अंतरिक्ष यात्रियों के दिमाग पर पड़ता है बुरा असर, दुरुस्‍त होने में लगते हैं तीन साल : NASA Study

NASA Study: वैज्ञानिकों ने नए अध्‍ययन में पाया कि अंतरिक्ष में लंबे समय तक रहने वाले एस्‍ट्रोनॉट्स के शरीर और दिमाग दोनों पर काफी बुरा असर पड़ता है. नासा के अध्‍ययन की रिपोर्ट के मुताबिक, अंतरिक्ष का वातावरण इंसानी शरीर के लिए बहुत मुश्किलें पैदा करता है. अंतरिक्ष में माइक्रोग्रैविटी और कई दूसरी चीजें इंसानी शरीर पर बुरा असर डालती हैं. नासा के विशेषज्ञों ने कहा कि छह महीने से ज्यादा इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन या नासा स्पेस शटल पर बिताने वाले अंतरिक्ष यात्रियों के दिमाग के बीच के हिस्से में फैलाव पाया गया है.

वैज्ञानिकों के मुताबिक, दिमाग के बीच के इस हिस्से को सेरिब्रल वेंट्रिकल्स कहते हैं. यह हिस्‍सा दिमाग के बीचो-बीच होता है. इसी में वह द्रव्य इकट्ठा होता है, जो मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी के बीच आता-जाता रहता है. यह गाढ़ा बिना रंग वाला पारदर्शी द्रव दिमाग के लिए कुशन का काम करता है. अगर दिमाग को कोई बाहरी झटका लगता है तो ये कुशन ही उसे सुरक्षा उपलब्‍ध कराता है. नासा के वैज्ञानिकों ने इस अध्‍ययन को करने के लिए 30 ऐसे अंतरिक्ष यात्रियों के दिमाग का स्‍कैन किया, जिन्‍होंने अंतरिक्ष में लंबा समय बिताया था.

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बचाव के लिए क्‍या करें एस्‍ट्रोनॉट्स
विशेषज्ञों ने अध्‍ययन में पाया कि अंतरिक्ष की लंबी यात्राओं के बाद एस्‍ट्रोनॉट्स के दिमाग के वेंट्रिकल को सामान्‍य स्थिति में आने के लिए तीन साल की लंबी अवधि चाहिए होती है. विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि किसी एक एस्‍ट्रोनॉट को अपनी अंतरिक्ष यात्राओं के बीच कम से कम तीन साल का अंतर रखना ही चाहिए. फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी में न्यूरोसाइंटिस्ट एच. मैक्ग्रॉगर के नेतृत्व में हुए इस अध्ययन की रिपोर्ट साइंटिफिक रिपोर्ट्स मैग्‍जीन में प्रकाशित हुई है. रिपोर्ट में मैकग्रॉगर कहती हैं कि अगर वेंट्रिकल्स को सामान्य स्थिति में लौटने के लिए पर्याप्‍त समय नहीं मिलेगा तो माइक्रोग्रैविटी में द्रव्य में होने वाले बदलावों से निपटने की दिमाग की क्षमता पर असर पड़ेगा.

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एस्‍ट्रोनॉट्स के दिमाग के वेंट्रिकल को सामान्‍य स्थिति में आने के लिए तीन साल की लंबी अवधि चाहिए होती है.

मस्तिष्‍क में होने लगते हैं बदलाव
दिमाग के खास हिस्‍से वेंट्रिकल्स में बदलाव सिर्फ अंतरिक्ष यात्रियों में ही नहीं होते, बल्कि ये उम्र बढ़ने के साथ सामान्‍य लोगों में भी देखा जाता है. ऐसा होने पर मरीजों की सोचने-समझने की क्षमता पर बुरा असर पड़ता है. शोधकर्ता राखाएल साइडलर के मुताबिक, अभी यह नहीं पता चल पाया है कि वेंट्रिकल्स में आने वाले बदलाव का अंतरिक्ष यात्रियों के जीवन पर क्या असर होता है. वह कहते हैं कि इसके लिए लंबी अवधि में ज्यादा से ज्‍यादा अध्ययन करने की जरूरत है. वेंट्रिकल के फैलने से मस्तिष्क में आसपास के ऊतक सिकुड़ सकते हैं. अध्ययन में यह भी पता चला कि अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण ना होने से मस्तिष्क में बदलाव होते हैं.

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ऊपर खिसक जाता है दिमाग
शोधकर्ता साइडलर के मुताबिक, अंतरिक्ष में गुरुत्‍वाकर्षण की गैर-मौजूदगी के कारण दिमाग में होने वाले बदलाव यांत्रिक लगते हैं. उनके मुताबिक, इंसान की नाड़ियों में वॉल्व होते हैं, जो हमारे शरीर के द्रवों को गुरुत्वाकर्षण के कारण पैरों की ओर बढ़ने से रोकते हैं. वहीं, अगर किसी जगह पर गुरुत्वाकर्षण नहीं होगा तो द्रव सिर की ओर जाएंगे. इससे वेंट्रिकल्स में फैलाव होने लगता है और मस्तिष्क ऊपर की ओर खिसक जाता है. अध्‍ययन में अमेरिका, कनाडा और यूरोपीय स्पेस एजेंसी के 23 पुरुष व सात महिला अंतरिक्ष यात्रियों को शामिल किया गया था. इन सभी की उम्र करीब-करीब 47 साल के आसपास थी. इनमें 8 ने करीब दो हफ्ते, जबकि 18 ने छह महीने तक का समय इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर बिताया था. वहीं, चार ने वहां करीब एक साल बिताया था.

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छह महीने और एक साल की लंबी यात्राएं करने वाले एस्‍ट्रोनॉट्स के वेंट्रिकल्‍स में फैलाव में ज्यादा अंतर नहीं था.

बहुत लंबे अभियानों में असर नहीं
साइडलर ने बताया कि कम समय के लिए अंतरिक्ष में जाने वाले एस्‍ट्रोनॉट्स के दिामग में बेहद मामूली बदलाव हुए. वहीं, कुछ के दिमाग में कोई बदलाव नहीं हुआ. इसके अलावा छह महीने या ज्यादा समय तक अंतरिक्ष में रहने वाले यात्रियों के वेंट्रिकल्‍स में फैलाव हुआ. छह महीने और एक साल की लंबी यात्राएं करने वाले एस्‍ट्रोनॉट्स के वेंट्रिकल्‍स में फैलाव में ज्यादा अंतर नहीं था. मैक्ग्रॉगर के मुताबिक, इससे साफ है कि ज्यादातर फैलाव पहले छह महीने में होता है. उसके बाद साल पूरा होते-होते ये कम होने लगता है. इससे मंगल ग्रह पर जाने वाले लंबे अभियानों में दिमाग पर असर नहीं होने की उम्मीद की जा सकती है.

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Author: Jagran Times

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