
परम्परा का अर्थ पुराना हो जाना नहीं होता. उस सरहद में रहकर भी नया, अनूठा और रोचक रचा जा सकता है. नए के नाम पर निरर्थक, फूहड़ और विकृत रचने की व्यावसायिक होड़ ने भ्रम पैदा कर दिया है. कला के गुणीजन कहते हैं- नवीनता नया रचने में नहीं, नया हो जाने में है. यह जो नवीन होना है, वही परम्परा में प्रयोग और नवाचार है. इधर बीते कुछ बरसों में भारतीय नृत्यों की कुछ बदल रही सी दुनिया को देखकर उस ‘नएपन’ को जाँचने की गरज लाजिमी है, जिसे नए ज़माने के नए दर्शकों की ज़रूरत और रूचि बताकर पेश किया जा रहा है.
‘ज़ायका बदला है’ का सहारा लेकर मनोरंजन के बाज़ार में रातों-रात अपना सिक्का ज़माने की हुमस नई प्रतिभा पर हावी है. कोरियोग्राफी और फ्यूज़न के नाम पर प्रयोगों की बाढ़ आ गयी है. यहाँ लय-ताल पर देह संचालन का करिश्माई ताना-बाना है, लाईट एण्ड साउण्ड का तिलिस्म है, पर रूह में गहरा असर पैदा करने वाली गुणवत्ता और कौशल नहीं है. यह लंबी तपस्या, साधना और अध्यवसाय से आता है. यह काबिलियत जीवन को समग्रता में देखने-समझने और जीने से आती है.
तमाम घालमेल और उसमें बचे हुए कला के सच की परत दर परत पड़ताल करते हुए हाल ही में अग्रणी नृत्यांगना गीता चन्द्रन बेबाकी से पेश आयीं. बहुकला केन्द्र भारत भवन के आग्रह पर क़रीब एक हफ्ता उन्होंने भोपाल की उदीयमान नृत्यांगनाओं के साथ बिताया. कहने को यह भरतनाट्यम नृत्य शैली पर आधारित कार्यशाला थी, लेकिन जो भी इस गतिविधि के प्रतिभागी और साक्षी बनें, उनका अभिभूत उद्गार था- “भरतनाट्यम का ऐसा आत्मीय गुरूकुल हमने पहले कभी नहीं देखा”. बिलाशक यह आंतरिक अनुशासन और सहज परस्परता का परिवेश था. यह प्रकल्प इस विकृति के बाज़ार में संस्कृति का शंखनाद था. उन भ्रमों को दूर करना विकल्प था, जहाँ आधुनिकता के नाम पर एक मनमानी सत्ता रातों-रात नई नस्ल को प्रसिद्धि का प्रलोभन बेच रही है.
भारत भवन की अंतरंगशाला में गीता चन्द्रन मानों नृत्य की गीता का जीवंत पाठ थीं. भरतनाट्यम की पल्लवित हो रही नई पीढ़ी इस उत्साह और भरोसे के साथ विदा हुई कि भारत की महान सांस्कृतिक, धरोहर की हिफाज़त का फजऱ् उन्हें भी निभाना है. यह कार्यशाला गीता चन्द्रन के लिए भी अपने अतीत को याद करने का मौक़ा बनी. एक नवोदित नृत्यांगना से लेकर पद्मश्री के तमगे को पाने तक की उपलब्धियों से भरी यात्रा के पड़ावों और सीखों को दोहराने का भी यह अवसर था जिसकी बदौलत वे सिद्धि-प्रसिद्धि के शिखर पर आज हैं. सवालों और जिज्ञासाओं ने दस्तक दी तो गुजि़श्ता लम्हे बोल उठे-
पाँच साल की उम्र में मेरी माँ मुझे ले गयी थीं श्रीमती स्वर्णा सरस्वती जी के पास, जो कि मेरी पहली गुरु रह चुकी हैं. वह बाल सरस्वती की फ़र्स्ट कजि़न थीं. पहले क्लास में गये ‘अम्मा’ वहाँ बैठी थीं. उनको हम ‘अम्मा’ कहते थे. दोनों तरफ़ डायमण्ड के नोज़ रिंग्स और ब्यूटीफुल कांजीवरम की साड़ी और हाथ में वह तटकरी लेकर बैठी हुई थीं. मैं थोड़ी-सी डरी हुई भी थी. वह एक हिस्ट्री के बिट की तरह है, क्योंकि बाद में पता लगा कि वह मन्दिरों में नृत्य करती थीं. उस टाइम का जो ट्रांजिसन उन्होंने देखा, कि मन्दिरों से किस प्रकार मंच पर इसको प्रस्तुत किया गया. मुझे लगता है कि अम्मा उस सबकी साक्षी थीं. वह दिल्ली रिलोकेट हो गयी थीं और वहाँ पर उन्होंने क्लास शुरू की थी.
पाँच साल की उम्र में वह मेरी पहली यात्रा की शुरूआत थी. लेकिन समझना तो बहुत बाद में हुआ. चूँकि नृत्य सीखने की प्रक्रिया इतनी लम्बी रहती है क्योंकि तालीम यूँ तो कभी पूरी नहीं होती, लेकिन लम्बे समय तक गुरु का सान्निध्य नहीं मिलता तो मुझे लगता है कि कोई भी सारे पक्ष नहीं जान सकता! अपने गुरू का बखान क्या करूँ! मेरी गुरू गा सकती थीं, पूरा कान्सर्ट गा सकती थीं. वे वीणा बजाती थीं, नृत्य तो करती ही थीं. उनको ‘अभिनय सरस्वती’ कहा जाता था.
आज के समय दुनिया में हम देख रहे हैं कि हर चीज़ बँट गयी है. जो संगीत सीखता है, वह नृत्य नहीं देखता और जो नृत्य सीखता है, वह संगीत की तरफ नहीं देखता, और रंगमंच की तरफ़ कोई जाता ही नहीं है. हमारे समय में यह नहीं था. हम रंगमंच भी देखते थे. अगर किसी पुस्तक का विमोचन हो रहा है और कोई लेक्चर भी है, तब भी हम फ़र्स्ट रो में होते थे. तब ऑल नाइट कान्सर्ट होते थे. यह नहीं होता था कि दो घंटे का, आधे घंटे का, चालीस मिनट का. ऑल नाइट कान्सर्ट में माँ ले जाती थी. माँ बताती थी कि मैं उन सभाओं में कभी थोड़ी देर सो जाती थी, फिर उठ जाती थी फिर देख लेती थी, फिर सो जाती थी. लेकिन अब जाकर लगता हैं कि बचपन की उन सभाओं ने मुझे बहुत स्ट्राँग बनाया.
हमारे घर में शुरूआत ही एलपी रिकार्ड्स से होती थी. मेरे पिताजी की बहुत बड़ी कलेक्शन थी एलपी रिकार्ड्स की और वह सुबह-सुबह उठते थे और बजाने लग जाते थे. तो मुझे कर्नाटक म्यूजि़क के सारे दिग्गज म्यूजि़शियन के सब गाने कण्ठस्थ थे.
लेकिन मुझे लगता है कि जो मेरे नृत्य के गुरु थे वह शायद ज़्यादा ‘धाकड़’ थे. उन्होंने काफी प्रोत्साहित किया और मेरी पोटेंशियल को पूरी तरह उभारा. पहली मेरी गुरु थीं सोना शास्त्री जिनके सानिध्य में मैंने ‘अरंगेट्रम’ (पहला सार्वजनिक मंच प्रदर्शन) किया. तब मैं चौदह बरस की थी. उसके बाद गुरु दक्षिणामूर्ति के सान्निध्य में मैं आई.
मेरी पहली गुरु हमेशा कहती थीं कि ऑडियंस की परवाह मत करो, नृत्य करो, अपने लिए करो. क्योंकि वह मन्दिरों में करती थीं. उनका बैकग्राउण्ड समर्पण का, सेवा का था. लेकिन दक्षिणामूर्ति सर के लिए स्टेज क्राफ़्ट सब कुछ था. वह ऐसे पीसेज़ दिखाते थे जो स्टेज में काम आएँ. स्टेज कव्हर करना’ ‘अटेंशन ग्रेविंग’ जिसे कहते हैं. वह टेक्निक उन्होंने मुझे बतायी.पचास और साठ के दशक में वरिष्ठ गुरुओं ने फि़ल्मों में भी नृत्य का संचालन किया, कोरियोग्राफ़ी की. एक पूरी पीढ़ी की माँएँ बच्चा पैदा होते ही कहती थीं कि कमला लक्ष्मण जैसे बनना है, वैजयन्ती माला जैसे बनना है, पद्मिनी जैसे बनना है, क्योंकि फि़ल्म सब देखते थे. उसकी पापुलैरिटी में भी एक बात थी.
मेरी आइकॉन हमेशा वैजयन्ती माला और यामिनी जी रहीं, क्योंकि वह दिल्ली में थीं, उनको बहुत देखा है. परफॉर्मेन्स में उनका कोई मुकाबला नहीं. जिस तरीके से वह आकर खड़ी भी हो जाती थीं तो एक स्टेटमेन्ट बन जाता था. डांस में सब कुछ है. जिसमें आपका रूझान है उसकी तरफ़ आप जाते हैं- फिलॉसफी, स्प्रिचुअलिटी, माइथोलॉजी है और पोइट्री, म्यूजि़क, रिद्म है, यौगिक पॉश्चर है. लेकिन कुछ-कुछ बातें सबकी समझना और उसको लेकर आगे बढ़ना, उसमें एक अलग मज़ा है. क्योंकि अगर उसको सिर्फ़ एक परफॉर्मेन्स आर्ट मान लेंगे कि हाथ-पैर चलाने का काम ही नृत्य है तो यह ख़ुद का और नृत्य का अन्याय है. एक आइटम सीख लिया, दूसरा आइटम सीख लिया, तीसरा आइटम सीख लिया, आइटम सीखते जाएँगे, ये बात नहीं है. फिर सम्पूर्णता नहीं आती है, एक कम्पलीटनैस नहीं आती है. इसीलिए आज के दौर में मुझे थोड़ा-सा यह ज़रूर लगता है कि नृत्य एंटरटेनमेंट और परफॉर्मेन्स की तरफ़ ज़्यादा जा रहा है और पोइट्री, लिटरेचर और स्प्रिचुअलिटी की तरफ कम जा रहा है.
मुझे लगता है कि हमारे ट्रेडिशनल फॉर्म्स बहुत कन्टमपरेरी हैं. मैं क्लासिकल नहीं कह रही हूँ. क्योंकि यह कहना कि यह पुराना है और इसको सिर्फ़ हम म्यूजि़यम वेल्यू ही दे रहे हैं, यह मैं बिल्कुल नहीं मानती. हमारे गुरु कुछ सिखाते थे तो कहते थे कि ‘यह मैंने जोड़ा है बेटा, देख लो यह ठीक है कि नहीं. नहीं तो हम कुछ और कर सकते हैं.’ यह क्ले की तरह है. इसको हम हमेशा मोल्ड करते हैं. यह कभी नहीं कहा कि इसको इसी प्रकार रखना. यह कहा कि ‘यह है हमारा ग्रामर, मैंने इसको इस तरह ढाला है. तुमको ठीक लग रहा है तो इसको रखेंगे, नहीं तो कुछ और करेंगे इसमें.’
बदलाव आज कई स्तरों पर आ गया है समाज में. चुनौती सामने है. जिस फैमिली में शाम को संगीत नृत्य का कार्यक्रम देख लेना या थियेटर देख लेना मनोरंजन का साधन था, उनकी शामें मॉल-बाज़ार करने लगीं. एक तरीके से स्पेयर टाइम को स्पेन्ड करने की डेफिनेशन बदल गयी है. इस बदलते हुए परिवेश में हम किस प्रकार अपनी शैलियों को और स्कूल के नाम पर कुछ बचा कर रख सकते हैं! मैं इसके लिए बहुत दुखी भी हूँ. आजकल आर्ट एजुकेशन के बारे में बहुत सोच रही हूँ. अपनी नई एजुकेशन पॉलिसी में बहुत कुछ है, लेकिन क्या उसके अनुकूल काबिल टीचर्स हमने तैयार किये हैं?
बेशक आज उसी तरीके से नहीं सिखा सकते जिस तरीके से गुरु-शिष्य परम्परा से हमने 30-40 बरस पहले सीखा है कि आप वहीं रह जाएँ, उनके साथ खाएँ, उनके साथ सोएँ. वो बात नहीं हो सकती. क्योंकि सब फॉर्मल एजुकेशन भी चाहते हैं. मुझे लगता है कि उसको रिडिफाइन करके मैं अपनी तरह से कोशिश कर रही हूँ. मेरा ‘नाट्य वृक्ष’ संस्थान है. बहुत सारे शिष्य हैं मेरे लेकिन दोस्त की तरह हैं. वहाँ पर हाइरार्की नहीं है. मुझे लगता है कि वो समय अब गया, जहाँ कि गुरु वहाँ बैठा है और शिष्य यहाँ बैठा है. वैसा नहीं होता. उनको किसी चीज़ के लिए फोर्स नहीं कर सकते. अगर मन से लग जाएँ तो वह बिछ जाते हैं.






