
नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल में राज्य सचिवालय को सांप्रदायिक झड़पों के संबंध में दर्जनों खुफिया जानकारी मिली जिसको आधार बनाकर ‘द केरला स्टोरी’ को पश्चिम बंगाल में प्रतिबंधित कर दिया गया है. एक अधिकारी का कहना है कि फिल्म की रिलीज को लेकर सरकार को कई जिलों के मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षकों से रिपोर्ट मिली थी कि फिल्म पर प्रतिबंध लगाने की मांग उठ रही है. सरकार के पास इससे जुड़े दस्तावेज मौजूद हैं और जरूरत पड़ने पर वह सर्वोच्च अदालत के समक्ष इसे पेश कर सकती है.
अधिकारी ने कहा कि कई सिनेमाघरों और शहर के मुख्य स्थलों के आसपास, दर्शक एक दूसरे के खिलाफ सांप्रदायिक अपशब्दों का इस्तेमाल करते नज़र आए. फिल्म की वजह से संप्रदाय विशेष को लेकर नफरत का भाव उभर रहा है और तनाव बढ़ रहा है.
सुदीप्तो सेन के निर्देशन में बनी ‘द केरला स्टोरी’ केरल में महिलाओं के प्रति कट्टरता को दिखाती है. फिल्म बंगाल में 5 मई को रिलीज हुई थी. पश्चिम बंगाल जो अक्सर राजनीतिक संघर्षों की आग में झुलसता रहा है, ने औपनिवेशिक काल से लेकर आज़ादी के बाद तक सेंसरशिप को कई बार झेला है. राज्य पिछले चार-पांच सालों में कई बार सांप्रदायिक तनाव का शिकार हुआ है. हालिया घटना रामनवमी के दौरान हुई थी. राज्य के अपने बंटवारे के इतिहास, बांग्लादेश के साथ सात जिलों की अंतरराष्ट्रीय सीमा लगना, अक्सर इन बातों को वजह के तौर पर देखा जाता है.
न्यूज 18 ने राज्य के प्रशासनिक अधिकारियों, पुलिस अधिकारियों सहित कई अन्य वरिष्ठ विशेषज्ञों से इस बारे में बातचीत की ताकि ‘द केरला स्टोरी’ पर लगाए प्रतिबंध की वजह, पृष्ठभूमि और इतिहास को खंगाला जा सके.
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थियेटर में राजनीति का शो
राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित निर्देशक अनिक दत्ता न्यूज 18 से कहते हैं, ‘एक वह है जो राज्य पर शासन कर रहा है और एक वह है जो केंद्र में मौजूद है. दोनों मिलकर थियेटर में राजनीति का शो चला रहे हैं.’ दत्ता जिनकी फिल्म ‘भाबिश्यात एर भूत’ जिसे एक राजनीतिक व्यंग्य बताया जाता है, को फरवरी 2019 में रिलीज होने के 24 घंटे के भीतर सिनेमाघरों से उतरवा दिया गया था. सरकार ने इसे सिनेमाघरों से हटाने को लेकर कोई साफ बात भी नहीं की थी, इसके बाद दत्ता ने कानूनी हस्तक्षेप की मांग रखी थी.
दत्ता कहते हैं, ‘फिल्म की जो कहानी है, उसके बारे में मैंने जितना पढ़ा और सुना है उसके हिसाब से तो यह ध्रुवीकरण के एक टूल की तरह लगती है .मेरा फिल्म को देखने का कोई इरादा या इच्छा नहीं है. लेकिन फिल्मों को लेकर जो इन दिनों राजनीति चल रही है उसे देखते हुए मैं कह सकता हूं सरकार दिखावे का खेल खेलने में लगी हुई है. वह या तो अपने वोट बैंक को खुश करने में लगी है या उन्हें अपनी तरफ आकर्षित करना चाहती है. बंगाल के विषय में यह तथाकथित अल्पसंख्यकों का वोट बैंक है जो सत्ताधारी पार्टी को सत्ता दिलाने की अहम वजह है.’
‘जनता को इसे अस्वीकार करने दो’
वह आगे कहते हैं, ‘मैंने कभी सेंसरशिप का समर्थन नहीं किया. अगर फिल्म बकवास या बेकार है या किसी प्रोपेगैंडा के तहत बनाई गई है तो जनता को इसे अस्वीकार करने दो.’ वैसे भी केवल सीबीएफसी ही फिल्मों को सेंसर कर सकता है यह राज्य का काम नहीं है. अगर सरकार को लगता है कि इससे सांप्रदायिक या राजनीतिक तनाव बढ़ सकता है तो इसे संभालना उनका काम है. मैं इसलिए अपने दरवाजे और खिड़कियां हमेशा बंद नहीं रख सकता ना कि चोर मेरे घर में घुस जाएगा. इससे बचाव के लिए ही हमारे पास कानून व्यवस्था है.
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने फिल्म को एक सांप्रदायिक प्रचार बताते हुए राज्य में प्रतिबंधित कर दिया है. इससे पहले वह केंद्र सरकार पर प्रधानमंत्री पर बीबीसी द्वारा बनाए गए वृत्तचित्र के भारत में सभी प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगाए जाने को लेकर उनकी आलोचना कर चुकी हैं. केंद्र ने फरवरी में मोदी पर बनाई गई सीरीज को बदनाम करने के लिए तैयार की गई एक कथा बताते हुए भारत के सभी प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंधित कर दिया था. सेंसरशिप का मुद्दा हमेशा से ही संवेदनशील और विवादास्पद रहा है, खासकर पश्चिम बंगाल जैसा राज्य जो अपने उदार रवैये और संस्कृति के लिए जाना जाता है. वहां पर एक फिल्म पर प्रतिबंध लगाया जाता है. हालांकि इतिहास के पन्नों में इस मामले में एक अलग कहानी लिखी हुई है.
रिलीज के समय पर उठते सवाल
कौशिक सेन, एक अभिनेता, निर्देशक और नाटककार है. वह फिल्म के रिलीज होने के वक्त पर सवाल खड़ा करते हैं. कौशिक सेन ने कहा, ‘मैं किसी भी तरह के प्रतिबंध के खिलाफ हमेशा से खड़ा रहा हूं और प्रदर्शन करता रहा हूं. बंगाल में कई किताबें, सिनेमाघर प्रतिबंधित थे. सत्ताधारी दल फिल्मों को सेंसर करते थे. मैंने कभी भी इस तरह के प्रतिबंध का समर्थन नहीं किया. लेकिन इस बार मैं मुख्यमंत्री के फैसले के साथ हूं. केरला स्टोरी कोई फिल्म नहीं है. यह किसी तरह की कोई कला नहीं दिखाती बल्कि यह विशुद्ध रूप से एक प्रोपेगैंडा फिल्म है. जिसका मकसद लोगों का ध्रुवीकरण करना और सांप्रदायिक तनाव फैलाना है. आप खुद ही देखिए, फिल्म कब रिलीज की गई. फिल्म को राज्य में होने वाले चुनाव और बंगाल जैसे अतिसंवेदनशील राजनीतिक राज्य में पंचायत चुनाव से पहले रिलीज किया गया. अब ऐसी फिल्म का राजनीतिक और सांप्रदायिक असर पड़ना तय है.’
वह आगे कहते हैं, ‘हमारे जैसे लोग मंहगे सिनेमाघरों में जाकर फिल्म देखते हैं, वापस लौट कर फिल्म के बारे में सोशल मीडिया पर एक लंबी पोस्ट लिखते हैं और साथ ही साथ लोगों को जुटाते भी जाते हैं. लेकिन जब इसी वजह से दंगे होते हैं, अंदरूनी इलाकों में, गांवों में घर जलाए जाते हैं तो हमारे जैसे ही लोग अपने अपने घरों में बैठकर टीवी पर उनको जलते हुए देखते हैं. हम उन मासूम लोगों को नहीं बचा सकते हैं. तो ऐसे में मुझे लगता है कि सरकार को कोई कदम उठाना ही था.’
सेंसरशिप का इतिहास
पश्चिम बंगाल दशकों से किताबों, प्रकाशन, थियेटर और सिनेमा के प्रतिबंध का गवाह रहा है. सेंसरशिप का विचार सबसे पहले 1878 में भारत के वायसराय लॉर्ड लिटन ने प्रस्तावित किया था और इस तरह से वर्नाकुलर प्रेस अधिनियम पेश किया गया था. इस अधिनियम का मकसद स्थानीय प्रेस को ब्रिटिश शासन के खिलाफ आलोचना व्यक्त करने से रोकना था. कालांतर में इस अधिनियम के चलते कई बंगाली और बंगाल मूल के अंग्रेजी दैनिकों पर पाबंदी लगाई गई.
लेखक शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास ‘पाथेर डाबी’ को भी ब्रिटिश सरकार ने सेंसर किया था. बाद में शरत चंद्र ने रवींद्रनाथ टैगोर से प्रतिबंध के खिलाफ याचिका दायर करने का अनुरोध किया था. प्रतिबंध की परंपरा देश के आजाद होने के बाद भी जारी रही. एक वरिष्ठ इतिहासविद अपना नाम नहीं बताने की शर्त पर कहते हैं कि कांग्रेस शासित सरकार के दौर में कई थियेटरों पर पाबंदी लगाई गई जिसमें से ज्यादातर प्रसिद्ध अभिनेता-निर्देशक उत्पल दत्त के थे.
आजादी के बाद पहली फिल्म जिस पर पाबंदी लगाई गई वह थी ‘नील आकासर निस्चेय’ (नीले आसमान के तले) जिसका निर्देशन मृणाल सेन ने किया था. इस फिल्म को 1959 में अपने राजनीतिक तौर पर मुखर होने की वजह से प्रतिबंधित किया गया था.
बंगाल में वाम मोर्चे के शासन के अंत के दौर में राज्य सरकार ने तस्लीमा नसरीन की किताब ‘द्विखंडितों’ (विभाजन) पर 2005 में पाबंदी लगाई थी. शहर में एक सांप्रदायिक दंगे के बाद उन्हें 2007 में जबरन राज्य छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था. 2013 में बंगाल सरकार ने ब्रिटिश लेखक सलमान रुश्दी के कोलकाता आने को अनुमति नहीं दी थी. वह यहां अपने उपन्यास ‘मिडनाइट्स चिल्ड्रन’ पर आधारित फिल्म के प्रचार के लिए आने वाले थे.
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Tags: Bengal
FIRST PUBLISHED : May 11, 2023, 14:45 IST









