गुरुनानक देव जी ने सिरसा में किया था 40 दिन तप, पीर का घमंड किया था दूर , जानिए पूरी कहानी

नकुल जसुजा/सिरसा. अपनी पावन शिक्षाओं व वाणी से पूरी दुनिया को राह दिखाने वाले श्री गुरुनानक देव जी का पावन सानिध्य सिरसा को भी मिला हुआ है. श्री गुरुनानक देव जी ने यहां पर 40 दिनों तक चलिया काटा था यानि 40 दिनों की तपस्या की थी. जिस स्थान पर श्री गुरुनानक देव ने तपस्या की थी, उस स्थान पर गुरुद्वारा चिल्ला साहिब स्थापित है. यह ऐतिहासिक गुरुद्वारा श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है और यहां आकर श्रद्धालु असीम शांति का अनुभव करते हैं.

गुरुद्वारा चिल्ला साहिब में एक बड़ा लंगर घर स्थापित किया हुआ है. यहां पर 24 घंटे गुरु का प्रसाद (लंगर) मिलता है.लंगर बनाने के लिए गुरुद्वारा में स्टीम भट्टी लगी हुई है. जिससे लंगर का समान बड़े बड़े बर्तनो में पकाया जाता है.रोटी बनाने के लिए मशीन लगाई हुई है. जिसमें एक बार में 4000 के करीब रोटी बनती हैं. गुरुद्वारा के साथ एक स्कूल बना हुआ है. इसके अलावा अब एक अस्पताल की स्थापना की जा रही है.इस गुरुद्वारा में हरियाणा,पंजाब और राजस्थान से श्रद्धालु दर्शन करने के लिए आते हैं.

पीर ख्वाजा अब्दुल शकूर का घमंड किया था दूर
जत्थेदार बाबा जगतार सिंह (कार सेवा सिरसा वाले) बताते हैं कि दूसरी उदासी के वक्त बठिंडा, भटनेर से होते हुए विक्रमी संवत 1567 को गुरुनानक देव अपने शिष्य मरदाना के साथ सिरसा पधारे. जिस समय गुरुजी सिरसा पधारे, उनका अनोखा पहनावा था. पांवों में खड़ाऊं, हाथ में आसा, सिर पर रस्सा बंधा हुआ था और माथे पर तिलक लगा रखा था. उन्होंने बताया कि सिरसा में पीर ख्वाजा अब्दुल शकूर नामक फकीर खुद को करामाती बताते थे. उनके शिष्यों ने गुरु साहिब से कहा की उनके पीर से चर्चा करो नहीं तो यहां से चले जाओ,तब गुरु साहिब ने कहा कि हम यहां पर चर्चा करने नहीं सच का उपदेश देने के लिए आये हैं. कुछ समय बाद गुरु नानक देव जी पीर ख्वाजा अब्दुल शकूर के पास बैठ गए.उनके साथी पीर बहावल ने कहा कि हमारे पीर बड़े करामाती हैं. आप कोई करामत कर सकते हो तो करके दिखाओ. गुरुनानक देव जी ने कहा कि हमारे पास तो परमात्मा का नाम है.उन दोनों ने गुरुनानक देव के साथ गोष्ठी की, जिसमें गुरुसाहब ने उनका अंहकार दूर किया.

सिरसा में चार महीने 13 दिन रहे थे गुरु नानक
वहां मौजूद पीरों ने कहा कि तुम्हें परखना चाहते हैं. 40 दिन कोठरी में रहना होगा. रोजाना एक जौ का दाना और पानी पीना होगा. गुरु नानक देव के साथ 3 मुसलमान फकीर भी पानी लेकर बैठ गए, जबकि गुरुनानक देव जी बिना जौ व पानी के 40 दिन तक पाठ करते रहे. लेकिन कुछ दिनों बाद ही मुस्लिम फकीर बाहर आ गए और गुरुनानक के चरणों में गिर गए कि वाकई तुम खुदा के बंदे हो. गुरुनानक देव ने यहां चलिया काटा यानि चालीस दिनों की तपस्या की. गुरुनानक देव जी सिरसा में चार महीने और 13 दिन रहे.गुरु नानक देव जी ने उदासी के वक़्त सबसे ज्यादा वक़्त सिरसा में गुजारा था.

बाबा प्रीतम सिंह के समय हुई थी गुरुद्वारा की स्थापना
जत्थेदार बाबा जगतार सिंह ने बताया कि सिरसा इलाके की संगत ने सचखंड वासी बाबा बघेल सिंह जी से कहा कि सिरसा में दो ऐतिहासिक स्थान हैं,यहां पर सेवा की जाये. बाबा बघेल सिंह जी सिरसा पहुंचे,यहां पर उन्होंने देखा कि इस जगह के आसपास गंदगी के ढेर लगे हैं,जिसके बाद उन्होंने सिरसा के दसवीं पातशाही गुरुद्वारा की सेवा शुरू की,इस दौरान वो सचखंड को प्यारे हो गए,उन्होंने ने बाबा प्रीतम सिंह जी को सेवा करने के लिए कहा,जिसके बाद सिरसा में चिल्ला साहिब गुरुद्वारा की स्थापना हुई.बाबा प्रीतम सिंह जी ने गुरुद्वारा में सरोवर,सत्संग हाल,स्कूल की सेवा की.जनवरी 2012 को बाबा प्रीतम सिंह जी सचखंड को प्यारे हो गए.इसके बाद गुरुद्वारा की सेवा बाबा अजित सिंह जी को दी गई,वो भी इसी महीने सचखंड को प्यारे हो गए,अब कार सेवा का जिम्मा जत्थेदार बाबा जगतार सिंह जी के पास है.

कोरोना काल में पेश की मानवता की मिसाल
गुरुद्वारा कमेटी के सदस्य सुरेंदर सिंह वैदवाला ने बताया की ऐतिहासिक चिल्ला साहिब गुरुद्वारे में बड़ा लंगर हाल है, जहां सालाना कार्यक्रम के लिए एक लाख से अधिक श्रद्धालुओं के लिए लंगर तैयार होता है. रोजाना पकने वाला लंगर पुरातन विधि से चूल्हे पर लकड़ियों से तैयार होता है. तांबे की बड़ी-बड़ी देगों में दाल व चावल पकाए जाते हैं. इसके अलावा गुरुद्वारा के लंगर घर में पकने वाला लंगर स्टीम मशीन द्वारा बने हुए कढ़ाई में पकाया जाता है। रोटी बनाने के लिए एक मशीन लगाई गई है,उन्होंने बताया कि कोरोना के समय गुरुद्वारा से रोज़ाना हज़ारों लोगों के लिए लंगर तैयार होता था.यहां पर 24 घंटे लंगर मिलता है,इसके अलावा गुरुद्वारा में समय-समय पर ब्लड डोनेशन कैंप भी लगाए जाते हैं.

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Author: Jagran Times

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