है इसका मतलब आपने लगती नहीं कि, हाँ लेकिन मैं उस वजह से डिजिटल पर पहुंचा, एक अलग दर्शकों तक पहुंचा. अगर वह नहीं होता तो शायद मैं डिजिटल में नहीं जाता. Cricbuzz के युवा लड़के आए मेरे पास, उन्होंने कहा कि हम वीडियो प्रोडक्ट शुरू करना चाह रहे थे, वीडियो प्रोडक्ट था नहीं. अगर आप मुझसे पूछो कि मेरी जिंदगी में 3-4 चीज ऐसी क्या है जिससे आपको सबसे ज्यादा फक्र है. तो मैं Cricbuzz के वीडियो प्रोडक्ट की बात करूंगा, क्योंकि उस समय सिर्फ एक फोन कैमरे के साथ शुरुआत हुई थी, और Cricbuzz कहाँ से कहाँ चला गया, उस चीज कि मुझे बहुत खुशी होती है.
हर्षा भोगले को धोनी के जवाब से बुरा लगा क्योंकि धोनी का स्वभाव काफी बेहतरीन हैं, शायद उन्होंने जो कहा उसका मतलब अलग निकाला गया. आपको इसका प्रोफेशनली नुकसान हुआ.
मुझे आजतक यह नहीं पता कि धोनी की वजह से हुआ, या बच्चन साहब के ट्वीट कि वजह से हुआ. या किसी ओर से हुआ, मैंने आजतक नहीं कहा कि इसकी वजह से मुझे नुकसान हुआ. बच्चन साहब से उसके बाद बातचीत हुई है इस घटना के बारे में, वह ट्विटर पर मुझे फॉलो करते थे, मैंने मैसेज किया, लंबी बात हुई. लेकिन मैं किसी को दोष नहीं देना चाहता क्योंकि सच्चाई मुझे नहीं पता. लेकिन एक बात मैंने उससे सीखी, मैंने एक गलती की. मैं एक-दो महीने गुस्से में था, उसके बाद जो भी चीजें हुई उससे लगा कि हर चीज से अच्छी चीज निकलती है. वहाँ से देखिए एक दरवाजा बंद हुआ लेकिन खिड़कियां कितनी खुल गई. एक तरह से आपको जब लगता है कि मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा दिन है बुरी खराब आती है. ऐसे ही जब बुरा दौर होता है तो अच्छी न्यूज आती है. मेरी जिंदगी का वह चैप्टर बंद हो चुका है. मुझे कोई दिक्कत नहीं धोनी से, मुझे गुस्सा उन लोग से आता है जो सोशल मीडिया पर छुपकर वार करते हैं. आप यहाँ पर खड़े हैं और दीवार के उसपार से पत्थर फेंका, इसका मतलब मैं डर रहा हूँ, मैं डरपोक हूँ, मैं खुले मैदान में आकर बात नहीं कर रहा हूँ. मुझे गुस्सा इस बात से आता है जो ट्वविटर पर अलग नाम के हैंडल के पीछे छुपकर आप पर वार करते हैं. पहले गुस्सा आता था लेकिन अब हंसी आती है, अगर आपको कहना है तो सामने आकर कहो.
कई बार लोगों के बीच देखने को मिलता है कि हर्षा भोगले क्रिकेट नहीं खेले हैं तो किसी क्रिकेटर कमेटेटर से बेहतर क्रिकेट कैसे जानते हैं, या मेरे से ज्यादा अच्छी बातें कैसे कर सकते हैं. कुछ क्रिकेटर और कमेंटेटर में भी आपको लेकर इनसिक्योरिटी रहती है ?
मैं उनसे बेहतर क्रिकेट जान ही नहीं सकता, मैं शायद उनसे बेहतर कहानी सुना सकता हूँ. क्योंकि जिस स्तर पर मैं खेला हूँ, मुझे थोड़ी बहुत जानकारी है. वह क्रिकेट में हैं, मैं मीडिया में हूँ, हमारे रास्ते अलग अलग हैं. मैंने जब से शुरुआत की तब से एक चीज पर गौर किया कि यह मेरी लिमिट हैं, मुझे इस लिमिट में चलते पसंद करें या ना करें. हमसे बहुत बड़े लोग रह चुके हैं जिनको लोग नापसंद करते हैं, हम कौन हैं.
आपने जब शुरू किया था तब आपका संबंध उस दौर के खिलाड़ियों से काफी बेहतरीन थे, लेकिन क्या आज की पीढ़ी के खिलाड़ियों से आपका जुड़ाव वैसा ही है, जैसा सचिन तेंदुलकर से था?
टीम इंडिया के मौजूदा प्लेयर्स मेरे लड़के से कम उम्र के हैं, तो फर्क तो रहेगा ही. उनके पिताजी-माताजी ने मुझे टीवी पर देखा है तो वह असर तो रहेगा ही. जब मैं शुभमन गिल से मिलता हूँ तो अलग रिश्ता होता है, 23 साल का लड़का है, मेरा छोटा लड़का 29 साल का है. राहुल द्रविड़, सचिन तेंदुलकर का करियर जब ऊपर जा रहा था तो उसके साथ-साथ मेरा भी करियर ऊपर जा रहा था, हमारी रांहें अलग थी लेकिन अलग अलग चल रहे थे. एक सबंध था और विश्वास था कि जो मुझसे बात करेंगे वह मेरे पास ही रहेगा. मैंने कभी नहीं बोला जो बातें लोगों के बारे पता है. संबंध बनाने में कई साल लगते हैं, लेकिन उसको खत्म करने में 5 मिनट नहीं लगते. मुझे बुरा लगता है कि नई पीढ़ी के पत्रकार क्लिकबैट में फंसे हुए हैं. हमको क्लिकबेट का दबाव नहीं था इसलिए मेरा करियर अलग बना.
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