
न्यूयार्क: टाइटैनिक जहाज के साथ लगता है डूबना शब्द एक नियति बन चुका है. पहले एक दुर्घटना के चलते यह जहाज डूबा जिसने हजारों की जान ली. अब अटलांटिक महासागर की गहराइयों में डूबे इस जहाज को देखने के लिए गई पर्यटक पनडुब्बी टाइटन रविवार को लापता हो गई. इसमें पांच लोग सवार थे. जिनकी खोज जारी है. लेकिन यह काम इतना जटिल और पेचीदगियों से भरा है कि पांचों लोगों को बचाने के प्रयास में कई बाधाएं खड़ी हुई हैं.
दरअसल समुद्र के अंदर किसी भी तरह की खोज या बचाव अभियान में मौसम की स्थिति, रात में रोशनी की कमी, समुद्र के हालात और पानी का तापमान यह वह वजह हैं जो निर्धारित करती हैं कि नाविकों या पर्यटकों को ढूंढा और बचाया जा सकता है या नहीं. समुद्र की लहरों के नीचे बचाव की सफलता के लिए बहुत सारी वजह होती हैं जो मुश्किल और जटिल होती हैं.
क्यों है टाइटन का पता लगना मुश्किल
पहला और सबसे अहम काम टाइटन को खोजने का है. दरअसल पानी के नीचे जाने वाले वाहनों में एक ध्वनिक उपकरण (acoustic device) लगा होता है जिसे पिंगर कहा जाता है. इससे निकलने वाली ध्वनि तरंगों के जरिये बचावकर्मी पानी के नीचे वाहन का पता लगा लेते हैं. टाइटन के पास क्या है यह साफ नहीं हो पा रहा है. इस पर टाइटन को जहाज के मलबे तक पहुंचने के लिए ढाई घंटे का वक्त लगना था, लेकिन इसने महज 1 घंटा, 45 मिनट के भीतर ही संपर्क खो दिया था.
ये भी पढ़ें- ‘टाइटैनिक’ का मलबा दिखाने गई पनडुब्बी लापता, बचा है सिर्फ 70 घंटे का ऑक्सीजन, खतरे में 5 जिंदगियां
मशीनी खराबी भी एक वजह हो सकती है
टाइटन के कम्युनिकेशन उपकरण में दिक्कत हो सकती है या फिर इसका बैलास्ट सिस्टम खराब हो सकता है. बैलास्ट सिस्टम पनडुब्बी के नीचे जाने और ऊपर आने को नियंत्रित करता है. जब पनडुब्बी नीचे जाती है तो यह टैंक में पानी भरकर नीचे पहुंचाने और ऊपर आने के दौरान पानी को बाहर निकालकर हवा भरकर उसे सतह पर लाने में मदद करता है.
अत्यधिक गहराई की वजह से भी पता लगाना मुश्किल
अगर यह पता भी चल जाता है कि पनडुब्बी तल पर है, तब भी बचाव दल का अत्यधिक गहराई की वजह से उन तक पहुंचना बेहद मुश्किल है. क्योंकि गोताखोरों के साधन उन्हें एक निश्चित गहराई तक जाने की ही इजाजत देते हैं. दरअसल गोताखोर जो विशेष उपकरण पहने हुए होते हैं और हीलियम युक्त मिश्रण वाली हवा से सांस ले रहे हैं, उसके साथ वह कुछ सौ फीट की गहराई तक ही जा सकते हैं. उससे पहले उन्हें ऊपर आने से पहले दबाव को कम करने के लिए काफी वक्त गुजारना होगा. वहीं कुछ सौ फीट की गहराई के बाद सूरज की रोशनी भी पानी के अंदर नहीं पहुंचती है. यानी वहां अंधेरे का राज कायम होता है. यहां कुछ 100 फीट तक पहुंचने की बात हो रही है और टाइटैनिक समुद्र के अंदर 14,000 फीट की गहराई में पड़ा है. जहां तक पहुंचने के लिए इंसान के पास केवल विशेष उपकरणों वाली पनडुब्बी का ही सहारा है, जो उन्हें गर्म और सूखा रखे साथ ही सांस के लिए हवा प्रदान करती रहे.
टाइटन तक पहुंच का एक तरीका
ऐसे में क्या टाइटन तक पहुंचने का कोई तरीका नहीं रह जाता है. दरअसल ऐसा नहीं है, ऐसी परिस्थिति में एक संभव तरीका है. एक ऐसा वाहन जो बगैर इंसानों के पानी की गहराई में जाए और रिमोट से संचालित हो. अमेरिका नौसेना के पास एक ऐसा वाहन है जो रिमोट से संचालित होता है. लेकिन इसका इस्तेमाल समुद्र तल में पड़े सामान को निकालने के लिए ही किया गया है. इसका पहली बार इस्तेमाल 2022 की शुरुआत में दक्षिण चीन सागर में करीब 12,400 फीट में मौजूद दुर्घटनाग्रस्त एफ-35 ज्वाइंट स्ट्राइक फाइटर को निकालने के लिए किया गया था. CURV-21 नाम के इस वाहन की मदद से 20,000 फीट की गहराई तक जाया जा सकता है.
दूरी भी रोड़ा, समय भी कम
नौसेना का सबसे गहराई तक गोता लगाने वाला रोबोट अंदर जाने की ताकत तो रखता है लेकिन उसका घटनास्थल तक पहुंचना भी अपने आप में मुश्किलों से भरा हुआ है. दरअसल CURV-21 घटनास्थल से करीब 370 मील की दूरी पर है. और जो जहाज इसे ला सकता है उसकी चलने की गति 20 मील प्रतिघंटे से ज्यादा नहीं है.
रिपोर्ट बताती हैं कि टाइटन पानी के अंदर अपने पांच नाविकों को 96 घंटे तक ही जीवित रख सकता है. इसके बाद अगर टाइटन की बैटरी खत्म हुई तो हीटर नहीं चल सकेंगे और ऐसे में अंदर मौजूद लोगों को हाइपोथर्मिया ( शरीर का तापमान अत्यंत कम हो जाना) हो सकता है.
.
Tags: America News, Submarine
FIRST PUBLISHED : June 21, 2023, 11:15 IST






