मनौरी में कुर्मी समाज का बड़ा फैसला: तेरहवीं पर नहीं देंगे भोज

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महंगाई के इस दौर में किसी की मृत्यु के बाद रीति रिवाज को निभाते हुए होने वाले फिजूल खर्चों पर रोक लगाने के लिए मनौरी में कुर्मी समाज ने एक अहम फैसला लिया है। मनौरी स्थित कृष्णा गार्डेन में बुधवार को समाज की हुई इस बैठक में सर्वसहमति से तेरहवीं भोज पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया गया। तेरहवीं में छपने वाले निमंत्रण कार्ड पर भी रोक लगाई गई है।

कृष्णा गार्डेन में बुधवार को समाज के जिम्मेदार बुजुर्ग और समाज में अच्छी पकड़ रखने वाले व्यक्तियों के बीच बैठक हुई। बैठक में मृत्यु के बाद होने वाले तेरहवीं भोज और उसमे छपने वाले निमंत्रण का सर्वसहमति से बहिष्कार किया गया। बैठक के आयोजक रमाकांत सिंह ने बताया कि ये नियम आज से ही कुर्मी समाज के सभी लोगों पर लागू होगा। यदि सर्वसम्मति से लिए गए इस फैसले को कोई नहीं मानता है तो उसका सामूहिक और सामाजिक बहिष्कार किया जाएगा। उन्होंने अन्य समाज के लोगों से भी ऐसी फिजूलखर्ची के खिलाफ मुहिम चलाने की अपील की है। उन्होंने उपस्थित लोगों से तेरहवीं संस्कार एवं समाज में व्याप्त अंधविश्वास एवं कुरीतियों के प्रति जागरूक करते हुए लोगों को ऐसी व्यवस्था को अविलंब बन्द करने पर जोर दिया। अपने बच्चों को शिक्षा के प्रति सजग रहने का आह्वान किया। कहा कि समाज के बच्चे जब शिक्षित होंगे तो अपने आप कुरीति खत्म होगी। समाज में तमाम व्याप्त कुरीतियों को भी खत्म करना चाहिए जिससे समाज आगे बढ़ सके। अब समय आ गया है बदलाव करने का इस कुप्रथा को बंद करने के लिए सभी समाज के लोगों को आगे आना चाहिए। इस मौके पर एडवोकेट विजय सिंह, अमर सिंह, वीरेंद्र सिंह, जीतेंद्र सिंह, राकेश सिंह, पंकज सिंह, पूरन सिंह, सुरेंद्र सिंह, सचिन सिंह, रामराज सिंह, सुनील सिंह, राममगन सिंह, उदय सिंह, अरुण सिंह, पप्पू सिंह, राहुल सिंह और प्रदीप सिंह आदि मौजूद रहे।

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तेरहवीं भोज का बहिष्कार क्यों

बैठक की अध्यक्षता कर रहे रमाकांत सिंह ने कहा कि परिवार में जब किसी की मौत होती है तो उस समय सभी लोग दुखी रहते हैं। लेकिन, सदियों से चले आ रहे रीति-रिवाज का मजबूरन पालना करते हुए दुखी मन से भोज जैसे आयोजनों को करना पड़ता है, जिससे समाज के लोग दिन प्रतिदिन कर्ज तले दबते जा रहे हैं। कई परिवार तो इस कुप्रथा के कारण बर्बाद हो गए हैं।

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तेरहवीं की जगह कन्या भोज किया जाए

रमाकांत सिंह ने बताया की ऐसे में त्रियोदशी करना ठीक नहीं है। पुराणों में त्रियोदशी करने का कहीं भी उल्लेख नहीं है। ऐसे में लोगों को परिजनों की आत्मा की शांति के लिए कन्या भोज करना चाहिए। बैठक में मौजूद लोगों ने रमाकांत सिंह के सुझाव को सहमति दी और सभी से अपील करते हुए कहा की आज से ही कुर्मी समाज के लोग ऐसे आयोजनों में शामिल नहीं होंग। यह एक कुप्रथा है, जिसे जल्द से जल्द बंद होना चाहिए।

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मृत्यु भोज में कम से कम डेढ़ से दो लाख का आता है खर्च

जिस देश में 35 परसेंट लोग गरीबी रेखा के नीचे का जीवन जी रहे हों, वहां पर मृत्यु के बाद किए गए भोज पर इस महंगाई के जमाने में कम से डेढ़ से दो लाख रुपए का फिजूल खर्च करना कहीं से उचित नहीं है। मृत्यु के बाद कुछ कर्मकांड हैं, जिसमें पुराणों के अनुसार 12 दिन तक जल देना और 13 ब्राह्मणों को भोजन कराया जाना उचित है। ऐसा मानना बिल्कुल गलत है कि हजारों लोगों को मृत्यु भोज के नाम पर खाना खिलाने से आत्मा को शांति मिलेगी।

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ऐसा चलन बिल्कुल गलत

रमाकांत सिंह का मानना है की आज कुछ लोगों की आय बढ़ी और खर्चे भी बढ़े हैं। लेकिन, आज के चलन के अनुसार मृत्यु भोज, शादी समारोह, जन्मदिन और कई तरह के आयोजनों में फिजूल खर्च करना बिलकुल गलत है। ऐसे पैसे को बचाकर सामाजिक संरचना में काम कर रहे लोगों पर खर्च किया जाना ही अच्छा है। कुर्मी समाज की इस पहल के लिए पूरे जिले और उत्तर प्रदेश में सभी समाज के लोगों को इसका प्रचार प्रसार कर लागू किया जाना चाहिए।

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Author: Up Head Line

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