तो गीता प्रेस गोरखपुर की स्थापना करने वाले पहले नास्तिक थे, फिर कुछ ऐसा हुआ कि…जानिए पूरी कहानी


रिपोर्ट: नरेश पारीक

चूरू. गीता प्रेस गोरखपुर को गांधी शांति पुरस्कार देने की की घोषणा के बाद राजनीति भी शुरू हो गई है. कांग्रेस ने इस फैसले की तीखी आलोचना की है. कांग्रेस नेता जयराम रमेश केंद्र सरकार के फैसले पर सवाल खड़े किए हैं. वहीं बीजेपी अपने फैसले को लेकर अलग तर्क दे रही है. इस विवाद के चलते गीता प्रेस गोरखपुर चर्चा के केंद्र में है और लोगों में गीता प्रेस गोरखपुर को लेकर काफी उत्सुकता है. इसी को लेकर आगे जानिए गीता प्रेस गोरखपुर की स्थापना कब हुई और किसने की तथा इसकी स्थापना के पीछे क्या उद्देश्य थे और कौन थे गीता प्रेस गोरखपुर की स्थापना करने वाले.

राजस्थान के सेठ ने शुरू की स्थापना

राजस्थान का चूरू जिला छोटी काशी के नाम से मशहूर है, यहां की धरती पर जन्में लोगों ने देश ही नहीं विदेशों में भी नाम कमाया है. इनमें से ही एक नाम है जयदयाल गोयनका, जिन्होंने गीता प्रेस की स्थापना की. आज उसी गीता प्रेस गोरखपुर में छपे धार्मिक पुस्तकों के जरिए देश में जगह-जगह लोगों को धर्म का संदेश दिया जा रहा है. चूरू में स्थित गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा संचालित गुरुकुल के व्यवस्थापक ईश्वरसिंह राठौड़ ने बताया कि सेठजी के नाम से प्रसिद्ध चूरू के जयदयाल गोयनका का वर्ष 1885 में खूबचंद्र अग्रवाल के परिवार में हुआ था. उन्होंने इस संस्थान की स्थापना की थी.

भगवान में नहीं था जयदयाल को विश्वास

गुरुकुल के व्यवस्थापक ईश्वरसिंह राठौड़ ने बताया कि गीता प्रेस गोरखपुर की स्थापना करने वाले जयदयाल गोयनका का शुरुआत में भगवान के प्रति विश्वास नहीं था और वे नास्तिकता के दर्शन से प्रभावित थे. इस दौरान उनके जीवन में रोचक घटना घटी. कहा जाता है कि एक रात में गोयनका चूरू शहर के गढ़ चौराहा ​स्थित अपनी हवेली के कमरे में सो रहे थे,इस दौरान उन्हें भगवान श्रीकृष्ण ने दर्शन दिए, भगवान ने गोयनका को कहा कि गीता का ज्ञान लोग भूलते जा रहे हैं, ऐसे ही चलता रहा तो आने वाले दिनों में गीता ग्रंथ लुप्त हो जाएगा. भगवान ने उन्हें गीता का प्रचार-प्रसार करने का आदेश दिया.

कोलकाता में छपवाई गीता की पांच हजार कॉपी

ईश्वरसिंह राठौड़ ने बताया कि सेठजी की सपने के कुछ देर बाद अचानक उनकी आंखे खुली. इसके बाद गोयनका ने गीता का प्रचार-प्रसार करने  की ठानी. बाद में उन्होंने गीता प्रेस की स्थापना की. कहा जाता है कि कोलकाता में व्यापार करने के दौरान उन्होंने गीता का काफी प्रचार—प्रसार किया. इस दौरान वे सत्संग भी करते. उनके सत्संग प्रभाव से साधकों का समूह बढ़ता जा रहा था, सभी को स्वाध्याय के लिए गीताजी की आवश्यकता हुई. लेकिन शुद्ध पाठ और सही अर्थ की गीता सुलभ नहीं हो रही थी. इस पर उन्होंने गोविन्द भवन की ओर से कोलकाता में पांच हजार प्रतियां छपवाई जो बहुत ही जल्दी समाप्त भी हो गई.

किराए के कमरे में हुई शुरुआत

गोयनका को गोरखपुर के घनश्याम दास व महावीर प्रसाद पोद्दार ने गोरखपुर में प्रेस खोलने का सुझाव दिया. इस पर गोयनका ने उनके प्रस्ताव को स्वीकार कर गोरखपुर में प्रेस खोलने की अनुमति प्रदान की. गोरखपुर में एक किराए के कमरे में इसकी शुरूआत की गई. धीरे-धीरे प्रेस के माध्यम से गीता के अनेक छोटे-बडे संस्करण के अलावा अन्य पुस्तकों का भी प्रकाशन होने लगा.

चूरू में की गुरुकुल की स्थापना

वहीं गीता प्रेस गोरखपुर की ओर से बच्चों को अच्छे संस्कार देने के लिए 1923 में धर्म स्तूप के पास गुरुकुल की स्थापना की गई. गुरुकुल में शिक्षा, वस्त्र, शिक्षण सामग्रियां आजतक नि:शुल्क है. उनसे भोजन का खर्च भी नाम मात्र का लिया जा रहा है. चूरू में गीता प्रेस का देश में एकलौता ऐसा गुरुकुल है, जहां करीब 90 बच्चों को वैदिक के साथ आधुनिक शिक्षा दी जाती है. यहां सुबह-शाम वैदिक मंत्र, हवन, संध्या सहित संस्कृत में संवाद करते बच्चे नजर आ जाते हैं. गुरुकुल में हिन्दी, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, संस्कृत सहित बच्चों को नियमित तौर पर गीता, वेद, उपनिषद, व्याकरण के अध्ययन सहित हवन, आरती, पूजा कराई जाती है. सुबह के समय बच्चों को योगाभ्यास भी नियमति तौर पर कराया जाता है.

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Author: Jagran Times

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