सत्ता की सियासत में जातीय राजनाति का मुल्लमा : सत्ता की सियासत में जातीय राजनीति का मुल्लमा जिस कदर चढ़ता जा रहा है उससे आज का प्रबुद्ध वर्ग का मन व्याथित है जब जोधा सिंह अटैया जैसे कांतिकारी अपने इक्यावन साथियों के साथ बलि बेदी पर चढ़ गए और देश को आजादी दिला दिए लेकिन यहां का विकास जैसा होना चाहिए वह नहीं हो सका अगर शहीद स्थल का विकास राष्ट्रीय फलक पर किया गया होता तो यहां के लोग और काफी गौरवान्ति महशूस करते ऐसा भी नही कि यहां के सियासत दानों की हैसियत कम रही है इस क्षेत्र से प्रतिनिधित्व करने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह 1989 से 1996 तक सांसद रहे और देश की सबसे बड़ी कुर्शी के मालिक भी रहे प्रधानमंत्री बनने के बाद लोगों ने सोचा कि बावनी इमली को अब राष्ट्रीय पहचान के रूप में विकसित किया जाएगा लेकिन सिर्फ आवाम मायूसी ही हाथ लगी । इतना ही नही पूर्व प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री के बेटे हरि कृष्ण शास्त्री जब फतेहपुर के सांसद हुए और केन्द्रीय मंत्री बने तो आशा की नई किरण दिखी लेकिन मामला ढाक का तीन पात ही रह गया । भाजपा की सरकार में भी यहां के सांसद साध्वी निरंजन को मंत्री बनने का अवसर मिला लेकिन . बावनी इमली पर किसी की नज़रे इनायत नही हो सकी । यहां के लोग जब इस इतिहासिक इमली के पेड़ को देखते है तो सोचकर सिहर उठते है कैसे 37 दिनों तक शहीदों के शव लटकते रहे ।चर्चा तो यहां तक हैं कि इमली का पेड़ भी घटना वाले दिन से ठिठक गया वर्षो से पेड़ ने अपना विकास छोड़ दिया । लेकिन दूसरी तरफ सियासतदानों ने राजनीति के पेंग भरे जातीय सियासत पर मेडिकल कालेज, पुल, पार्क , चौराहों, बड़े संस्थानों का विकास व नाम करण किया गया लेकिन बावनी इमली के शहीद स्थल का विकास आज भी … ..
*लेखक -> राजीव सोमवंशी कौशाम्बी*






