
लड़कियों को जब भी अपनी पहचान बनानी पड़ी उन्हें समाज ने सहयोग नहीं किया, परिवार वाले भी उनके कदमों को आगे बढ़ने से रोक देते थे, खेल के क्षेत्र में तो हमेशा उनको ये कहकर निरुत्साहित कर दिया जाता था कि ये सब लड़कों के लिए है, लड़कों के बराबर तो उन्हें कभी आंका ही नहीं जाता था, मन मारकर रह जाना और तानों को सुनना ही उनकी नियति थी, कुछ खेल तो लड़कों के लिए ही थे, उनके खेल गुड्डे गुड़ियों तक ही सीमित होते थे, गिल्ली-डण्डा, क्रिकेट, फुटबॉल, पहलवानी आदि खेलों को तो उनकी सोचों से भी दूर कर दिया जाता था, लोग क्या कहेंगें लड़की है. फुटबाल खेल रही है, पहलवानी करेगी, तौबा-तौबा समाज में क्या मुंह दिखाएंगे, लोगों का बड़ा डर था, विभिन्न खेलों में प्रदर्शन के लिए लड़कियों को कड़ी मेहनत करनी पड़ी, किन-किन कठिनाइयों से उन्हें गुजरना पड़ा, ये वो ही जानती हैं.
आज ऐसा कोई खेल नहीं है, जहां लड़कियों ने अपनी पहचान नहीं बनाई हो, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वे हर खेल का हिस्सा बन रही हैं, मेडल प्राप्त कर रही हैं, अपनी प्रतिभा को निखार रही हैं, अपने परिवार और देश का नाम रोशन कर रही हैं. क्रिकेट, तीरंदाजी, तैराकी, पहलवानी हर खेल की ओर लड़कियों का रुख हुआ है. पहलवानी से लड़कियों का रिश्ता जुड़ना वास्तव में बड़ी दिलेरी का काम लगता है, जिन्दादिली का अन्दाज है, पर देश को गर्वित करने वाली पहलवान महिलाओं को भी वेदना और पीड़ा से जूझना पड़ रहा है. ये उनके आन्दोलन से ज्ञात हुआ, सामान्य लड़कियां तो कितना सहती होगीं, जब देश के लिए मेडल जीतने वाली प्रतिष्ठित, सम्मानित महिलाएं भी पुरुष के द्वारा शोषित की जा रही हों!
देश के लिए खेलने वाले खिलाड़ियों के साथ यौन शोषण का मामला वाकई काफी शर्मनाक और हैरान करने वाला है. पांच महीनों से भी ज्यादा चलने वाला आन्दोलन सबकी दृष्टि का केन्द्र रहा है. 18 जनवरी को पहली बार खिलाड़ियों द्वारा आवाज उठाई गयी और धरना शुरू किया गया. ब्रजभूषण शरण सिंह बहराइच जिले के कैसरगंज क्षेत्र से 6 बार बीजेपी सांसद रहे हैं. वे लगभग11 सालों से कुश्ती संघ के अध्यक्ष भी हैं, उन पर महिला खिलाड़ियों ने अपने साथ दुर्व्यवहार व शोषण का आरोप लगाया है. लम्बे आन्दोलन के बाद ब्रजभूषण के खिलाफ एफआईआर 28 अप्रैल को दर्ज की गयी. गिरफ्तारी हुई ही नहीं, जंतर मंतर पर लगातार धरने के बाद भी उनके साथ न्याय होता नहीं दिख रहा, कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही.
नये संसद भवन में अपनी आवाज पहुंचाने के लिए आगे बढ़ते उनके कदमों को पुलिस ने जबरदस्ती रोका. कुछ लड़कियां अपनी जिद पर अड़ गयीं, नहीं मानी तो उन्हें घसीट कर बस में भरा गया, देश की नयी संसद तक पहुंचने नहीं दिया. अगर पहले ही इस प्रक्रिया में लड़कियों का साथ दिया गया होता तो ऐसे नहीं घसीटा जाता? आगे क्या होगा. समझ नहीं आ रहा पर संसद में लोगों की आवाज को सुनने से ही लोकतन्त्र की प्रतिष्ठा है, लेकिन यहां लड़कियों की आवाज दबा दी गयी, लोग इस तरह की कार्यवाही से हतप्रभ हैं, महिला पहलवानों के साथ इस तरह के व्यवहार की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती, यदि वास्तव में अपराध किया गया है और तनिक सी भी सच्चाई है तो निर्णय होना चाहिए, इसमें इतना विलम्ब क्यों?
पदक विजेता कुश्ती खिलाड़ियों द्वारा ब्रजभूषण पर जो गम्भीर आरोप लगाए गये हैं, उस घिनौनी सच्चाई पर कुछ लोग शान्त हैं, लेकिन सम्मानित लड़कियां भी बेवजह आरोप लगाकर अपनी प्रतिष्ठा को सरेआम दांव पर क्यों लगाएंगी? अपने कैरियर की उड़ान को क्यों रोकेगीं, विनेश फोगाट, साक्षी मलिक, बजरंग पुनिया, अंशु मलिक आदि दिग्गज खिलाड़ी यूं ही तो आरोप नहीं लगा देंगी, साक्षी मलिक का कहना कि ब्रजभूषण लड़कियों से अपनी पीठ और पैर दबवाते थे, प्रताड़ित करते थे, खिलाड़ियों को जेल में डालने तक की धमकी देते थे, विनेश फोगाट कहती हैं कि ब्रजभूषण ने उनके लिए कहा, ‘इस पर खर्च करना बेकार है, ये खोटा सिक्का है…’
मानसिक प्रताड़ना व्यक्ति को तोड़ देती है, हताशा में डूबो देती है, देश के लिए खेलने वाले खिलाड़ियों के मुद्दों की सुनवाई होनी चाहिए. वे कहती हैं कि कुश्ती संघ को बर्खास्त कर नये संघ का गठन किया जाए. ब्रजभूषण को अध्यक्ष पद से हटाकर जेल भेजा जाए, कार्यवाही ना होने तक सभी ने लम्बे समय तक अपनी बातों को सबके सामने पहुंचाने के लिए अपने भविष्य को दांव पर लगा दिया है, आश्वासन दिया जा रहा है कि किसी भी खिलाड़ी के हितों के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा पर न्याय नहीं हो रहा है? खिलाड़ी अपने अधिकारों के लिए संकल्पबद्ध हो अड़े हुए हैं, कार्यवाही ना होने तक किसी भी इंवेंट में भाग नहीं लेंगे.
देश की धाकड़ पहलवान महिलाएं जिन्हें देश की शान और शेरनी भी कह सकते हैं, उनका इस तरह सरेआम अपमान, भावनाओं को अनदेखा करना उचित नहीं है. देश के लिए वफादारी के साथ खेलने वाली अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी कितनी मजबूर हुई होंगीं? जब उन्होंने अपनी विवशता जाहिर की होगी. अपनी प्रतिष्ठा अपनी इज्जत को कोई कैसे धूल में मिला देगा. ऐसे प्रसंगों की वास्तविकता से देश की छवि धूमिल होती है, देश की बेटियां जब आवाज उठा रही हैं तो उनकी पुकार पर सक्रिय होने की जरूरत है, ये राजनीति तो नहीं हो सकती.
यदि ब्रजभूषण पर आरोप लगे हैं और कई दिग्गज खिलाड़ियों को धरने पर बैठना पड़ा है, और वे कटिबद्ध हैं. संकल्पबद्ध हैं तो सच को सामने लाने की आवश्यकता है. परदों में छिपी सामान्य महिलाओं की दास्तान तो कई बार छिपी ही रह जाती हैं. उनके दर्द जख्म बन जाते हैं. उन पर कोई मरहम भी नहीं लगाता पर जो दुनिया का मुकाबला कर रही हैं. उन मजबूत इरादे वाली महिलाओं के साथ भी यदि अन्याय हो रहा है तो स्थिति विकट है. नारी सुरक्षित कहां है? बेटियां पढ़कर भी कहां बच पा रही हैं. अपने ही क्षेत्र में असुरक्षित बेटियों के साथ पूरा देश खड़ा है, यदि सच्चाई है, तो अविलम्ब दोषी के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया पूरी कर सजा सुनिश्चित की जाए.






